कॉमनवेल्थ से लेकर जूनियर वर्ल्ड कप में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारत की मनु भाकर

सबको हैरत में डाल रही ये सोलह साल की लड़की!

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जर्मनी में आईएसएसएफ जूनियर विश्व कप में एक और गोल्ड मेडल अपने नाम कर लेने वाली झज्जर (हरियाणा) के गोरिया गांव की सोलह साल की मनु भाकर ने अपनी अचूक निशानेबाजी से सबको हैरत में डाल दिया है। इतनी कम उम्र में अब तक इंटरनेशनल प्रदर्शनों में लगभग आधा दर्जन गोल्ड मेडल उनकी झोली में आ चुके हैं। ये सिलसिला इस साल के अंत तक जारी रहेगा। वह दो-तीन सप्ताह ही भारत में रहेंगी।

 उनका सपना डॉक्टर बनने का था लेकिन शूटिंग के दो-दो गोल्ड हासिल करने के बाद अब उनको भी अहसास हो चुका है कि पढ़ाई और खेल दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते।

भारत की सबसे युवा शूटिंग गोल्ड मेडलिस्ट का रिकॉर्ड बना चुकीं झज्जर (हरियाणा) के गांव गोरिया की मनु भाकर ने जर्मनी के सुहल में चल रही आईएसएसएफ जूनियर विश्व कप में 10 मीटर वूमन एयर पिस्टल प्रतियोगिता फतह करते हुए एक और गोल्ड मेडल भारत के नाम कर लिया है। जर्मनी के इस सीनियर और जूनियर वर्ल्‍डकप में भाग लेने के बाद मनु एशियाई खेलों में, फिर युवा ओलिंपिक खेल, फिर वर्ल्‍ड चैम्पियनशिप में वह खेलने वाली हैं। यानी 2018 के अंत तक वह सिर्फ दो-तीन सप्ताह ही भारत में रहेंगी। जर्मनी में मनु के ताजा प्रदर्शन से उनके घर झज्जर में पिता रामकृष्ण भाकर और मां सुमेधा की खुशियां सातवें आसमान पर हैं। उनको लगातार बधाई संदेश मिल रहे हैं।

इससे पहले मेक्सिको में आईएसएसएफ वर्ल्‍डकप में मनु महिला 10 मीटर एयर पिस्टल में दो बार की चैम्पियन एलेजांद्रा जवाला को पछाड़कर स्वर्ण पदक अपनी झोली में डाल चुकी हैं। हाल में उन्होंने कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में नया रिकॉर्ड बनाते हुए एक और गोल्ह लेकर अपने दो साल के निशानेबाजी करियर में इतने शानदार प्रदर्शन से हर किसी को हैरत में डाल दिया है। डेली हाइजीन ब्रांड ‘पीसेफ’ ने हाल ही में उनको अपना पहला ब्रांड एम्बेसडर नियुक्त किया है। इस सोलह साल की स्वर्ण परी की कामयाबियों का ये सिलसिला हर देशवासी के मन में उनके बारे में बहुत कुछ जानने, सुनने की जिज्ञासा पैदा करता है।

बॉक्सिंग, एथलेटिक्स, स्केटिंग, जूडो कराटे आदि खेलों में भी हाथ आज़माती रहीं मनु को उनके सहपाठी 'ऑलराउंडर' कहते हैं। खेल-कूद में अव्वल मनु पढ़ाई में भी काफी दिलचस्पी रखती हैं। वह झज्जर के यूनिवर्सल स्कूल में इंटरमीडिएट की छात्रा हैं। उनका सपना डॉक्टर बनने का था लेकिन शूटिंग के दो-दो गोल्ड हासिल करने के बाद अब उनको भी अहसास हो चुका है कि पढ़ाई और खेल दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। उनकी पढ़ाई बीच में न रुक जाए, इसके लिए स्कूल से उनको काफी मदद मिलती है। मनु की मां सुमेधा स्कूल प्रिंसिपल हैं और बड़े भाई अखिल आईआईटी की तैयारी कर रहे हैं।

सुमेधा भाकर बताती हैं- 'उनका बेटा पढ़ाई करना चाहता था। मनु खेलों में जाना चाहती थी। वह बच्चों के काम और अभिरुचि में रोक-टोक पर भरोसा नहीं करतीं। इससे उनके आत्मविश्वास पर असर पड़ता है। मनु अभी तो 12वीं में है। जब वह दसवीं की परीक्षा दे रही थी, तब भी मैंने उसे उसी ढंग से लिया और वह अच्छे नंबरों से पास हुई।' मनु कहती हैं कि शूटिंग में वह अभी और अनुभव हासिल करना चाहती हैं। जूनियर स्तर की प्रतियोगिताओं और सीनियर स्तर की प्रतियोगिताओं का स्तर काफी अलग होता है। दोनों की चुनौतियां अलग-अलग तरह की होती हैं। इससे अनुभव मिलता है। टूर्नामेंट से पहले दोनों तरह के दबावों से निपटना सीखा जाता है। शूटिंग का पदक ऐसे ही नहीं मिल जाता है। किसी भी प्रतिस्पर्धा में पदक अपनी योग्यता से लेना पड़ता है। उन्हें पता है कि एशियाई खेलों में बहुत सारे मजबूत दावेदार होते हैं लेकिन वह हर टूर्नामेंट में अपना सर्वश्रेष्ठ करना चाहती हैं। वैसे वह मानती हैं कि जो गिर के उठते हैं, वही चैम्पियन होते हैं। उनकी ट्रेनिंग जारी है।

वह उम्मीद करती हैं कि शूटिंग से वह देश को आगे भी गौरवान्वित करती रहेंगी। इसी साल मार्च में भी उदीयमान निशानेबाज मनु ने अपना शानदार फार्म बरकरार रखा था। आईएसएसएफ जूनियर विश्व कप में एक और स्वर्ण पदक जीत कर भारत की झोली में डालने के साथ ही तब तक चार गोल्ड मेडल वह हासिल कर चुकी थीं। अब तो मनु के रजत पदक भी स्वर्ण में तब्दील होने लगे हैं। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में चल रही जूनियर वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप में मनु ने अपने साथी खिलाड़ियों मुस्कान और दिव्यांशी राणा के साथ मिलकर प्रतिद्वंदियों को कड़ी टक्कर दी थी। इस मुकाबले में उन्हें दूसरा स्थान प्राप्त हुआ, लेकिन पहले स्थान पर रही चीन की टीम डिसक्वालिफाई होने के कारण उनका रजत पदक भी स्वर्ण पदक में बदल गया था।

अपनी इकलौती बिटिया की सफलता से अभिभूत पिता रामकृष्ण भाकर बताते हैं कि उसे स्वर्ण, रजत या कांस्य पदक जीतना है, ऐसी बातें दिमाग में लेकर मनु खेल स्पर्धाओं में भाग नहीं लेती। उसका ध्यान सिर्फ अपने निशाने पर रहता है। यही वजह है कि खेल दौरान उस पर किसी तरह का मानसिक दबाव नहीं होता। वह अपना चित्त सिर्फ सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन पर एकाग्र किए रहती है। वह इस बात से वाकिफ है कि जीतना और हारना तो खेल का हिस्सा है। सीनियर वर्ल्‍डकप में पदार्पण के दौरान उसके स्वर्ण पदक ने उन्हें सबसे ज्यादा खुशी प्रदान की थी। वह पेशे से मरीन इंजीनियर हैं लेकिन पिछले दो साल में बस तीन महीने के लिए ही शिप पर जा सके हैं। उसके सपनों को साकार करने के लिए उन्होंने अपना सपना छोड़ दिया। पिछले डेढ़-दो साल से वह नौकरी से दूर रहकर बेटी के साथ-साथ हर शूटिंग घूम रहे हैं।

रामकृष्ण भाकर बताते हैं कि मुन ने कई खेलों पर हाथ आज़माने के बाद 2016 में शूटिंग यानी निशानेबाज़ी करने का फ़ैसला किया। पहली बार में ही स्कूल में जब उसने एक इवेंट में उसने हिस्सा लिया तो निशाना इतना सटीक लगाया कि स्कूल के टीचर दंग रह गए थे। फिर थोड़ी प्रैक्टिस और ट्रेनिंग के बाद उसके प्रतियोगिताओं में भाग लेने का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन समस्या ये थी कि वह लाइसेंसी पिस्टल के साथ सार्वजनिक यातायात के वाहन में सफर कर नहीं सकती थी। नाबालिग होने से वह खुद भी गाड़ी चलाकर शूटिंग में नहीं जा सकती थी। वैसे भी 0शूटिंग बहुत मंहगा इवेंट है। एक-एक पिस्टल दो-दो लाख की आती है। अब तक मनु के लिए वह तीन पिस्टल खरीद चुके हैं।

एक साल में वह करीब 10 लाख रुपए उसकी खेल गतिविधियों पर खर्च कर देते हैं। यह खर्च वह कभी दोस्तों से तो कभी रिश्तेदारों से जुटाते रहते हैं। जिस पिस्टल से निशाना साधकर मनु भारत को गोल्ड पर गोल्ड दिला रही है, उसके लाइसेंस के लिए ढाई महीने इंतज़ार करना पड़ा था। आम तौर पर ये लाइसेंस खिलाड़ियों को एक हफ्ते में मिल जाता है। पिछले साल मई में उन्होंने विदेश से पिस्टल मंगवाने के लिए अर्जी दी थी लेकिन झज्जर ज़िला प्रशासन ने आवेदन रद्द कर दिया। बात जब मीडिया की सुर्खियां बनने लगी तो पता चला कि उनके अप्लीकेशन पर लाइसेंस मांगने की वजह 'सेल्फ डिफेंस' लिख दिया गया था। ज़िला प्रशासन ने उस पर जांच बैठा दी। उसके बाद एक सप्ताह में ही लाइसेंस मिल गया। जब पहली बार पिस्टल खरीदने की ज़िद मनु ने की, तो उनका सबसे पहला सवाल था - कम से कम दो साल तो ये खेल खेलोगी न? हालांकि मनु की तरफ से उस वक्त कोई ठोस भरोसा उन्हें नहीं मिला था, फिर भी उन्होंने पिस्टल खरीद दी। इस साल अप्रैल में उसको शूटिंग की प्रैक्टिस करते हुए दो साल हो गए। उससे पहले उसने इतना नाम कर दिया है कि मुझे मेरे सवाल का जवाब भी मिल चुका है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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