माँ-बाप के दिखाए रास्ते पर चलीं मल्लिका, 'परिणाम' में मिली खुशी और संतुष्टि

शहरी गरीबों के विकास के लिए खुद को किया समर्पित...अत्यंत गरीब लोगों की ज़िंदगी में भी लायी खुशियाँ...विज्ञापनों की चकाचौंध को छोड़ गरीब ज़िन्दगियों को किया रौशन...कार्यक्रमों के विस्तार से गरीबी हटाने की कोशिश है जारी ...

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हर देश में गरीब लोग हैं। कुछ देशों में कम हैं तो कुछ में बहुत ज्यादा, लेकिन हर जगह गरीब हैं। दुनिया-भर में गरीबों के विकास, कल्याण और उत्थान के लिए कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, कई योजनाएं लागू की जा रही हैं। काम सरकारों की ओर से हो रहा है और गैर-सरकारी संस्थाएं, निजी संगठन , स्वयंसेवी और अन्य लोग भी गरीबों की मदद में लगे हुए हैं। ऐसे ही लोगों में एक हैं युवा मल्लिका घोष। 

मल्लिका घोष "परिणाम" नामक गैर-सरकारी संस्था की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और कार्य-निर्देशक यानी मुखिया हैं। "परिणाम" भारत के २० राज्यों में शहरी गरीब लोगों के जीवनस्तर को ऊँँचा उठाने ले लिए काम कर रहा है। मल्लिका ने अत्यंत गरीब लोगों के उत्थान के लिए ऐसे कार्यक्रम शुरू लिए हैं जिसने भारत में एक नया सकारात्मक बदलाव लाया है और कई गैरसरकारी संस्थाओं की प्राथमिकताओं और सोच को बदला है। मल्लिका ने अपने माता-पिता से प्रेरणा लेकर समाज-सेवा शुरू की थी।

मल्लिका के माता-पिता - इलियाने और समित घोष ने अपनी-अपनी नौकरियाँ छोड़कर समाज-सेवा का मार्ग अपनाया था। दोनों बैंकिंग सेक्टर में थे और दुनिया-भर में कई देशों का दौरा कर खूब अनुभव हासिल किया हुआ था ।

मल्लिका के पिता समित ने दुनिया के अलग-अलग जगहों पर गरीबी को काफी करीब से देखा। कई गरीबों से बाचचीत कर उनका हाल जाना था । उनकी समस्याओं और उनके परिष्कार को जानने की कोशिश की। गरीब लोगों की समस्याओं, उनके दुःख-दर्द के समित को हिलाकर रख दिया। समित ने नौकरी छोड़कर भारत में गरीब लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा उठाने के लिए खुद को समर्पित करने का फैसला कर लिया। चूँकि समित बैंकिंग क्षेत्र के जानकार थे उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर ही गरीब लोगों की मदद करने की सोची। साल २००५ में समित ने "उज्जीवन" नाम से एक माइक्रो फाइनांस ऑर्गनिज़ैशन की शुरुआत की। "उज्जीवन" ने शहरी गरीब लोगों की मदद करना शुरू किया। इस संगठन ने शहरी गरीबों ख़ासकर महिलाओं को कम ब्याज पर क़र्ज़ देना दिया । मसकद था इन रुपयों से महिआएं कारोबार करेंगी, जिससे उनका जीवन-स्तर ऊंचा उठेगा। समित जानते थे कि गरीब लोगों को अगर रोज़गार या कारोबार के मौके दिए जाएँ तो उनकी कई सारी समस्याएं अपने आप सुलझ जाएंगी।

रोज़गार ना होने या फिर कारोबार करने की ताकत न होने की वजह से ही कई लोग गरीब बनकर रह जा रहे थे। समित ने "उज्जीवन" के ज़रिये गरीबों को कम ब्याज पर रुपये देकर उन्हें छोटे-मोटे कारोबार करने और रुपये कमाने का मौका दिया था।

वित्त-वर्ष २०१३-१४ के अंत तक "उज्जीवन" ने १३ लाख से ज्यादा लोगों को कर्ज देकर उनकी वित्तीय सहायता की थी। आज "उज्जीवन" एक बहुत बड़ा संगठन हैं , एक कामयाब प्रयोग भी। "उज्जीवन" की देश के २२ राज्यों में करीब ३५० शाखाएं हैं।

लेकिन, समित की पत्नी को लगा कि सिर्फ आर्थिक मदद से गरीबों का उत्थान संभव नहीं हैं। गरीबों के सर्वांगिण विकास के लिए और भी बहुत किया जाना ज़रूरी है। गरीबों को दूसरी सारी ज़रूरी सुविधाएं और मदद मुहैया कराने के मकसद ने एलियाने घोष ने "परिणाम" नाम से एक गैर-सरकारी संस्था को शुरू किया। इस संस्था ने शिक्षा , स्वास्थ-चिकित्सा, सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में काम करना शुरू किया और गरीबों की मदद की।

शुरू में तो इलियाने ने खुद अपने बूते पर ही सारी संस्था चलायी , लेकिन बाद में उन्हें उनकी बेटी मल्लिका से काफी मदद मिली।

२०१० में मल्लिका ने मन बनाया कि वे भी अपने माता-पिता की तरह की गरीबों के उत्थान के लिए काम करेंगी।

मल्लिका घोष की स्कूली शिक्षा इंग्लैंड में हुई। उन्होंने यूएसए से उच्च शिक्षा हासिल की।

मल्लिका को बचपन से ही टीवी और फिल्मों का शौक था। इस वजह से उन्होंने फिल्मों की दुनिया में ही अपने कॅरियर बनाने का फैसला किया था।

विदेश में फिल्म बनाने की कला सीखी थी। अपनी पढ़ाई के बाद मल्लिका ने सात साल तक एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री में काम किया। मल्लिका ने मशहूर अंतर्राष्ट्रीय एडवरटाइजिंग एजेंसी "मेक्कान ऍरिक्सन" के लिए काम किया। वो इस कंपनी में फिल्म्स डिपार्टमेंट की साउथ इंडिया हेड भी रहीं।

नौकरी करते समय एक दिन अचानक मल्लिका को एहसास हुआ कि उनके माँ-बाप रात-दिन गरीबों के विकास के लिए मेहनत करते हैं। उनका सारा ध्यान गरीबों की तरक्क़ी में ही लगा रहता है। उनका ध्यान इस बात पर भी गया कि किस तरह से दोनों मिलकर गरीबों को छोटी-छोटी रकम देकर उन्हें कारोबार करने , मुनाफा कमाने और अपना जीवन भी कामयाब और सुखी बंनाने में उनकी मदद कर रहे हैं। गरीब लोगों के लिए एक छोटी ही सी रकम उनकी ज़िंदगी बदलने को काफी थी।

लेकिन , मल्लिका जिस एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री में थी वहां ३० सेकण्ड की एक फिल्म बनाने के लिए लाखों-करोड़ों रूपये खर्च कर दिया जाते। करोड़ों रुपये खर्च कर फिल्म बनाने के बाद भी ना फिल्म बनाने वाले पूरी तरह खुश होते ना ही फिल्म बनवाने वाले यानी क्लायन्ट।

अपने माता-पिता से कामकाज से अपने काम की तुलना करते-करते मल्लिका को लगा कि अब उनका भ्रम टूटने लगा है और इसी प्रक्रिया के दौरान उन्होंने फैसला कर लिया कि वो भी अपने माँ-बाप की राह पर ही चलेंगी।

चूँकि मल्लिका को बच्चे बहुत पसंद थे उन्होंने बच्चों के लिए काम करने में अपनी रूचि दिखाई। नर्सरी स्कूल से शुरुआत की । लेकिन, दो ही हफ़्तों में मल्लिका हर रोज़ एक ही तरह के कामकाज और कार्यक्रमों से ऊब गयीं। नर्सरी स्कूल छोड़ दिया और बच्चों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों के बारे में जानकारी हासिल करनी शुरू की। इसी दौरान पिता ने मल्लिका को सलाह दी कि उनकी माँ खुद एक गैर सरकारी संस्था चला रही हैं और मल्लिका को अपनी माँ के काम में हाथ बटाना चाहिए। मल्लिका ने पिता की सलाह मान ली और "परिणाम" के लिए काम करना शुरू किया।

माँ ने मल्लिका को अपनी संस्था में इंटर्न रखा। लेकिन, मल्लिका खुद को कन्सल्टन्ट बताने लगीं। मल्लिका को एड इंडस्ट्री में सात साल का अनुभव था और वो साउथ इंडिया हेड की तरह काम कर चुकी थीं , ऐसे में उन्हें खुद को इंटर्न कहना अच्छा नहीं लगा।

माँ ने मल्लिका को बड़ी परियोजनाओं पर काम करने का मौका दिया। मल्लिका ने शुरूआती दिनों में बच्चों की शिक्षा के कार्यकर्म की रूप-रेखा तैयार की। माँ ने मल्लिका को बच्चों के सम्मर कैंप की जिम्मेदारी सौंपी। ये "परिणाम" का पहला सम्मर कैंप था। मल्लिका ने मेहनत और लगन से इस कैंप को कामयाब बनाया। ये कामयाबी का पहला पड़ाव था।

काम में मल्लिका की बढ़ती दिलचस्पी को देखकर माँ ने उन्हें ऑपरेशन्स यानी संस्था के संचालन की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी।

मल्लिका बताती हैं कि "परिणाम" के पंजीकरण में ही कई सारी दिक्कतें आयी थीं। सम्बंधित अधिकारियों के पंजीकरण के लिए रिश्वत माँगी थी। माँ रिश्वत देने के शख्त खिलाफ थीं। इसी वजह से पंजीकरण में तीन साल का समय लग गया। बड़ी जद्दोजेहद के बाद कंपनीज़ एक्ट के सेक्शन २५ के अंतर्गत "परिणाम" का पंजीकरण के गैरसरकारी संस्था के तौर पर हुआ।

ये संस्था दान और अनुदान की राशि पर ही चलती है। परिणाम को - माइकल एंड सुज़ेन डेल फाउंडेशन, सिटी फाउंडेशन , एचएसबीसी बैंक और कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर दान-अनुदान देते हैं। इन्हीं की दी हुई राशि के बल पर परिणाम के सारे कामकाज होते हैं।

मल्लिका की पहल का ही ये नतीजा था कि "परिणाम" ने अपने वित्तीय मामलों को बिना किसी ढिलाई और गलतियों के चलाया। "परिणाम" में बहुत ही रुपये प्रशासनिक कामों पर खर्च किये जाते हैं। ज्यादा से ज्यादा राशि गरीबों के उत्थान से जुड़े कार्यक्रमों में लगाई जाती है ।

"परिणाम" की सबसे बड़ी खासियत ये है कि वो गरीब लाभार्थियों के कोई फ़ीज़ या कोई रकम नहीं लेती।

२०१० में जब मल्लिका "परिणाम" से जुडी थीं , तब संस्था कुछ शैक्षणिक कार्यक्रम और सम्मर कैंप चलाती थी। मलिक्का ने "परिणाम" के कार्यक्रमों का विस्तार किया। नए कार्यक्रम शुरू किये। नयी योजनाएं लागू कीं। कई बड़े और क्रांतिकारी कदम उठाये। मल्लिका की कोशिशों और मेहनत ने ही "अल्ट्रा पुअर प्रोग्रम" को कामयाब बनाया। ये प्रोग्राम आज कई संस्थाओं के लिए एक मॉडल है। इस प्रोग्राम का मकसद है गरीबों में भी सबसे गरीब लोगों , यानी अत्यंत गरीब लोगों की वित्तीय सहायता करना। मल्लिका की माँ को अपने काम-काज से दौरान ये पता चला कि लोग गरीबों की मदद तो करते हैं , लेकिन अत्यंत गरीब की ओर कोई नहीं देखता। संस्थाओं और बैंकों को लगता है कि अत्यंत गरीब लोग कर्ज के पैसे चूका नहीं सकते। लेकिन, मल्लिका की माँ ने ठान ली वो अत्यंत गरीब लोगों को काम ब्याज पर रुापये देंगी और ऐसा करते हुए उन्हें भी कारोबार करने और रुपये कमाने का मौका दिलाएंगी। माँ की एक योजना को मल्लिका ने साकार रूप दिया।

मल्लिका ने अपनी माँ और खुद की संस्था - "परिणाम" का अपने पिता समित के संगठन "उज्जीवन" से औपचारिक समझौता कराया और अत्यंत गरीब लोगों की आर्थिक रूप से मदद शुरू की। "परिणाम" ने पचास हज़ार के बैंक खाते खुलवाये हैं और गरीबों लोगों को बचत करने के लिए प्रेरित किया है। ७०० से ज्यादा अत्यंत गरीब परिवार "अल्ट्रा पुअर प्रोग्रम" से लाभ उठा चुके हैं।

"परिणाम" की एक और योजना बहुत ही कामयाब रही। इस योजना का नाम है "दीक्षा"। इस योजना के ज़रिये गरीब और अत्यंत गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ने-लिखने का मौका दिया गया। ७५ हज़ार से ज्यादा बच्चे इस योजना का लाभ उठाकर शिक्षित हो चुके हैं।

"परिणाम" और भी कई कार्यक्रम चला रहा है। लक्ष्य एक ही है - अत्यंत गरीब और गरीब लोगों को आत्म-निर्भर बनाना , उन्हें रोज़गार के अवसर दिलाना, कारोबार करने के लिए प्रेरित करना , शिक्षा और स्वस्थ समबन्धी उनकी ज़रूरतों को पूरा करना।

इस बात ने दो राय नहीं "परिणाम" ने झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले और दूसरे कई परिवारों को गरीबी के बाहर निकाला है उनका जीवन स्तर ऊँँचा उठाया है। "परिणाम" की स्थापना करने वाले इलियाने नवम्बर २०१३ में ये दुनिया छोड़कर चली गयीं।

तबसे मल्लिका अकेले ही "परिणाम" को आगे बढ़ा रही हैं। अपने नए विचारों , अथक प्रयास से मल्लिका अपनी माँ के दिखाए रास्ते पर चलते हुए अत्यंत गरीब और गरीब लोगों की ज़िंदगी में भी खुशियाँ ला रही हैं।

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