जम्मू कश्मीर से बिहार तक के बच्चों के लिए ऑनलाइन स्कूल बना यह ऐप

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2017 में स्थापित मुंबई का आस (AAS) विद्यालय ऐप कक्षा 6 से लेकर 10 तक के बच्चों को ऐसे कोर्स उपलब्ध करवाता है जिससे उन्हें घर बैठे सारी जानकारी मिल सके। इस ऐप की स्थापना विकास काकवानी ने की थी आज यह ऐप भारत को इंडिया से मिलवाने में मदद कर रहा है।

'आस' का मकसद स्मार्टफोन की मदद से बच्चों को सारी पढ़ाई मुहैया कराना है। इस ऐप के जरिए सारी क्लास को डाउनलोड किया जा सकता है और फिर बच्चे उसे ऑफलाइन भी देख सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर में लगातार हिंसा और तनाव के माहौल की वजह से अशांति रहती है। 2016-17 में उग्रवादी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी को 130 दिनों के लिए बंद कर दिया गया था। इसकी चपेट में वहां के स्कूल भी आए जिसका खामियाजा बच्चों को भी भुगतना पड़ा। यही वो वक्त था जब विकास काकवानी ने उन छात्रों की मदद करने के बारे में सोचा जो स्कूल नहीं जा सकते थे। 44 वर्षीय विकास आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से पढ़े हैं। उन्होंने आस ( AAS) विद्यालय की स्थापना की, दिसका मकसद किसी भी वक्त किसी भी जगह पर स्कूल की सारी चीजों को उपलब्ध करवाना है।

विकास ने 2017 सितंबर में AAS विद्यालय की स्थापना की थी। उनका मकसद सुविधाओं से वंचित बच्चों की मदद करना है। वह कहते हैं, 'कश्मीर में कई सारे स्कूलों को उग्रवादियों और अलगाववादियों द्वारा आग जला दी गई। इससे बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ा। दरअसल अलगाववादी चाहते हैं कि अगर बच्चे पढ़-लिख लेंगे तो वे हिंसा में शामिल नहीं होंगे और इससे उनका मकसद प्रभावित होगा। इसीलिए अलगाववादी स्कूलों को अपना निशाना बनाते हैं। वे नहीं चाहते कि कश्मीर के बच्चे पढ़ाई करें और आगे बढ़ें।'

आस का मकसद स्मार्टफोन की मदद से बच्चों को सारी पढ़ाई मुहैया कराना है। इस ऐप के जरिए सारी क्लास को डाउनलोड किया जा सकता है और फिर बच्चे उसे ऑफलाइन भी देख सकते हैं। ऐसे माहौल में अगर घाटी में इंटरनेट बाधित होता है तो भी वे अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं। हर साल 500 से अधिक बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने वाला आस विद्यालय की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। कक्षा 7 में पढ़ने वाली सफीना के पिता कहते हैं, 'पहले मेरी बेटी इस आस में रहती थी कि कब स्कूल खुलेगा और वो कब आस विद्यालय में पढ़ेगी।'

अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए इस आभासी विद्यालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट गांव स्कीम के साथ साझेदारी की है। विकास कहते हैं, 'यह स्कूल किसी भी वक्त किसी भी जगह एक्सेस करने पर आधारित है। इससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की समस्याएं हल की जा रही हैं। यह एक तरह से भारत का पहला आभासी स्कूल है। हमारा मकसद स्कूल को बच्चों के पास ले जाना है। हम नहीं चाहते कि स्कूलों की कमी की वजह से कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित रह जाए।'

अभी यह आभासी स्कूल कक्षा 6वीं से 10वीं तक के बच्चों को सीबीएससी बोर्ड आधारित शिक्षा प्रदान कर रहा है। यह ओपन बेसिक एजुकेशन आधारित प्रोग्राम, लेवल सी और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन लर्निंग जैसे कोर्स उपलब्ध करा रहा है। लेकिन यह आस विद्यालय सिर्फ कश्मीर तक ही सीमित नहीं है। अब यह स्कूल पूरे भारत में 1,800 कस्बों और गांवों तक जा पहुंचा है। इसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तर पूर्व के राज्य भी शामिल हैं। विकास का पूरा मकसद भारत और इंडिया के बीच का जो फर्क है उस खाई को पाटना है। विकास कहते हैं कि जो भारत है वो गांवों में बसता है वहीं जो इंजिया है वहां पर अच्छी कमाई और अंग्रेजी जानने, समझने और बोलने वाले लोग रहते हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 8.5 करोड़ बच्चे विभिन्न कारणों से स्कूल नहीं जा पाते हैं। इसमें टॉयलेट, सड़क, बिजली, किताब कॉपी जैसी सुविधाओं का न होना भी एक वजह है। विकास का कहना है कि अगर भारत को विकसित करना है तो भारत को अच्छे से शिक्षा सुविधा संपन्न होना पड़ेगा। आस विद्यालय ऐप को मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। विकास को उम्मीद है कि वे उन 8.5 करोड़ बच्चों तक पहुंचेंगे जिनके नसीब में अच्छी शिक्षा नहीं है। वे कहते हैं कि भारत में स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2019 में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों की संख्या 65 करोड़ हो जाएगी।

विकास कहते हैं, 'जब से 4जी नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है, हमारे दर्शकों की वीडियो देखने की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। डिजिटल मार्केटिंग के जरिएए हम उन स्टूडेंट्स तक पहुंच बना रहे हैं जो पहले से ही अपने स्मार्टफोन पर डिजिटल कंटेंट का उपभोग कर रहे हैं। हमने लॉन्चिंग के तीन महीने के भीतर ही हमने अपनी लागत को 2.8 रुपये प्रति यूजर कर दिया है।' यह वर्चुअल स्कूल किसी भी वास्तविक क्लासरूम और सिलेबस, टाइमटेबल, क्लासटीचर और विषय अध्यापकों की तरह व्यवहार करता है। यानी कि यहां भी आप वास्तविक स्कूल की भांति पढ़ाई कर सकते हैं।

वर्चुअल स्कूल के बच्चों की प्रगति की निगरानी की जाती है और पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए उनके साथ किसी सलाहकार की दृष्टि से व्यवहार होता है। बच्चे जो सीखते हैं उसका मूल्यांकन करते हैं। किसी भी बच्चे की प्रगति को तीन चरणों में मापा जाता है- उपस्थिति, पाठ्यक्रम को पूरा करने की प्रवृत्ति और परीक्षण। इस ऐप में पारदर्शिता बरती जाती है और बच्चे के माता-पिता अगर चाहें तो प्रगति को देख सकते हैं और उन अध्यापकों से संपर्क कर सकते हैं जो बच्चों को पढ़ा रहे होते हैं। बच्चों की भाषा, उनकी जगह को देखकर उनके मुताबिक अध्यापकों को लगाया जाता है। 20 साल का अनुभव लिए विद्या गणेश हाई स्कूल के बच्चों को इस ऐप के जरिए पढ़ाती हैं।

उन्होंने कहा, 'जिस दिन मैं अपनी सब्जी वाले भैया से सब्जी खरीद रही थी उसी दिन मैंने उससे इस ऐप के बारे में बताया। जब उसे इसके बारे में पता चला तो उसने सारा काम छोड़ कर अपना फोन मेरे सामने किया और मुझसे ऐप डाउनलोड करने को कहा। उतने में ही आसपास की औरतें इकट्ठा हो गईं। दरअसल वे भी इसके बारे में जानना चाहती थीं। उस दिन मुझे पता चला कि इस ऐप की कितनी अहमियत है। हम इसके जरिए शिक्षा के अधिकार को और भी अधिक दायरे तक विस्तृत कर रहे हैं।'

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