"अपने सपनों को लक्ष्य बनाएँ" - रश्मि बंसल

"युवाओं के लिए मेरा सन्देश है कि वे जीवन के साथ प्रयोग करें, उसकी खोजबीन करें, कोई सपना पालें और उसे पूरा करने में जी जान से जुट जाएँ।”

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पाठकों के लिए रश्मि बंसल का नया तोहफा है, ‘अराइज़, अवेक’, जो अब सभी पुस्तक विक्रेताओं के यहाँ उपलब्ध है। उद्यमियों और उद्यमिता के बारे में लिखने वाली इस लेखिका ने पिछले साल स्वयं अपने उद्यम की शुरुआत की-‘ब्लडी गुड बुक्स’ के माध्यम से!

रश्मि बंसल
रश्मि बंसल

उद्यमिता पर उनकी कई पुस्तकें आ चुकी हैं और युवा विद्यार्थियों के साथ उनका अक्सर सघन संपर्क और संवाद होता रहता है इसलिए उनके पास परितंत्र (ecosystem) पर गहरी अंतर्दृष्टि है, जिसका लाभ पाठक और विद्यार्थी अक्सर उठाते रहते हैं। उनके जीवन के बारे में और उनकी पुस्तकों के विषय के बारे में अधिक जानकारी हासिल करने और उसे अपने पाठकों तक पहुँचाने के उद्देश्य से HerStory ने उनसे मुलाक़ात की।

प्रारम्भिक वर्ष

एक प्रख्यात खगोल-भौतिकी वैज्ञानिक (astrophysicist) की सुपुत्री, रश्मि बंसल का बचपन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) के परिसर में गुज़रा, जो दक्षिणी मुंबई के अंतिम सिरे पर स्थित है। इस विख्यात संस्थान के बारे में वे कहती हैं, “बचपन बिताने और बड़े होने के लिए यह अद्भुत जगह है।” उनकी स्कूली शिक्षा सेंट जोसेफ हाइ स्कूल और आर सी चर्च (कोलबा) में हुई और आगे उन्होंने सोफिया कॉलेज से उच्चतर पढ़ाई की और उसके बाद आई आई एम, अहमदाबाद से एम बी ए की डिग्री हासिल की।

एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी के रूप में-चश्मा लगाने वाली, गुमसुम सी रश्मि सदा कक्षा में प्रथम आती थीं-उनके हाथ में हर वक्त कोई न कोई किताब हुआ करती थी और कॉलोनी के लोग और सहपाठी समझते थे कि वे बहुत पढ़ाकू लड़की हैं, मगर...“वे किताबें कोर्स की किताबें नहीं बल्कि उपन्यास हुआ करते थे,” मुसकुराते हुए रश्मि ने रहस्योद्घाटन किया।

क्योंकि उन्हें गणित विषय पसंद नहीं था इसलिए उन्होंने कॉलेज में कला विषय लिया और सबसे पहले अर्थशास्त्र में बी ए की डिग्री हासिल की। जहाँ रश्मि रहती थीं, उन दिनों वहाँ आई आई टी से यांत्रिकी (इंजीनियरिंग), डॉक्टरी या अमरीका में छात्रवृत्ति लेकर पी एच डी करना कैरियर के सबसे लोकप्रिय विषय हुआ करते थे। जब उन्होंने उनमें से किसी भी विकल्प को नहीं चुना तो आसपास के लोगों की सामान्य प्रतिक्रिया का अनुमान आप लगा सकते हैं। वे बताती हैं, " वे आश्चर्य प्रकट करते, 'अरे...?' (अर्थात, तुम तो पढ़ने में तेज़ थी, फिर क्या हुआ?)। लेकिन मैं जानती थी कि मेरा रास्ता सही है।"

लेखक कैसे बनीं?

अपने कॉलेज के दिनों से ही रश्मि किताबें लिख रही हैं और एम बी ए की पढ़ाई पूरी करते ही उन्होंने अपना प्रकाशन समूह, जे ए एम (JAM) भी खोल लिया था।

अपनी पहली किताब, 'स्टे हंग्री, स्टे फुलिश' का आइडिया उन्हें राकेश बसंत से प्राप्त हुआ, जो CIIE, IIM, अहमदाबाद में प्रोफ़ेसर थे। "मुझे लगा, एक साथ 25 उद्यमियों से मिलकर उनकी कहानियाँ सुनना अत्यंत रोचक होगा। वह व्यक्तिगत प्रशिक्षण का शानदार अनुभव सिद्ध हुआ और मैंने उस अनुभव की रूह और ऊर्जा को अपनी किताब के माध्यम से लोगों तक पहुँचाया।" अपने परिचय में वे सामान्यतया अपने जीवन की व्यक्तिगत बातों को सामने नहीं आने देतीं। "मैं एक preप्रेक्षक हूँ और preप्रेक्षक भी कथ्य का छोटा-मोटा हिस्सा तो होता ही है।"

अपनी कहानियों के लिए रश्मि बहु-आयामी कथानकों की खोज में रहती हैं, जहाँ उद्यमी अपने जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव देखा हुआ होता है। मूलतः उनकी रुचि प्रथम पीढ़ी के उद्यमियों में होती है जो बिना पारिवारिक मदद के व्यवसाय या व्यापार की दुनिया में कूद पड़े होते हैं!

"वास्तव में, इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं बता सकती कि किसी विशेष कहानी की किस बात ने मुझे अधिक आकर्षित किया। कहानी विश्वसनीय होनी चाहिए और फिर ऐसी भी कि पाठक उसके साथ तादात्म्य स्थापित कर सके। इसके अलावा कथ्य के साथ पूरी ईमानदारी बरतना भी ज़रूरी है और अंततः उसे रोचक भी होना चाहिए। इसके अलावा मैं कोशिश करती हूँ कि मेरी कहानियों में बहुत सी जगहों, सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों का चित्रण हो, जिससे जो भी उसे पढ़े, उसे महसूस हो की यह 'मेरे जैसे' किसी व्यक्ति कि या 'मेरे शहर' की कथा है।"

अपनी किताबों में ताज़गी और नए-नए विचारों का समावेश हो, इसके लिए रश्मि देश भर में लगातार घूमती रहती हैं और हर साल लगभग 80 से 100 स्कूलों और कॉलेजों का दौरा करती हैं। "युवाओं में इतना अधिक उत्साह है लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि किस दिशा में आगे बढ़ा जाए। और फिर भी हर विद्यालय में कुछ युवा मिल ही जाते हैं, जिनमें कुछ अलग, कुछ नया और साहसिक काम करने का हौसला होता है। उनकी कहानियों ने ही मुझे 'अराइज़, अवेक' लिखने के लिए प्रेरित किया। "

उनकी ताज़ा किताब 'अराइज़, अवेक' उन विद्यार्थियों की कहानी कहती है, जिन्होंने कॉलेज में पढ़ते हुए ही अपनी कंपनी खोल ली थी।

"युवाओं के लिए मेरा सन्देश है कि वे जीवन के साथ प्रयोग करें, उसकी खोजबीन करें, कोई सपना पालें और उसे पूरा करने में जी जान से जुट जाएँ। कॉलेज में आप चीज़ों का मज़ा लेने आते हैं, कुछ कर दिखाने आते हैं और जेब खर्च लायक थोड़ी-बहुत कमाई हो जाए तो और भी अच्छा!। लेकिन आपके आइडिया इतने मौलिक भी हो सकते हैं कि वे किसी दूसरे संस्थान में जगह प्राप्त करने के स्थान पर आपके लिए कोई नई राह भी खोल सकते हैं। जैसे ही कोई मौका दिखाई दे, लपक लीजिए और शुरू हो जाइए!"

उद्यमी

जितने भी उद्यमियों से वे अब तक मिली हैं, सभी में तीन विशेषताएँ उन्हें दिखाई दीं-लक्ष्य, लक्ष्य के प्रति उमंग और उत्साह और लक्ष्य हासिल करने की धुन-और इन्हीं गुणों में वे एक और गुण जोड़ती हैं: पागलपन की हद तक आत्मविश्वास!

उन्हें लगता है कि कॉलेजों में और मीडिया में उद्यमिता के विचार को लेकर आज पहले से कहीं अधिक जागरूकता है। उद्यमिता पर पहले के मुकाबले अधिक सेमीनार और दूसरे आयोजन होते हैं, व्यापार योजनाओं पर प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं लेकिन फिर भी उन्होंने देखा है कि कई कॉलेजों में बहुत से आयोजन सिर्फ औपचारिकता मात्र होते हैं। उन्होंने तुरंत स्पष्ट किया कि उद्यमिता एक सैद्धांतिक विषय कतई नहीं है बल्कि व्यावहारिक और प्रयोगात्मक विषय है। उनके मुताबिक, कॉलेज के अहाते में ही विद्यार्थियों को अपना कोई छोटा सा व्यापार शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। वे कहती हैं, 

"राष्ट्रीय स्तर पर हमें लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए कि हर बैच के कम से कम 10% विद्यार्थी स्नातक होने के तुरंत बाद अपना कोई उद्यम शुरू करें!"

महिला उद्यमी

उनकी किताब, 'फॉलो एव्री रेनबो' महिलाओं को लेकर लिखी गई है। रश्मि बताती हैं कि इस किताब को लिखने का मुख्य मकसद उन महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करना था, जिन्होंने परिवार और व्यापार, दोनों क्षेत्रों में एक साथ काम करने का निर्णय किया है- काम को लेकर महिलाओं के सामने उपस्थित इस सनातन चुनौती को रेखांकित करना कि परिवार और व्यापार, दोनों के बीच तालमेल रखते हुए किस प्रकार जीवन में स्थिरता बनाए रखी जाए!

एक महत्वपूर्ण बिंदु जिसकी ओर वे इशारा करती हैं, वह यह है कि ज़्यादातर महिलाएँ ऐसे उद्यमों का चुनाव करती हैं, जो समय लेता है और क्रमशः, धीरे-धीरे विकास पाता है। वे कहती हैं, 

"ऐसा नहीं है कि महिलाएँ महत्वाकांक्षी नहीं होतीं या उनमें काबिलियत नहीं होती बल्कि वास्तव में बहुत सी महिलाएँ अपने व्यापार को तेज़ी के साथ विकसित ही नही करना चाहतीं, जिससे परिवार और व्यापार के बीच तालमेल न बिगड़े। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, व्यापार भी तेज़ी पकड़ लेता है। इस तरह जीवन के हर पहलू का बेहतर प्रबंधन उनके लिए सम्भव हो पाता है।"

महिला उद्यमियों के साथ अपने अनुभवों के आधार पर रश्मि बताती हैं कि बहुत से मामलों में, जहाँ व्यापार शुरू में ही तेज़ी से विकसित हो रहा है, परिवार के दूसरे सदस्यों की सहभागिता भी नज़र आती है क्योंकि घर के लोगों की उपस्थिति से व्यापार को कुछ भरोसेमंद लोग मिल जाते हैं।

वे मानती हैं कि वित्त एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें आम तौर पर महिलाओं का हस्तक्षेप कम होता है और इस समस्या के विभिन्न कारण होते हैं। आसपास कोई सफल उदाहरण न होना उनमें से प्रमुख है; अधिकांश महिलाओं ने अपनी माँओं या परिवार की अन्य महिलाओं को घर के वित्त प्रबंध में भागीदारी करते नहीं देखा होता और अधिकांश लड़कियों को युवावस्था तक भी वित्त प्रबंधन नहीं सिखाया जाता। आम तौर पर महिलाओं के लिए इसकी कोई पाबंदी नहीं होती मगर यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिससे कम से कम भारतीय महिलाएँ दूर रहना ही पसंद करती हैं।

महिलाओं को पैसे के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करने की ज़रूरत है: पैसे और आर्थिक मामलों में भागीदारी, पैसे का इंतज़ाम, निवेशकों से बातचीत आदि महत्वपूर्ण बाते हैं! इन बातों के अज्ञान या अल्पज्ञान को अपने व्यवसाय की तरक्की में रुकावट न बनने दें।

तालमेल

क्योंकि रश्मि यात्रा बहुत करती हैं, स्वयं उन्हें भी अपनी विभिन्न ज़िम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाना पड़ता है। यह पूछने पर कि वे सब कुछ कैसे संभाल लेती हैं, उनका जवाब था, 

"मुझे नहीं लगता मैं सब कुछ अच्छे तरीके से संभल पाती हूँ और कभी-कभी तो यह मेरी शक्ति और रुचि से परे निकल जाता है। लेकिन मैं कोशिश करती हूँ कि प्राथमिकताएँ तय करूँ और उनके अनुसार काम करूँ। ईमानदारी की बात यह है कि ज़्यादातर घरेलू काम मैं नहीं करती। लेकिन किसी के लिए भी सब कुछ पा लेना असंभव ही है। मेरे विचार में बहुत सी बातें आपके मानसिक संतुलन पर निर्भर करती हैं और इस पर कि कुछ भी हो जाए, आप अपनी शांति कैसे बनाए रखते हैं।"

इसके अलावा रश्मि किसी की साझेदारी में काम नहीं करतीं इसलिए उन्हें अपने तरीके से काम करने के लिए आवश्यक लचीलापन मिल जाता है और, उनके अनुसार, यह एक बहुत बड़ा लाभ है।

उद्यमिता के विकास में निवेशकों की भूमिका

उनके अनुसार, व्यवसाय के क्षेत्र में लगे हुए भिन्न-भिन्न लोगों को एकत्र करके उनके बीच संपर्क-सूत्र के रूप में काम करने वाले सहयोगी और उससे अधिक, उद्यमियों के परामर्शदाता के रूप में निवेशक बहुत सहायक हो सकते हैं।

“उन्हें घनिष्ठ रूप से सहभागी होने की ज़रूरत नहीं है (जैसे दैनिक परिचालन में), लेकिन वे उद्यमियों का मार्गदर्शन कर सकते हैं, उन्हें बाजार के विस्तृत फ़लक की बारीक जानकारियों से वाकिफ रख सकते हैं और उन्हें प्रेरित और प्रोत्साहित कर सकते हैं। यह बहुत नाज़ुक तालमेल होता है और आप उनका सहारा तो ले सकते हैं मगर उन पर पूरी तरह अवलंबित नहीं रह सकते। अगर उद्यमी और उसकी मुख्य टीम प्रोत्साहित नहीं है और उन्हें लगता है कि वास्तव में वे व्यवसाय के कर्ता-धर्ता नहीं हैं, व्यवसाय का नेतृत्व उनके हाथ में नहीं है तो फिर यह संबंध ज़्यादा समय तक नहीं चल पाता।”

भारत में परितंत्र (ecosystem ) में सुधार हेतु तीन मुख्य सिफ़ारिशें

रश्मि के अनुसार ये तीन सिफ़ारिशें इस प्रकार हैं:

  1. संरक्षक और सलाहकारों की भूमिका में काबिल लोग। ऐसे लोग, जिन्हें इस यात्रा का पर्याप्त अनुभव हो और जो अपने अनुभवों को उद्यमियों के साथ साझा कर सकें।
  2. फिर युवा उद्यमियों का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है जो ऊर्जा और नए विचारों से ओतप्रोत हों। विद्यार्थियों और सलाहकारों (mentors) के बीच सेमीनार आदि के ज़रिए लगातार संपर्क और बातचीत ज़रूरी है, जिससे विद्यार्थियों को उद्यमियों के प्रत्यक्ष अनुभवों का लाभ मिल सके। उद्यम के व्यावहारिक पहलू और प्रत्यक्ष अनुभव सैद्धांतिक ज्ञान से अधिक ज़रूरी है। जब आप विद्यार्थियों को छोटे-मोटे व्यवसाय संभालने की इजाज़त देते हैं, जैसे कैंटीन चलाना, तो उन्हें स्वयं कुछ नया करने का अवसर मिलता है और किसी उद्यम को चलाने की प्रत्यक्ष शिक्षा भी प्राप्त होती है।
  3. तीसरे, युवा और नए उद्यमियों को क़र्ज़ उपलब्ध कराने हेतु बैंकों को आगे आना चाहिए। हालाँकि सरकार उद्यमियों की सहायता के लिए कई तरह की योजनाएँ लेकर आती रही है मगर अधिकांश बैंक प्रबंधक अभी भी व्यापार-उत्पाद, यांत्रिकी या उद्योग के दायरे से बाहर नहीं निकल सके हैं। व्यापार-व्यवसाय के नए तरीकों के बारे में उन्हें प्रशिक्षित किया जाना अत्यंत आवश्यक है-इस तरह का प्रशिक्षण कि वे व्यवसाय में आए नए विचारों को जगह दे सकें। यह नए उद्यमियों को छोटे पैमाने पर प्रारंभिक पूँजी जुटाने में सहायक होगा।

भविष्य की परियोजनाएँ

रश्मि दो किताबों पर काम कर रही हैं-एक है, अक्षय पात्र संस्थान पर, जो प्रबंधन गुरुओं और आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा मिलकर तैयार की गई और कार्यान्वित की जा रही भारत की विशालतम मध्याह्न-भोजन परियोजना की कहानी कहती है। दूसरी ज़ी टीवी के सहयोग से तैयार हो रही है, जिसमें वे ‘उम्मीद’ थीम पर दर्शकों द्वारा भेजी जा रही कहानियों का चयन और सम्पादन (क्यूरेटिंग) करेंगी। इसके पीछे का विचार है, “परिस्थितियाँ कुछ भी हों, आम आदमी और आम औरत के भीतर एक दृष्टि और संकल्प का निर्माण करना, जिससे वे अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकें,” वे बताती हैं।