दोस्ती का कोई 'मूल्य' नहीं, टूट जाए तो उससे बुरा कुछ नहीं...

कारोबार और जिंदगी चलती रहती है

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इस दुनिया में आते ही हमें कई रिश्ते खाली फोकट मिल जाते हैं। उन रिश्तों को बनाने में हमारा कोई योगदान नहीं होता, हमारे जिम्मे सिर्फ जिम्मेदारी होती है, उन रिश्तों को खाद पानी देने की, उन्हें निभाने और निभाते चले जाने की। लेकिन, दोस्ती एकदम अलहदा रिश्ता है। इसे हम खुद बनाते हैं, बाकी रिश्तों की तरह इस रिश्ते के लिए किसी तरह की औपचारिकता की जरुरत नहीं होती, सिर्फ प्यार और भरोसे की जरुरत होती है। मगर, एक दिन जब आपका वही जिगरी दोस्ता बिना कुछ कहे आपको छोड़ कर चला जाए, तो क्या कुछ गुजरती है, कैसे बीतती है जिंदगी। बता रहे हैं ‘मूल्य’ के संस्थापक प्रदीप सुंदरराजन, जिनका दोस्त सिर्फ दोस्ती ही नहीं था ‘मूल्य’ का को-फाउंडर भी था...

हमारे स्टार्टअप को बमुश्किल तीन साल ही हुए थे कि मेरे प्रिय सह-संस्थापक संतोष तुप्पड़ ने हमारा साथ छोड़ दिया। 24 साल की उम्र में उन्होंने 30 साल के शख्स (मेरे साथ) के साथ इस सफर की शुरुआत की थी।

प्रदीप सुंदरराजन
प्रदीप सुंदरराजन

मैं अच्छी तरह जानता हूं कि कोई 28 की उम्र में क्या सोचता है। मैंने इसी उम्र में पहली शुरुआत में नाकामी के बाद दोबारा उसी काम को शुरू किया था। मुझे लगता है कि संतोष भी शायद उसी दौर से गुजर रहा था, उसके अंदर की चिड़िया अकेले और अपनी स्टाइल में उड़ने को बेताब थी।

संतोष और मेरी मुलाकात फरवरी, 2009 में हुई थी, तब मैं एक क्लास में सॉफ्टवेयर टेस्टिंग पढ़ा रहा था। उस दौरान हम और वो बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे। हमलोग या तो फोन पर घंटों बातें करते थे या फिर दिन में कॉफी की दुकान पर मिलकर तमाम चीजों पर चर्चा किया करते थे और रात में हैकिंग-टेस्टिंग करते थे। हम लोग एक-दूसरे से बेहद करीब थे।

इस शानदार शख्स और मैंने, सह-संस्थापक मोहन की अगुवाई में मिलकर ‘मूल्य’ के सफर की शुरुआत की। मैं जब भी अपने दूसरे दोस्तों या रिश्तेदारों से मिलता था, वे संतोष के बारे में जरूर पूछते थे। इससे साफ है कि उसने न सिर्फ मेरे परिवार बल्कि दूसरे दोस्तों के दिमाग में भी अपनी एक जगह बना रखी थी।

...और एक दिन, उसने छोड़ दिया

स्टार्टअप का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा था। नहीं, नहीं, ये सही नहीं है। रोलर-कोस्टर में, आप ऊपर रहें या नीचे, आप हमेशा खुश रहते हैं। स्टार्टअप का सफर किसी बच्चे को जन्म देने जैसा होता है। एक असहनीय दर्द होता है, लेकिन आप उसे सहते-रहते हैं, क्योंकि आप इस दर्द में भी अपने बच्चे को मुस्कुराते, रोते और उसे बढ़ते देखते हैं। सह-संस्थापक हो या नहीं, कोई कर्मचारी भी अगर स्टार्टअप की सोच और दर्द को साझा करता है, तो स्टार्टअप उसका अपना ही होता है।

भावनाओं के बादल

संतोष के छोड़ने के फैसले के बाद पहले कुछ दिन तो मैं काफी भावनात्मक रहा। ये ठीक उसी तरह था जैसे मैं किसी फिल्म को फ्लैशबैक में देख रहा था। हमारे सफर का उतार और चढ़ाव, वो काम जो हमने साथ मिलकर किए। उसकी सारी मेहनत और ‘मूल्य’ के लिए किया गया उसका योगदान और फिर दिल तोड़ने वाला उसका फैसला, मैं तुम्हें बहुत मिस करूंगा। मैंने किस तरह उस दिन खुद को टूटने से रोका था।

कुछ लोग कहते हैं कि कारोबार की मांग है कि आप कम भावनात्मक रहें। मैं सिक्के के दोनों पहलुओं से रू-ब-रू हो चुका था। अगर मैं इसे पूरी तरह सिर्फ कारोबार के तौर पर देखता, तो मैं बस उससे हाथ मिलाता और उसे उसके अच्छे भविष्य की कामना करते हुए आगे बढ़ जाता। लेकिन ये कारोबार से कहीं ज्यादा था। वो एक दोस्त था, हम लोगों ने साथ मिलकर एक सपना देखा था और उसे फलते-फूलते देखा था, और अब वो हमें छोड़कर जा रहा था।

प्रदीप (बाएं), संतोष (दाएं)
प्रदीप (बाएं), संतोष (दाएं)

एक दोस्त का सह-संस्थापक होना बेहद खतरनाक है, हालांकि अगर ये काम कर जाए तो काफी कामयाब भी होता है

‘मूल्य’ इतनी कामयाबी तक इसलिए पहुंचा क्योंकि हम दोस्तों ने मिलकर इसे शुरू किया और इस कंपनी को आगे बढ़ाया। जब मैं हम लोग कहता हूं, तो उसमें संतोष और धनशेखर सुब्रह्मण्यम, सुनील कुमार, परिमाला हरिप्रसाद, मनोज नायर और मोहन पंगुलुरी जैसे कई लोग शामिल होते हैं। 2008 तक हममें से कोई भी एक दूसरे को जानता तक नहीं था, और आप जानते हैं हमें किसने मिलाया, टेस्टिंग ने हमें एक-दूसरे से मिलाया। हम लोग टेस्टिंग के लिए इसी तरह का जुनून रखते हैं। टेस्टिंग के ये बड़े सितारे बहुत अच्छे दोस्त बने और फिर इस सोच पर भरोसा करते हुए अपनी-अपनी नौकरी छोड़ दी (क्योंकि हम लोगों ने एक साथ इस सपने को देखा था, एक शुरुआत की बिल्कुल किसी कहानी जैसी)।

हम लोगों ने खुद से फंडिंग की और धीरे-धीरे 65 लोगों की टीम बन गई (जिसमें 62 टेस्टर हैं) जिनके प्रोजेक्ट्स पूरी दुनिया में फैले हैं और जिनके पास रीपिट कस्टमर्स की सबसे ज्यादा संख्या है। हमारे पास 98% ग्राहकों के विवरण और उल्लेख हैं। 50 ग्राहकों के 98% जिनके साथ हमने काम किया। इनमें 37 तो स्टार्टअप्स शामिल हैं। इस जमाने में भी ये संभव है, क्योंकि दोस्त एक साथ मिलकर कुछ भी हासिल करने के लिए तैयार हैं।

हालांकि, कारोबार लोगों को काफी व्यस्त कर देता है और दोस्ती के लिए कोई वक्त नहीं बचता है। यहीं से समीकरण बदलने लगते हैं। हर कोई हैरान रहता है और सोचने लगता है, क्या ये मेरा दोस्त बोल रहा है या कोई कारोबारी बोल रहा है? ये बहुत ही दुखद भावना है, जिससे मेरे दोस्त गुजर चुके हैं।

मैंने दोस्ती और कारोबार को अलग रखने की अहमियत को समझा। एक हद तक हमें दोस्ती की जरुरत होती है और अगर हम इस दोस्ती को उस हद से आगे भी ले जाते हैं तो ये एक-दूसरे पर हावी होने लगता है। मैं इस बात को समझ गया कि जो आपको यहां मिला, वो आपको वहां नहीं मिलेगा। अब मैं अपने दोस्तों को दोस्त की तरह अपने कारोबार से अलग देखता हूं। वरना, यहां कोई दोस्त नहीं होगा और वहां कोई कारोबार नहीं होगा क्योंकि सबकुछ अलग-अलग हो जाएगा।

लोग जानना चाहते थे कि आखिर हुआ क्या?

हर कोई मुझसे एक ही सवाल पूछता था, क्या हुआ था? मैं खुश था कि अर्णब गोस्वामी ने मुझे लाइव टीवी शो पर बैठा कर मुझसे ये सवाल नहीं किया कि भारत जानना चाहता है, हमें बताइए क्या हुआ था?

संतोष छोड़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने छोड़ दिया। अब वो अपने अगले स्टार्टअप पर काम कर रहे हैं और मुझे मालूम है कि वो इसमें भी कामयाब होने वाले हैं। वो खुश है, मैं खुश हूं और हम सब खुश हैं। लोग ये सुनना नहीं चाहते हैं। दरअसल, लोग एक कहानी सुनना चाहते हैं। ऐसा लग रहा है जैसे सच विश्वास के लायक नहीं है या मैं उन लोगों से कुछ छिपा रहा था। वो और नौकरियां और मौके पैदा करने वाला है, तो कोई उसे लेकर दुखी क्यों होगा?

‘बिजनेस ऐज युजुअल’ का मतलब

अब उस बात को एक महीने से ज्यादा बीत चुके हैं और अब सब कुछ पहले जैसा सामान्य है। इसलिए नहीं कि हम उसे याद नहीं करते, बल्कि कारोबार की मांग है कि हम सामान्य हो जाएं। ऐसा नहीं होने पर काम रुक जाएगा और हमने जिस मकसद से इस स्टार्टअप को बनाया है, वो बेकार हो जाएगा।

आपने क्यों कहा कि वो ‘किंग ऑफ गुड टाइम्स’ था?

कई दिन गुजर गए, मैंने एक दिन अचानक उसे फोन किया और पूछा कैसे हो? इस पर उसने जवाब दिया, चलो मिलते हैं। हम लोग एक बार में मिले और व्हिस्की और शराब के साथ हम दोस्तों की तरह बात करने लगे। उस मुलाकात के बाद हम अपने-अपने रास्ते पर चल दिए। कुछ घंटे बीत गए, मैंने अपना फोन उठाया और एक मैसेज टाइप किया, आज की मुलाकात से मैं काफी खुश हूं और हमें इस तरह अकसर मिलना चाहिए। धन्यवाद। मैं ये टाइप कर पाता, मुझे उसका एसएमएस मिला। (मैसेज में वही मेरे शब्द थे, बस लिखने का तरीका थोड़ा अलग था): उसने लिखा था, चलो हम इसी तरह अकसर मिलते रहेंगे। अपना समय देने के लिए धन्यवाद। तुम्हारी शाम अच्छी हो।

हम लोगों ने कई मुद्दों पर बात की जिससे मुझे उससे काफी कुछ सीखने में मदद मिली, जो कई चीजों में जरूरी बदलाव लाने के लिहाज से अहम थे। हम लोगों ने इस तरह बीच-बीच में मिलने और साथ-साथ अच्छा वक्त गुजारने का फैसला किया। अच्छे वक्त का राजा (द किंग ऑफ गुड टाइम्स) हमेशा ही दोस्ती होती है। विजय माल्या बुरा मत मानिएगा।

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