मध्य प्रदेश: मामाडोह के आदिवासियों ने लिखी पानी की नई कहानी

पांच-पांच किलो मीटर दूर के जलस्रोतों पर निर्भर रहे एक गांव के मुट्ठी भर आदिवासी परिवारों ने खुद का वाटर सप्लाई सिस्टम विकसित कर पानी की नई कहानी लिख डाली है...

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मामाडोह में किसी जमाने में सरकारी हैण्डपम्प लगा दिए गए थे। कुछ वक्त तक उनसे पानी मिलता रहा। उधर साल-दर-साल कुआँ गाद और कचरे से भरता रहा। चार में से दो हैण्डपम्प बन्द। जलस्तर नीचे चला गया। हालात इतने गम्भीर हो गए कि यहाँ के कई मवेशी पालकों को अपने बाड़े के अधिकांश दुधारू गाय-भैंसों को औने-पौने दामों में बेच देना पड़ा। परिवार गर्मियों में यहाँ से पानी और रोटी की तलाश में पलायन करने लगे। बीते दस सालों से इस गाँव में यही सिलसिला जारी था। आदिवासियों ने तहसील से लगाकर पानी के लिए गुहार लगाई लेकिन कुछ न हो सका।

मध्य प्रदेश के ज्यादातर जंगल क्षेत्रों के गांवों में लंबे समय से हैंडपंप बंद पड़े हैं। इसके अलावा प्राचीन जलस्रोत भी सूखे पड़े हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल समस्या का निदान करने के लिए तैनात पीएचई विभाग ठंडा पड़ चुका है।

नेताओं की ऊंची-ऊंची बात सुन लीजिए और जमीनी हकीकत देखिए। सच में जमीन-आसमान का अंतर नजर आने लगता है। मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले पेयजल के लिए घनघोर सरकारी उपेक्षा के शिकार हैं। शहडोल के दर्जनों गांवो में बारहो मास जलसंकट गहरा रहता है। सोहागपुर क्षेत्र में गांव के बैगा आदिवासी एक खुले बोर से रस्सी के सहारे डिब्बा-डिब्बा पानी निकाल कर अपना गुजारा करते हैं। पहाडग़ढ़ क्षेत्र के तमाम गांवों में हैंडपंप फेल हो चुके हैं। कितने बोर भी फेल। आदिवासी परिवार पांच किमी दूर से पानी लाने को मजबूर हैं। जंगलों में रहने वाले आदिवासी परिवार पानी के लिए ट्यूबवेल मालिकों से अनुनय-विनय करते रहते हैं। नदियों, झरनों के सूखने जाने से गर्मियों में तो मवेशियों के लिए भी पानी की त्राहि-त्राहि मच जाती है।

जनपद मुख्यालयों में बैठे अधिकारी जानकारी के बावजूद खामोशी साधे रहते हैं। ऐसे हालात में प्रदेश के खंडवा जिले में खालवा विकासखण्ड का मामाडोह एक ऐसा भी गाँव हैं, जहां के कोरकू जनजाति के आदिवासी परिवारों ने अपना खुद का वाटर सप्लाई सिस्टम विकसित कर लिया है। धावड़ी पंचायत के इस गाँव की आबादी करीब डेढ़ हजार है। ये लोग पिछले पंद्रह वर्षों से भीषण जलसंकट का सामना करते आ रहे थे। पानी की तलाश में यहां की औरतें पाँच किलो मीटर दूर से पानी ले आती थीं। अब उन्हें अपने घर के दरवाजे पर लगे नल से ही पानी मिल जाता है। 

मध्य प्रदेश के ज्यादातर जंगल क्षेत्रों के गांवों में लंबे समय से हैंडपंप बंद पड़े हैं। इसके अलावा प्राचीन जलस्रोत भी सूखे पड़े हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल समस्या का निदान करने के लिए तैनात पीएचई विभाग ठंडा पड़ चुका है। हर साल गर्मी के दिनों में पेयजल का संकट विकराल हो जाता है। जंगल क्षेत्र में ऐसे कई गांव है जिनके आसपास पांच किलोमीटर तक पानी नहीं है। आदिवासियों को पानी देना सरकार की प्राथमिकता ही नहीं है। बैगा जनजाति के कल्याण के लिए बना ‘बैगा प्रोजेक्ट’ फेल हो चुका है। रोजगार गांरटी के तहत बने कुएं भी काम नहीं कर रहे हैं। अब गंदे नाले पानी के ‘स्रोत’ अलावा आदिवासियों के पास कोई ‘विकल्प’ नहीं बचा है।

सीहोर (मध्य प्रदेश) में भी तीन दर्जन से अधिक आदिवासी परिवार गंदे नाले से पानी लाने को विवश हैं। जहां थोड़ा बहुत पानी पहुंचाया भी गया है उस बस्तर में सैकड़ों आदिवासी हर साल जहरीले पानी से मर रहे हैं। इस समय बस्तर में 92, कोंडागांव में 40, कांकेर में 57, बीजापुर में 6 बस्तियों में फ्लोराइड वाले पानी से फ्लोरोसिस से पीड़ित हैं। भोपाल पटनम के गेर्रागुड़ा फ्लोरइड वाले पानी से कई बच्चे असमय बीमारियों की चपेट में आ गए। बंडा, पापेट व अन्य गांवों में जलसंकट का समाधान नहीं हो पाया है। विनैका आज भी पानी की समस्या से जूझ रहा है। चांचौड़ा और बीनागंज में जलापूर्ति की लाइन पिछले पांच दशक से जंग खाकर खत्म होने के कगार पर हैं।

खानपुरा तालाब से सत्तर के दशक में दो वाटर फिल्टर प्लांट बनाए गए थे जिनसे पानी फिल्टर करके सप्लाई किया जाता था। स्थानीय निवासी यह भी शिकायत कर रहे हैं कि वाटर फिल्टर प्लांट जाम हो चुके हैं। केंद्र सरकार ने अभी विगत 15 जून को राज्यवार बेहतर जल प्रबंधन के लिए पांच टॉपरों में एमपी को दूसरा नंबर दिया है। नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में 60 करोड़ लोगों के सामने पानी का गंभीर संकट है। म.प्र. में जल प्रबंधन की स्थिति बेहद खराब है। गांवों में 84 प्रतिशत आबादी जलापूर्ति से वंचित है। जिन्हें पानी मिल रहा है, उसमें 70 प्रतिशत प्रदूषित है। बारिश के पानी को बचाने के लिए, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की जरूरत है। 60 फीसद से ज्यादा हिस्सा सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर है। हार्वेस्टिंग के लिए केवल 40 फीसदी हिस्से में काम हो पाया है।

श्योपुर जिले में तो आदिवासियों के साथ घोर अन्याय हो रहा है। सारे ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्तर तेजी से गिर गया है। हैंडपंप पानी नहीं दे रहे। जंगल से लगे गांवों में पानी की समस्या और भी गंभीर है। आदिवासी कहते हैं - गांवों में जो शौचालय बन चुके हैं, उनको कैसे इस्तेमाल करें, जब पानी ही नहीं है। पहाडगढ़ (मुरैना) क्षेत्र में सारे गांवों के हैंडपंप बंद है। ऐसे में खंडवा के आदिवासी बहुल खालवा विकासखण्ड के गाँव मामाडोह के आदिवासी नई मिसाल पेश कर रहे हैं। इस गांव में पिछले ढाई दशक तक पानी की कोई दिक्कत ही नहीं थी। कुओं से पानी आसानी से मिल जाया करता था। गाँव से कुछ दूरी पर जनवरी तक नाला बहता था। वहां से भी जरूरत भर पानी मिल जाता था। अब यहाँ के 11 गाँवों की पांच सौ से ज्यादा आदिवासी औरतों ने खुद अपनी मेहनत से 10 जलस्रोतों को पुनर्जीवित कर दिया है। इससे करीब दस हजार आदिवासी अब पानी के लिए आत्मनिर्भर हो चुके हैं।

चबूतरा गाँव में सूख जाने वाला तालाब इस गर्मी में भी सूखा नहीं रहा। महीने भर पहले तक यहाँ गाँव की औरतें मछलीपालन करती रहीं। इस तालाब को खुद औरतों ने गैंती-तगारी उठाकर जिन्दा किया है। जमाधड और जमोदा गांवों में भी लोगों ने तालाब सहेजा तो जलस्तर बढ़ गया और पुराने ट्यूबवेल भी पानी देने लगे। इसी तरह मीरपुर, मोहन्या ढाना, फोकटपुरा, जमोदा और मातापुरा के लोगों ने पीढ़ियों पुराने उपेक्षित पड़े कुओं को सँवारा और अब गर्मियों में बिना किसी परेशानी के उन्हें पानी मिल रहा है। यहां के गाँवों से होकर गुजरने वाली बंगला नदी में आदिवासी औरतों ने गैंती चलाई, बरसों से जमा गाद हटाया, अब उसमें भी पर्याप्त पानी रहने लगा है। नदियों और नालों पर लोग कई जगह बोरी बंधान बन रहे हैं ताकि बरसात के व्यर्थ बह जाने वाले पानी को गाँव के नजदीक ही रोका जा सके।

मामाडोह में किसी जमाने में सरकारी हैण्डपम्प लगा दिए गए थे। कुछ वक्त तक उनसे पानी मिलता रहा। उधर साल-दर-साल कुआँ गाद और कचरे से भरता रहा। चार में से दो हैण्डपम्प बन्द। जलस्तर नीचे चला गया। हालात इतने गम्भीर हो गए कि यहाँ के कई मवेशी पालकों को अपने बाड़े के अधिकांश दुधारू गाय-भैंसों को औने-पौने दामों में बेच देना पड़ा। परिवार गर्मियों में यहाँ से पानी और रोटी की तलाश में पलायन करने लगे। बीते दस सालों से इस गाँव में यही सिलसिला जारी था। आदिवासियों ने तहसील से लगाकर पानी के लिए गुहार लगाई लेकिन कुछ न हो सका। इसके बाद कोरकू आदिवासियों के बीच काम करने वाली संस्था 'स्पंदन समाज सेवा समिति' ने गाँव के लोगों की एक बैठक बुलाकर कहा कि पानी के लिए एकजुट होकर लगना पड़ेगा। आदिवासी सहमत हो गए। इसके बाद शुरू हुई गाँव में पानी की खोजबीन। गाँव में करणसिंह का मृत कुआं साफ करने में पूरा गाँव जुट गया। पन्द्रह दिनों में ही इसका काया पलट हो गया। जलधारा फिर से फूट पड़ी। धीरे-धीरे पानी बढ़ता गया, कुआँ भरने लगा।

इसके बाद ग्रामीणों ने स्थानीय पंचायत से आग्रह किया कि वह कुएँ में मोटर लगवा दे तो गाँव में पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति की जा सकती है। इसके लिये जरूरी बिजली खर्च आदि के लिये वे हर महीने बिल दे सकते हैं। पंचायत ने अफसरों से बात की और एक महीने में पानी घर-घर तक पहुँचने लगा। अब तक गाँव के 80 में से पचास परिवारों के घरों के सामने नल लग चुके हैं। बाकी 30 परिवार इन्हीं नलों से पानी भर लेते हैं। हर दिन सुबह एक घंटे और शाम को एक घंटे नल खोले जाते हैं। बहरहाल पेयजल की इस हालत में खेती और सिंचाई की बात बेमानी है। धार, बडवानी, खरगोन, झाबुआ और अलीराजपुर जैसे आदिवासी जिलों में किसान पारंपरिक रूप से ‘पाट की खेती’ से पानी से बचाते थे। वे आज भी जूझ रहे हैं। निमाड़ का इलाका सतपुड़ा पर्वत शृंखला की ऊँची–नीची पहाड़ियों की ऊसर जमीन का पठारी क्षेत्र है। आदिवासी गाँवों तक पहुँचने के लिए पैदल ही लम्बा पहाड़ी रास्ता पार करना पड़ता है। अब पाट की खेती मुश्किल होती जा रही है क्योंकि वहां आज भी दूर-दूर तक पानी नहीं है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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