हैदराबाद की महिलाओं को रोजगार देने के साथ-साथ सशक्त बना रहा है 'उम्मीद'

ये एनजीओ औरतों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उन्हें दे रहा है मजबूती...

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उम्मीद से जुड़ी प्रत्येक महिला को एक निश्चित वेतन मिलता है। जो कि उत्पाद बनाने में लगने वाले घंटे के आधार पर तय होती है जो कि 1500 रुपये से लेकर 3,000 रुपये के बीच हो सकती है। उत्पादों की कीमत 200 रुपये से लेकर 1,200 रुपये तक है।

महिलाओं को उनके हैंडीक्राफ्ट बेचने के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाता है 'उम्मीद'
महिलाओं को उनके हैंडीक्राफ्ट बेचने के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाता है 'उम्मीद'
'उम्मीद' ने मटका की झोपड़ी से 38 वर्षीय मुन्नी बेगम नाम की एक महिला की मदद की और उनके परिवार की आय में मदद की। मुन्नी का पति एक ऑटो चालक के रूप में काम करता है, और पहले, उसके सात साल के बेटे को परिवार के लिए कमाई करने के लिए काम करना पड़ता था। 

काफी प्रचलित पंक्ति है कि 'महिलाएं आज पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं।' हालांकि बहुत कम कम महिलाओं को ऐसा मौका मिल पाता है। लेकिन हैदराबाद की महिलाएं अब सशक्त हो रही हैं। गौरी महेंद्र और उदिता चढ्ढा ने हैदराबाद में 2015 में एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) 'उम्मीद' की शुरूआत की थी। उनका उद्देश्य महिलाओं को सरल और सुंदर पर्यावरण के अनुकूल हस्तशिल्प बनाने और बेचने में प्रशिक्षण देना था। इससे वे महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देना चाहती थीं। तीन साल पहले 33 वर्षीय जबीना (बदला हुआ नाम) घरेलू हिंसा से पीड़ित थीं। तब वह अपने पति के साथ रहती थीं जो रोज जबीना और उनके दो बच्चों को पीटा करता था। हैदराबाद में माख्ता की मलिन बस्तियों के एक रूढ़िवादी परिवार से संबंध रखने वाली जबीना को अपने घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी, जिससे वित्तीय बाधाओं ने उसके बेटे को बाल मजदूरी करने पर मजबूर किया।

हालांकि, आज सब बदल गया है। अपने पति से तलाकशुदा, जबीना अपने बच्चों के साथ रहतीं है और वह अपनी आजीविका खुद कमाती हैं। जबीना कहती हैं कि "मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया है। और मैं एक स्वतंत्र महिला हूं। मैंने अपने बच्चों की मनोदशा में मेरे प्रति एक बड़ा बदलाव देखा है। वे मुझे पहले से ज्यादा सम्मान और विश्वास करते हैं।" ये अकेले जबीना की कहानी नहीं है। लगभग इसी तरह की समस्या से पीड़ित हैदराबाद के कई हिस्सों से 30 अन्य महिलाओं ने उम्मीद एनजीओ को ज्वाइन किया है। ये गैर-सरकारी संगठन गौरी महेंद्र और उदीता चढ्ढा ने 2015 में महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया था। इसके अलावा महिलाओं को जीवन-कौशल जैसे जोखिम, नियोजन, बजट और टीम वर्क सिखाया जाता है।

पुस्तकों से पहले रोटी

लखनऊ में पली-बढ़ीं गौरी ने अपने दादा जी (जो कि एक आंख-सर्जन थे) से प्रेरणा ली। उनके दादा जी ने उत्तर प्रदेश के गांवों में जरूरतमंदों के लिए मुफ्त शिविरों का आयोजन किया था। उन्होंने लैनकेस्टर यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन से मानव संसाधन और ज्ञान प्रबंधन का अध्ययन किया, और साथ ही उन्होंने कॉर्पोरेट और गैर-लाभकारी क्षेत्रों का भी अनुभव किया है। गौरी भी जेनपैक्ट में सीएसआर प्रबंधक के रूप में काम करती हैं। उदिता हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस स्नातक हैं। और शुरूआत करने से पहले तीन वर्षों में कॉरपोरेट सेक्टर में काम किया है। महिलाओं को सशक्त बनाने में एक मजबूत विश्वास करने वाली उदिता ने प्लेटफार्म बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जहां महिलाओं ने अपनी पहचान और क्षमता का पता लगाया। हालांकि, उदिता ने अमेरिका से सोशल वर्क में मास्टर्स करने के लिए पिछले साल 'उम्मीद' को छोड़ दिया था।

गौरी और उदिता की मुलाकात 2013 में हैदराबाद में दो साल की फैलोशिप कार्यक्रम के दौरान हुई। जहां उन्होंने यूसुफगुडा झुग्गी में सरकारी स्कूल में वंचित बच्चों को एक साथ पढ़ाया था। गौरी कहती हैं कि "मेरी कक्षा में कई छात्र नियमित रूप से अनुपस्थित रहते थे क्योंकि वे बाल श्रमिक थे। वे अपने परिवार को सपोर्ट करने के लिए कमाई करते थे।" उनके लिए बड़ा अहसास यह था कि, "शिक्षा इन बच्चों के लिए दूसरी प्राथमिकता थी क्योंकि उन्हें पहले भोजन के लिए लड़ना पड़ता था।" गौरी ने जब इन बच्चों की मां से मुलाकात की तो उन्हें उन महिलाओं की कई घरेलू समस्याओं का सामना करना पड़ा। वे कहती हैं, "उनमें से कुछ अपने परिवार के लिए काम करके पैसा कमाना चाहतीं थीं, लेकिन उनके परिवार ने उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं दी।"

जब गौरी ने उदिता व टीच फॉर इंडिया फेलो के अन्य लोगों से बात की तो वे गौरी के साथ मिलकर कुछ करने के लिए उत्सुक थे। शुरूआत में गौरी और उदिता ने अपने छात्रों की माताओं से बात की और स्कूल जाने के बाद उनसे जुड़ने के लिए कहा। शुरू में केवल पांच ने ज्वाइन किया। गौरी कहती हैं कि, "पति महिलाओं को घर से बाहर भेजकर कुछ कमाने के बारे में आशंकित थे, उन्होंने सोचा कि हम शायद उनकी पत्नियों का ब्रेनवॉश कर दें। इसलिए, हमने पतियों से भी हमसे जुड़ने के लिए कहा और कहा कि देखिए कि हम अपने सेशन में क्या करते हैं।" कुछ कक्षाओं के बाद, बहुत से लोगों ने समझा कि यह पहल उनके परिवार की मदद करेगी। और इसी ने उम्मीद में लोगों का विश्वास जगाया।

'उम्मीद' ने मटका की झोपड़ी से 38 वर्षीय मुन्नी बेगम नाम की एक महिला की मदद की और उनके परिवार की आय में मदद की। मुन्नी का पति एक ऑटो चालक के रूप में काम करता है, और पहले, उसके सात साल के बेटे को परिवार के लिए कमाई करने के लिए काम करना पड़ता था। आज, मुन्नी ने गर्व से अपने बच्चे को स्कूल में भेज दिया है। मुन्नी कहती हैं कि "इससे पहले, मेरे पति मुझे हर जगह ले जाते थे। मुझे पैसों को संभालना और बस रूट के बारे में जानकारी नहीं थी। उम्मीद आने के बाद मैं हर रोज बस से सफर करती हूं इससे मुझे काफी आत्मविश्वास मिला।"

एक समग्र विकास

गौरी कहती हैं कि "उम्मीद केवल प्रशिक्षण फैसिलिटी ही नहीं है, बल्कि हमारे साथ काम करने वाली महिलाओं के समग्र विकास के लिए एक जगह है। ये कौशल अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने, उन्हें सशक्त बनाने, और आखिरकार प्रगतिशील लोगों के लिए उनके आसपास के दमनकारी मनोदशा को बदलते हैं। इसलिए, ये उनके पूरे परिवार के लिए बेहतर जीवन प्रदान करती है।" उम्मीद के लिए तीन पहलू हैं - कौशल-प्रशिक्षण, मूल्य और मानसिकता, और एक्सपोजर। जब एक महिला उम्मीद ज्वाइन करती है, तो संगठन के साथ उनकी पहली मीटिंग चार से पांच घंटे तक होती है। शामिल होने के पहले दो महीनों में उन्हें ओरिएंटेशन दिया जाता है। और उसे अपनी कठिनाइयों को साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

गौरी कहती हैं कि "हम पहले उनसे बात करते हैं और उनके साथ अच्छे संबंध बनाते हैं। यह सिर्फ स्किलिंग और उत्पाद बनाने के बारे में नहीं है, हम उनसे साधारण मूल्यों जैसे गरिमा, आत्मसम्मान, स्थिरता, पर्यावरण, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामान्य ज्ञान जैसे आधार कार्ड की बात करते हैं।" उम्मीद में महिलाएं कॉस्टर, चटाई, लैंप, पर्दे, साथ ही साथ दिया जैसे मौसमी आइटम और क्रिसमस की सजावट जैसे उत्पाद बनाती हैं। रॉ मटेरेयिल्स को उम्मीद द्वारा प्रदान किया जाता है, और सबसे ज्यादा टिकाऊ उत्पादों जैसे समाचार पत्र, मिट्टी और धागा हैं। महिलाएं वर्क फ्रॉम होम करती हैं। जहां वे काम खत्म करने के बाद सप्ताह के अंत सामान एनजीओ ले आते हैं। गौरी कहती हैं कि "प्रारंभिक चरणों में, महिलाएं हमसे पूछती हैं कि, 'हम सिलाई की तरह कुछ क्यों नहीं कर सकते,' या 'हमारे उत्पादों का प्लास्टिक उत्पाद के साथ कैसे मुकाबला होगा', लेकिन तब हम उन्हें टिकाऊ जीवन और रीसाइक्लिंग की आवश्यकता को समझाते हैं।"

जीवन बदल रहा है

उम्मीद से जुड़ी प्रत्येक महिला को एक निश्चित वेतन मिलता है। जो कि उत्पाद बनाने में लगने वाले घंटे के आधार पर तय होती है जो कि 1500 रुपये से लेकर 3,000 रुपये के बीच हो सकती है। उत्पादों की कीमत 200 रुपये से लेकर 1,200 रुपये तक है।

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