वो व्यक्ति जिसने दिये फिल्म इंडस्ट्री को नसीर, शबाना, स्मिता जैसे नगीने

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एक तरह से देखा जाए तो सत्यजित रे के निधन के बाद श्याम बेनेगल ने ही उनकी विरासत को संभाला। रे के बाद का भारतीय सिनेमा बेनेगल के फिल्मों के इर्द-गिर्द ही घूमता दिखाई पड़ता है। श्याम बेनेगल समानांतर सिनेमा के अग्रणी निर्देशकों में शुमार हैं। वह अंकुर, निशांत, मंथन, मंडी और भूमिका जैसी चर्चित फिल्मों के निर्माण से सिनेमा जगत में अपना खास मुकाम हासिल कर चुके हैं। 

साभार: सोशल मीडिया
साभार: सोशल मीडिया
श्याम बेनेगल उन फिल्मकारों के पथ-प्रदर्शक बनकर उभरे, जो फिल्मों को महज मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते थे। दरअसल श्याम बेनेगल की फिल्में अपने आप में एक आंदोलन की शुरूआत हैं। जहां समाज के हर वर्ग का चेहरा हमें झांकता हुआ मिलता है। फिर चाहे बात मंडी की रुकमिनी बाई की हो जिसके कोठे में हर वक्त कोई न कोई हलचल मची रहती है या फिर इंसानियत के बूते जिंदा रहने वाली मम्मो की। 

बेनेगल की हर फिल्म का अपना एक अलग अंदाज होता है। उनकी हास्य फिल्में भी भारतीय सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहीं। उनकी हास्य फिल्मों में केवल हास्य ही शामिल नहीं है, बल्कि ये लोगों तक कोई न कोई सामाजिक संदेश भी पहुंचाती हैं। बेनेगल ने 1200 से भी अधिक फिल्मों का सफल निर्देशन किया है। इनमें विज्ञापन, व्यावसायिक, वृतचित्र एवं टेलीफिल्में भी शामिल हैं। 

श्याम बेनेगल उन फिल्मकारों के पथ-प्रदर्शक बनकर उभरे, जो फिल्मों को महज मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते थे। दरअसल श्याम बेनेगल की फिल्में अपने आप में एक आंदोलन की शुरूआत हैं। जहां समाज के हर वर्ग का चेहरा हमें झांकता हुआ मिलता है। फिर चाहे बात मंडी की रुकमिनी बाई की हो जिसके कोठे में हर वक्त कोई न कोई हलचल मची रहती है या फिर इंसानियत के बूते जिंदा रहने वाली मम्मो की। इतना ही नहीं बल्कि भूमिका में तो एक औरत की जिंदगी से जुडे कई पहलुओं पर श्याम बेनेगल ने बिना किसी झिझक के रोशनी डाली। वो भी तकनीक के हर छोटे बड़े पहलुओं पर ध्यान देते हुए। इसलिए उनकी हर फिल्म अपने आप में एक क्लासिक का दर्जा पा गई है। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बेनेगल को मिली तारीफों और पुरस्कारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है जितना किसी हिंदी फिल्म का क्रेडिट रोल भी नहीं होता।

एक तरह से देखा जाए तो सत्यजित रे के निधन के बाद श्याम बेनेगल ने ही उनकी विरासत को संभाला। रे के बाद का भारतीय सिनेमा बेनेगल के फिल्मों के इर्द-गिर्द ही घूमता दिखाई पड़ता है। श्याम बेनेगल समानांतर सिनेमा के अग्रणी निर्देशकों में शुमार हैं। वह अंकुर, निशांत, मंथन, मंडी और भूमिका जैसी चर्चित फिल्मों के निर्माण से सिनेमा जगत में अपना खास मुकाम हासिल कर चुके हैं। बेनेगल की फिल्में अपनी राजनीतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं। लोगों की अकसर शिकायत रहती है कि जब कोई फिल्मकार साहित्य पर कोई फिल्म बनाता है, तो उसमें साहित्य के मूल्यों की हत्या कर देता है। पर शायद ऐसे लोगों ने श्याम बेनेगल की फिल्में नहीं देखी, जिनमें साहित्य के किरदारों की तरह फिल्मों के किरदारों का खुद से द्वन्द्व होता है। अपनी फिल्म-गाथाओं को जरिया बनाकर वह समाज की चेतना को जगाने की कोशिश करते रहे हैं।

सिनेमा को अर्थपूर्ण बनाने वाले श्याम बेनेगल-

खुद उन्हीं के शब्दों में ‘राजनीतिक सिनेमा तभी पनप सकता है, जब समाज इसके लिए मांग करे। मैं नहीं मानता कि फिल्में सामाजिक स्तर पर कोई बहुत बड़ा बदलाव ला सकती हैं, मगर उनमें गंभीर रूप से सामाजिक चेतना जगाने की क्षमता जरूर मौजूद है।’ उन्होंने अपने करियर की शुरुआत विज्ञापन उद्योग से की। फिल्मों में अपनी उल्लेखनीय पारी की शुरुआत से पहले वह 900 से अधिक विज्ञापन फिल्में बना चुके थे। 1966-1973 तक उन्होंने पुणे के एफटीआईआई में छात्रों को फिल्म निर्माण के बारे में भी पढ़ाया। बेनेगल की फिल्मों ने केवल समानांतर सिनेमा को ही एक खास पहचान दिलाने में मदद नहीं की, उनकी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी और स्मिता पाटिल जैसे बेहतरीन कलाकार भी दिए। अर्थपूर्ण सिनेमा जब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था, तब उस दौर में आई बेनेगल की फिल्मों ने दर्शकों को तो आकर्षित किया ही, साथ ही अन्य फिल्मकारों को भी लगातार प्रेरित किया।

बेनेगल की हर फिल्म का अपना एक अलग अंदाज होता है। उनकी हास्य फिल्में भी भारतीय सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहीं। उनकी हास्य फिल्मों में केवल हास्य ही शामिल नहीं है, बल्कि ये लोगों तक कोई न कोई सामाजिक संदेश भी पहुंचाती हैं। बेनेगल ने 1200 से भी अधिक फिल्मों का सफल निर्देशन किया है। इनमें विज्ञापन, व्यावसायिक, वृतचित्र एवं टेलीफिल्में भी शामिल हैं। उन्होंने 1974 में अंकुर जैसी युग प्रवर्तक फिल्म बनाकर सिनेमा को एक नया आयाम दिया। इस फिल्म के साथ ही उन्होंने शबाना आजमी को रुपहले पर्दे पर उतारा। ख्यात फिल्म विश्लेषिका अरुणा वासुदेव के अनुसार, फिल्म निर्माताओं और दर्शकों में तकनीक और सिनेमाई समझ दोनों ही स्तर पर अनगढ़ता का माहौल था। 'अंकुर' ने इन्हें सुस्पष्ट कर नूतन आकार सौंपा। प्रयोगधर्मिता की धुरी पर अंकुर सही अर्थ में नई धारा की सूत्रवाहक सिद्ध हुई। इसके साथ ही श्याम बेनेगल के रूप में भारतीय सिनेमा के एक नए अध्याय का भी सूत्रपात हुआ।

जेंडर इक्वैलिटी को जीने वाले श्याम बेनेगल-

मंडी फिल्म बनाकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे ऐसे बोल्ड विषय पर भी फिल्म बना सकते हैं। धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध उपन्यास सूरज का सातवां घोड़ा पर आधारित इसी नाम से बनी उनकी फिल्म पितृसत्ता पर सवाल खड़े करती है, तो फिल्म सरदारी बेगम समाज से विद्रोह कर संगीत सीखने वाली महिला की कहानी पेश करती है, जिसे समाज अलग-थलग कर देता है, तो वहीं समर जाति प्रथा के मुद्दे को बेबाकी से उठाती है। बेनेगल के रचनात्मक कौशल का यह जादू था कि उनके आलोचक भी उनके कायल हुए बिना नहीं रह सके। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बेनेगल के बारे में कहा था कि उनकी फिल्में मनुष्य की मनुष्यता को अपने मूल स्वरूप में तलाशती हैं। आज दुनिया भर में लोग एयरकंडीशन वाले ऑफिस में बैठ कर महिला अधिकारों की बातें करते हुए फेमिनिस्ट होने का ढिंढोरा पीटते हैं। पर अपनी फिल्मों के जरिये श्याम बेनेगल समाज की उस स्त्री के साथ खड़े नजर आते हैं, जो कभी घर की चारदीवारी में कैद हो कर सेक्स की चाहत रखती हुई दिखाई देती है, तो कभी कोठे पर अपनी लाज बचाने के लिए संघर्ष करती हुई नजर आती है।

फिल्म निशांत का एक दृश्य
फिल्म निशांत का एक दृश्य

सिनेमा जगत में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए बेनेगल को 1976 में पद्मश्री और 1961 में पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया था। इतना ही नहीं, 2007 में वे अपने योगदान के लिए भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के अवार्ड से भी नवाजे गए। लंदन स्थित साउथ एशियन सिनेमा फाउंडेशन (एसएसीएफ) द्वारा जून, 2012 में बेनेगल को एक्सीलेंस इन सिनेमा अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। फाउंडेशन का मानना है कि बेनेगल ने भारतीय सिनेमा में एक नई तरंग का संचार किया है। श्याम बेनेगल अपने दोस्तों के बीच श्याम बाबू के नाम से पहचाने जाते हैं, जिनकी हर फिल्म गुरुदत्त की फिल्मों की तरह आखिर में सोचने को मजबूर कर देती है। सिनेमा के 100 साल पूरे होने के बावजूद श्याम बेनेगल का नाम उन डायरेक्टर्स की लिस्ट में शुमार है, जिन्हें भारतीय सिनेमा का आधार स्तंभ कहा जा सकता है।

जवाहरलाल नेहरू और सत्यजित राय पर वृत्तचित्र बनाने के अलावा उन्होंने 1980 के दशक के मध्य में दूरदर्शन के लिए बहुत-से धारावाहिक जैसे कि यात्रा, कथा सागर और भारत एक खोज भी बनाए। यह समय उनके लिए फिल्म निर्माण से लम्बे अलगाव का था। 1992 में आई फिल्म अंतर्नाद के साथ फिल्मी दुनिया में वापसी के साथ बेनेगल अपनी पुरानी और सक्रिय कार्यशैली में लौटे। श्याम बेनेगल की फिल्में अपने राजनीतिक-सामाजिक वक्तव्य के लिए जानी जाती हैं। इस विलक्षण फिल्मकार की अद्वितीय रचनाशैली का चमत्कार था कि उनके आलोचक भी उनकी प्रतिभा के कायल हुए बिना नहीं रह पाए।

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