भारतीय कबड्डी टीम में खेलने वाली एकमात्र मुस्लिम महिला खिलाड़ी शमा परवीन की कहानी

परचम फहरा रहीं बिहार-झारखंड की मुस्लिम लड़कियां...

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मुस्लिम लड़कियां भी अब जिंदगी में कामयाबी की मिसाल बनने लगी हैं। खेल हो या शिक्षा, हर क्षेत्र में वह तेजी से दखल देती हुई इंटरनेशनल चैंपियनशिप तक में नाम कमा रही हैं। बिहार की शमा परवीन और झारखंड की इबराना परवीन दो ऐसी ही कामयाब लड़कियां हैं, जिन्हें अपने घर-परिवार में माता-पिता की ओर से आगे बढ़ने के लिए अपने भाइयों की अपेक्षा ज्यादा प्रोत्साहन और सहयोग मिला है।

ईरान में हुए एशियन कबड्डी चैंपियनशिप में शिरकत करने वाली भारतीय महिला टीम में सिर्फ एक मुस्लिम महिला खिलाड़ी बिहार की शमा परवीन रही हैं। वह टीम में रेडर और डिफेंडर, दोनों ही तरह से खेलती हैं। 

जमशेदपुर (झारखंड) में हाल ही में इंटर कॉमर्स की टॉपर रहीं इबराना परवीन और मोकामा (बिहार) के गांव मोअज्जमचक की शमा परवीन जैसी लड़कियां नई पीढ़ी में अपनी कामयाबियों की नई इबारत लिख रही हैं। इबराना परवीन की दिनचर्या से सीख मिलती है कि जीवन में बड़ी सफलताएं कभी भी आसानी से नहीं मिल जाती हैं। होनहार बिरवानों को भी इसके लिए बचपन से ही कठोर साधना से गुजरना पड़ता है। मानगो की आजाद बस्ती में रह रहीं इबराना रोजाना ही सुबह चार बजे से पढ़ाई में जुट जाती हैं। इसके बाद घर के कामों में मां का हाथ बंटाती हैं। उसके बाद कॉलेज निकल जाती हैं। वहां लौटकर पिता की पान की दुकान पर जा बैठती हैं और ग्राहकों को संभालने लगती हैं।

इबराना अपने पांच भाई-बहनों में दूसरे नंबर की हैं। वह एमबीए करने के बाद सिविल सेवा में अपनी किस्मत आजमाना चाहती हैं। हौसले बुलंद हैं। वह अपने पूरे शहर की सुर्खियों में हैं। उनकी कठोर साधना और कमजोर आर्थिक हालत को देखते हुए प्रदेश के मंत्री सरयू राय उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का भरोसा दे चुका हैं। साथ ही भाजपा महिला जिलाध्यक्ष नीरू सिंह उनको हाल की कामयाबी पर सम्मानित कर चुकी हैं। इबराना को अपनी पढ़ाई में माता-पिता और पड़ोसी शिक्षक मुहम्मद शहजाद आलम से भी पूरा सहयोग मिलता है। मुहम्मद शहजाद तो इबराना को पढ़ाने का कोई शुल्क नहीं लेते हैं। मां अफसाना बेटी की मेहनत को देखकर बातचीत में भावुक हो जाती हैं।

वह बताती हैं कि कितने मुश्किल हालात में वह अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं। इतनी कमरतोड़ महंगाई में एक छोटी-सी पान की दुकान से सात लोगों का पेट भरना आसान नहीं है लेकिन वह कत्तई हिम्मत हारने वाली नहीं हैं। वह चाहती हैं कि बेटी इबराना के आईएएस बनने का सपना किसी भी कीमत पर पूरा हो जाए। 

इबराना की तरह कबड्डी में नाम रोशन करने वाली पटना (बिहार) जिले के मोकामा क्षेत्र की शमा परवीन के सामने भी घर-परिवार के आर्थिक हालात आड़े आ रहे हैं। मां फरीदा खातून गृहिणी हैं। पिता मोहम्मद इलियास बाटा की दुकान में काम करते थे। जब वह बंद हो गई तो घर में ही जनरल स्टोर की दुकान चलाने लगे लेकिन उससे घर की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं। शमा की चार बहनें और दो भाई हैं। बड़ी बहन की शादी हो चुकी है। सीमित संसाधनों में वह जैसे-तैसे अनुग्रह नारायण महाविद्यालय से ग्रेजुएट की शिक्षा ले पा रही हैं।

जहां तक कबड्डी की बात है, उनके गांव में खेलकूद का कोई मैदान नहीं है। क्षेत्र का शैक्षणिक वातावरण भी ठीक नहीं है। ये गुदरी के लाल ऐसे हालात से जूझते हुए किस तरह बुलंदियों पर पहुंच रहे हैं, इनके जिंदगीनामा से बखूबी जाना जा सकता है। ईरान में आयोजित एशियन कबड्डी चैंपियनशिप जीतने के बाद तो शमा का मनोबल और बुलंद हो गया है। मुख्यमंत्री ने उनको बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर बनाने का भरोसा दिया है।

शमा के इलाके में सन् 1990 से लगातार सालाना कबड्डी प्रतियोगिताएं हो रही हैं। वह स्वयं वर्ष 2009 से कबड्डी खेल रही हैं। उनके साथ और भी कई लड़कियां कबड्डी खेलती रही हैं लेकिन वक्त के साथ वह इस खेल से मुंह मोड़ती गईं पर शमा ने आज भी हार नहीं मानी है। वर्ष 2010 में भोजपुर में आयोजित हुई राज्यस्तरीय सब जूनियर प्रतियोगिता में राज्य कबड्डी संघ की ओर से शमा को सम्मानित किया गया था। उससे शमा को प्रोत्साहन मिला तो नेशनल कबड्डी टीम तक पहुंच गईं। जिन दिनों शमा के क्षेत्र में कबड्डी टूर्नामेंट्स के आयोजन होने लगे थे, संयोजक कमेटी में उनके पिता मोहम्मद इलियास भी होते थे।

उन्होंने कई बार क्षेत्र की लड़कियों की टीम बनाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे। सामाजिक वर्जनाओं के कारण लोग अपनी बेटियों को कबड्डी नहीं खिलवाना चाहते थे लेकिन इलियास ऐसी भावनाओं से ऊपर उठकर शमा को प्रोत्साहित करते, खेलने के लिए बाहर भी भेजते रहे। यद्यपि उन्हें भी सामाजिक और घरेलू उलाहनों का सामना करना पड़ा। बाद में शमा को जूनियर, सीनियर कबड्डी प्रशिक्षण दिया जाने लगा। कबड्डी संघ शमा के प्रदर्शन से उत्साहित होकर उनका मनोबल बढ़ाता रहा। इसी दौरान उन्हें कुशल प्रशिक्षकों से कबड्डी का बेहतर प्रशिक्षण मिला। अब तो वह कबड्डी की नेशनल टीम का हिस्सा हो चुकी हैं।

वह कहती हैं कि पहले उन्हें भी लगा था, कबड्डी खेलना फालतू किस्म का काम है, लेकिन अपने पिता, कबड्डी संघ एवं खेल प्रेमियों से उन्हें प्रोत्साहन मिलने लगा तो उन्होंने इसे ही अपने जीवन का मकसद बना लिया। शमा कहती हैं कि खेल में लड़कियों को किसी से कमजोर नहीं समझना चाहिए। एक बार ठान लें तो वे बहुत कुछ कर सकती हैं। सबसे जरूरी है अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण और लगातार कठोर साधना। वह चाहती हैं कि बिहार की प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर लड़कियों को खेलने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ ही कबड्डी खेलने के मैदान सरकार मुहैया कराए। शमा के पहले कोच उनके पिता मोहम्मद इलियास ही रहे, जिन्होंने अपनी तीनों बेटियों हीना, शमा और सुल्ताना को कबड्डी के मैदान में उतार दिया। हीना भी राष्ट्रीय स्तर तक के टूर्नामेंट्स में भाग ले चुकी हैं।

गौरतलब है कि ईरान में हुए एशियन कबड्डी चैंपियनशिप में शिरकत करने वाली भारतीय महिला टीम में सिर्फ एक मुस्लिम महिला खिलाड़ी बिहार की शमा परवीन रही हैं। वह टीम में रेडर और डिफेंडर, दोनों ही तरह से खेलती हैं। शमा कहती हैं कि देश के लिए खेलने का उनका वह पहला मौका था और वही उनके लिए सबसे बड़ी बात थी। उस चैंपियनशिप से उन्हें कई अनुभव मिले, जो आगे काम आएंगे। पाकिस्तान, ईरान जैसे मुस्लिम देशों की लड़कियों को खेलते देखकर उनको बहुत अच्छा लगा। उन देशों के मुकाबले भारत की मुस्लिम लड़कियां बहुत पीछे हैं। खेल में मुस्लिम लड़कियां कम सामने आ रही हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

शमा परवीन को एक साथ ढेर सारी मुस्लिम लड़कियों को खेलते देखना इस कारण भी अच्छा लगा क्यूंकि एक लड़की, खासकर मुस्लिम समाज से आने वाली लड़की के कारण उन्हे खुद अपने रिश्तेदारों और समाज के तानों और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। जब तक वह गांव में खेलती रहीं, तब तक उनके गांव के लोगों और रिश्तेदारों को कोई दिक्कत नहीं रही लेकिन जब खेलने के लिए वह बाहर जाने लगीं, उन्हे जींस और हाफ पैंट पहने देखकर लोगों की नाराजगी सामने आने लगी थी। इंटरनेशनल कामयाबी मिलने के बाद से अब तो वैसा कुछ नहीं है। सभी लोग उनका सम्मान करने लगे हैं। शमा के पिता इलियास कहते हैं कि वह कोई पेशेवर खिलाड़ी नहीं हैं। हां, उन्होंने इतना जरूर किया है कि बेटों के रहते उन्होंने बेटियों को आगे बढ़ाया है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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