कूड़े और केंचुओं से जैविक खाद बनाकर निर्मला कंडलगांवकर ने लिखा नया इतिहास

भारत में कचरे से बिजली बनाने वाली पहली महिला भी हैं निर्मलासदियों पुरानी तकनीक के साथ विज्ञान को जोड़कर किया कमालखुद गाँव-गाँव जाकर किसानों को किया जागरुककई यूरोपीय देशों को कर रही हैं जैविक खाद बनाने वाली यूनिट सप्लाईवर्मीकम्पोस्ट और बायौगैस की अग्रणी ‘‘विवाम’’ से दुनिया जीतने वाली निर्मला की कहानी है निराली

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लगभग 63 वर्ष की निर्मला कंडलगांवकर देखने में बिल्कुल एक आम हिंदुस्तानी गृहणी जैसी ही लगती हैं। लाल सिंथेटिक साड़ी, माथे पर बड़ी बिंदी और बेतरतीब बिखरे बाल उन्हें किसी मध्यमवर्गीय महिला से अलग नहीं लगने देते हैं। लेकिन समाज के प्रति उनका योगदान जानने के बाद हर कोई उनका मुरीद हो जाता है।

राह में आने वाली तमाम चुनौतियों को पार करते हुए निर्मला ने एक असामान्य से व्यवसाय ‘‘वर्मीकम्पोस्टिंग’’ यानि की केंचुओं की सहायता से जैविक खाद के निर्माण और बायोगैस प्लांट को प्रारंभ किया और आज उन्हें भारत में कचरे से बिजली बनाने वाली पहली महिला के रूप में जाना जाता है।

निर्मला का जन्म महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में एक शिक्षक परिवार में हुआ। बायोलाॅजी से स्नातक करने के बाद वे समाज सेवा के काम में लग गईं और इसी दौरान 1978 में उनका विवाह गिरीश से हो गया। बच्चों के बड़े होने के बाद, कई वर्षों तक परिवार की जिम्मेदारी सफलतापूर्वक संभालने के बाद आखिरकार निर्मला को परिवारिक कामकाज से अवकाश मिला और उन्होंने ‘कुछ करने’ का फैसला किया।

निर्मला बताती हैं कि उन्हें सिर्फ सामाजिक कार्यों को करने का अनुभव था और उन्होंने गाँव और किसानों के लिये कुछ ऐसा करने की ठानी जिससे वे उनकी मदद भी कर सकें और अपने सामाजिक सरोकारों को भी पूरा कर सकें।

वे बताती हैं कि, ‘‘मैंने बचपन से ही देखा था कि अधिकतर किसान खेती से मुनाफा कमाने के बजाय नुकसान ही झेल रहे थे। किसान अपना अधिकतर पैसा अच्छी फसल के लिये रासायनिक खाद खरीदने में ही खर्च कर देते थे।’’

निर्मला आगे जोड़ती हैं कि उन्होंने बायोलाॅजी में स्नातक किया था और उन्हें मालूम था कि पारंपरिक पद्धति में किसान प्राकृतिक रूप से केंचुओं के द्वारा खाद खुद बनाते थे लेकिन आधुनिकता के नामपर आजकल के किसानों ने इस जैविक खाद के प्रयोग को बंद कर दिया था।

‘‘मैंने सोचा कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे प्राकृतिक खाद को फिर से प्रचलन में लाया जा सके और इसके लिये पहले मुझे कई पीढि़यों पहले इसे तैयार करने में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक का गहराई से अध्ययन करना पड़ा। पारंपरिक पद्धति कारगर तो थी लेकिन वैज्ञानिक नहीं। ’’

विज्ञान की छात्रा रहने के कारण उन्होंने इस दिशा में नए प्रयोग करने शुरू किये और एक वर्ष के समय में अपने ध्येय को पाने में सफल रहीं। प्रयोग के तौर पर इन्होंने पारंपारिक रूप से इस्तेमाल होने वाले गड्ढे के स्थान पर धातु के डिब्बे का इस्तेमाल किया। निर्मला धीरे-धीरे कूड़े पर केंचुओं के उत्सर्जन को समझ गईं और उन्होंने आॅर्गेनिक खाद के अच्छे उत्पादन के लिये सही तापमान और मिट्टी की स्थिति इत्यादि के बारे में भी पूरी प्रैक्टिकल ट्रेनिंग ले ली।

‘‘हमारे पास गांव में जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा था जिसमें हमने पहले-पहल इस खाद को बनाना शुरू किया और आसपास के लोग जल्द ही हमारी बनाई खाद में विश्वास दिखाने लगे। हमने 20 से 25 हजार की लागत लगाकर खाद बनाने वाले कुछ डिब्बे बनाए और बिना लाभ कमाए लागत पर ही बेच दिये।’’

किसानों को उनके द्वारा बनाई गई इस खाद को अपने यहां बनाना काफी सुविधाजनक लगा और वे उन्हें इसके लिसे संपर्क करने लगे। मांग बढ़ती देखकर निर्मला ने इस काम को व्यवसायिक रूप से करने का फैसला किया और ‘‘विवाम एग्रोटेक’’ की नींव रखी। निर्मला बताती हैं कि उनका मकसद लोगों को यह बताना था कि आॅर्गेनिक खाद अधिक लाभप्रद है और इसके इस्तेमाल से किसान अपनी फसल की उत्पादकता को बढ़ा सकता है।

निर्मला बताती हैं कि शुरू में उन्होंने खुद की बनाई इस खाद को पैकेट बनाकर किसानों को बांटा और उन्हें छोटे गमले में इस्तेमाल करने के लिये कहा। नतीजे चैंकाने वाले रहे और जल्द ही किसानों के बीच उनके द्वारा तैयार की गई खाद बनाने की ‘‘मशीन’’ की मांग बढ़ गई।

‘‘20 हजार रुपये कीमत की हर यूनिट में 200 क्यूबिक फुट के एक डिब्बे के अलावा केंचुओं की कीमत और उसे लगाना भी शामिल था। साथ ही हम किसान के घर जाकर उसे अपशिष्ट से खाद बनानी भी सिखाते।’’ निर्मला मुस्कुराते हुए आगे बताती हैं कि शुरुआती वर्ष में वे सिर्फ 3 यूनिट ही बेच पाईं लेकिन उससे अगले साल उन्होंने 25 यूनिट बेचीं।

इसी बीच निर्मला पति के साथ दिल्ली किसी काम से आईं और इत्तेफाक से उनकी मुलाकात कृषि मंत्रालय में तैनात एक वरिष्ठ अफसर वंदना द्विवेदी से हुई। यह मुलाकात निर्मला के जीवन में मील का पत्थर साबित हुई और वे और उनका यह प्रोजेक्ट देश-दुनिया में मशहूर हो गया।

‘‘मैंने वंदना जी को अपने काम के बारे में बताया और उन्होंने मेरे काम से प्रभावित होकर दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित होने वाले विश्व व्यापार मेले के एग्रकल्चर पेवेलियन में मुफ्त में एक स्टाल दिया। मैंने इस मौके को दोनों हाथों से लपका और देशभर से लोगों और विशेषज्ञों का सामना किया।’’

निर्मला बताती हैं कि उस समय सरकार भी आॅर्गेनिक खेती के प्रचार-प्रसार में लगी हुई थी और अपने उत्पाद की वजह से ‘‘विवाम एग्रोटेक’’ सरकारी रडार पर आ गया। सरकार ने उनके द्वारा बनाई गई खाद बनाने की यूनिट खरीदने पर सब्सिडी देनी शुरू की। जैविक खाद की सफलता से प्रेरित होकर निर्मला ने अपने इस काम को अगले स्तर तक ले जाने का फैसला किया और बायोगैस के उत्पादन में कुछ करने की ठानी।

धुन की पक्की निर्मला ने जल्द ही एक ‘‘मिनी बायोगैस प्लांट’’ बनाया जिसे पानी की टंकी की तरह ही घर की छत पर लगाया जा सकता है। इस प्लांट का पहला प्रयोग उन्होंने अपनी सोसाइटी में ही किया और कूड़े से वे एक परिवार के काम लायक गैस का उत्पादन करने लगे।

‘‘जल्द ही हमारा बायोगैस प्लांट मशहूर हो गया ‘‘विवाम एग्रोटेक’’ ने चंदरपुर में पहला बड़ा प्रोजेक्ट लगाया। इस परियोजना में 12 लाख रुपये का खर्चा आया जिसे सरकार ने चुकाया। इस प्रोजेक्ट की सफलता को देखते हुए जल्द ही 15 अन्य निगमों ने हमसे संपर्क किया और बायोगैस प्लांट लगवाए।’’

निर्मला आगे बताती हैं कि यूरोपीय देशों में लोग रासायनिक खादों में विकसित उत्पादों का प्रयोग नहीं करते हैं इसलिये उन देशों में ‘‘विवाम एग्रोटेक’’ के बनाए यूनिट एक्सपोर्ट होते हैं। अब विवाम का पूरे देश में नेटवर्क है और भविष्य में निर्मला जैविक खाद के उत्पादन के लिये एक बड़ी मशीन बनाने का इरादा रखती हैं जिसमें रोजाना सैंकड़ों टन कूड़े को प्रयोग में लाया जा सके।