क्या मैं डॉन क्विक्सोटे जैसी हूं?

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धर्म, जिसका मेरी परवरिश में धार्मिक और नैतिक तौर बड़ी भूमिका रही है। मेरे पिता रात को सोते वक्त कहानी सुनाते थे वो धर्म से जुड़े भारतीय महाकाव्यों को कहानियों के तौर पर सुनाने में मास्टर थे। वहीं दूसरी ओर दैनिक काम को लेकर हमारे घर में सख्ती थी। आज मुझे महसूस होता है कि इस चीज ने मेरे जीवन को अपनी पसंद का आकार देने में कितनी मदद की है। भारत में 70 प्रतिशत से ज्यादा की मिडिल क्लास फैमली में जीवन का मतलब परिणाम से लगाव के बिना स्वीकृति की भावना होता है।


जब मैं बड़ी हो रही थी तब मेरी रोल मॉडल महिलाएं ही थीं। मेरी दादी जिनके 14 बच्चे थे वो एक मजबूत इरादों वाली महिला था जिन्होने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। मेरी मां जो भले अनपढ़ थीं, लेकिन उन्होने हमको पढ़ाने में काफी मदद की। उन्होने हमारे अंदर पढ़ाई को लेकर समर्पण की भावना पैदा की और आजाद महिला के तौर पर कुछ बनने की आकांक्षा पैदा की। वो ये बात अच्छी तरह जानती थी कि महिला के जीवन में कठिन परिश्रम और समानता उसकी स्वतंत्रता से जुड़े है। मैं उन महिलाओं के बारे में सोचती हूं जिन्होने हर हाल में अपने को अच्छा बनाया और मेरी पीढ़ी की महिलाओं के लिए रास्ता तैयार किया।

मैं गणित में काफी अच्छी थी। इसलिए मैं इंजीनियरिंग के उस क्षेत्र में घुसना चाहती थी जहां पर ज्यादातर पुरूष ही थे। इस तरह साल 1980 में मैंने इंजीनियरिंक के क्षेत्र चली गई तब मैं केवल 16 साल की थी। पहले दिन मेरी मां ने मुझे सलाह दी कि तुम वहां पर पढ़ने और डिग्री हासिल करने जा रही हो, इसलिए तुम विवादों से दूर रहना और सिर झुका कर चलना। लेकिन पहले ही हफ्ते मुझे महसूस हुआ कि अगर मैं साड़ी नहीं पहनुंगी तो कैंपस में नहीं रह सकूंगी। बिना छेड़छाड़ के अपनी क्लास तक जाना और लैब में काम करना मुश्किल हो रहा था। लेकिन मुझे मेरा लक्ष्य पता था इसलिए मैं डटी रही।

पढ़ाई खत्म होने के बाद जब मैंने पहले साल काम किया तो मुझे महसूस हुआ कि मैंने अपना काम अच्छी तरह किया है, लेकिन हकीकत में मुझे 3 प्रतिशत की ही तरक्की मिली थी। एक महिने बाद मैंने साहस जुटाया और अपने मैंनेजर से बात की और ये जानने की कोशिश की क्यों नहीं मुझे किसी प्रोजेक्ट में शामिल किया गया और मेरे मूल्यांकन में मेरे योगदान को क्यों नहीं देखा गया। हालांकि इनमें से कोई भी कोई भी इसके लिये जिम्मेदार नहीं था।


जिस संस्कृति में मैं बढ़ी हुई वहां मैंने देखा था कि खुद की तारीफ करना घमंड और अहंकार के समान था, मैं इन दोनों चीजों का मिश्रण कर लिया था। जपान में ‘बुसीडो’ का मतलब होता है योद्धा का रास्ता। अनकही और अलिखित, जिसका ध्यान सिर्फ वफादारी, त्याग और सम्मानजनक मौत पर होता है। जबकि माफिया लोग ‘ओमेर्टा’ कोड का इस्तेमाल सम्मानजनक रूप में करते हैं जिसमें चुप्पी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। मध्यकालीन दौर में विजेता में वीरता, सज्जनता और शिष्टाचार के गुणों पर जोर दिया जाता था।

ये कोड सांस्कृतिक रूप में गहराई से जुडे रहे हैं। कंपनी में आचार संहिता लागू करने के लिए एक नेता को दूसरे लोगों के साथ तालमेल बैठाना होता है। मुझे विश्वास है कि बड़ी कंपनियां छोटी कंपनियों की तुलना में इस काम को ज्यादा अच्छे तरीके से कर सकती हैं। फिर भी विश्व मे एक ऐसा समान कोड हो जो सबके लिए स्पष्ट और प्रेरणादायक हो।

ऐसी व्यवस्था में महिलाओं को स्वाभाविक रूप से नुकसान हो रहा है।

हम लिंग भेद से संबंधित एलेन पाओ और केपीसीबी के केस को जानते हैं, जिसमें गलत आचरण को सहकर चुप रहते हुए महिलाओं को अपना काम करना पड़ता है। जिसके परिणामस्वरूप ये ऐसी इंडस्ट्री हो सकती थी जहां उत्पीड़न और शत्रुता पर कभी खुली बहस नहीं होती, क्योंकि इसके लिए साधन बहुत ही सीमित हैं।

प्राकृतिक रूप से, ज्यादातर महिलाएं लड़ाई की तुलना में शांति पसंद करती हैं। क्या हम महिलाओं को उनका हक और सम्मान देने के लिए तैयार हैं? मैं जानती हूं मैं ये करती हूं। बहुत से लोग इसका श्रेय लेने के लिए तैयार रहते हैं। ऐसे उदाहरणों से विज्ञान, इतिहास और कारोबार भरा पड़ा है। साहित्यिक चोरी, गलत तरीके से काम कर अपने व्यापार को बढ़ाना आज आम है। पिछले कुछ सालों में मैंने ऐसी कई निपुण महिलाओं को देखा है जिसमें उनके योगदान को कम बताया गया है।

मैंने अपनी पहली कंपनी 1996 में बनाई थी और दूसरी 2001 में। इसमें हमें जोखीम वाले पूंजीवादी क्षेत्र में काम करना था जिसमें महिलाओं के साथ मुश्किल से ही कोई तैयार होता है। एक बार एक अनुभवी महिला ने हमारे साथ काम करने से मना कर दिया जिसकी वजह से बोर्ड ने गलत आलोचना कर मुझे रोते हुए घर भेज दिया।

मैंने सहज रूप से अपना ध्यान अपने लक्ष्य और उसके प्रभाव पर दिया। एक औरत होने के बावजूद मर्दानगी के साथ वे कहती हैं कि मुझे किसी विशेष सम्मान की जरूरत नही है, यह मुझे आप सबकी बदौलत मिल गया है।

साल 2006 में मैं इंडो यूएस वेंचर (बाद में कलारी) की सह-संस्थापक बनी, उसके बाद अपने परिवार के साथ में भारत वापस आ गई। इससे पहले मैने भारत में कभी काम नहीं किया था इसलिए मैं ये जानने के लिए उत्सुक थी कि यहां पर लिंग भेद कितना काम करता है। इतने सालों के बाद मैं आश्चर्यचकित हूं कि कैसे लिंगभेद के कारण महिलाओं को असमान वेतन मिलता हैं और उनके पास चुपचाप इसे सहन करने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता।

महिलाओं के लिए व्यवस्था और अनुकूल होनी चाहिए या प्रणाली को महिलाओं की जरूरत के आधार पर अधिक अनुकूल होना चाहिए?

तब महिलाएं क्या कर सकती हैं जब कोई समूह बिना इच्छा के इस बहस को तैयार हो जाए। मैंने अपने आप से कहा कि एक कार्यकर्ता के नाते मुझे अपना सर्वश्रेष्ठ देना हैं। मैं विश्वास करती हूं कि आप अपनी मंजिल खुद बनाते हैं। मेरी बेटी ने हालिया ई-मेल में मुझसे कहा कि मुझे उन कामों को करना चाहिए जिन्हें करने से मैं बच रही हूं। “मैने महसूस किया कि मैं डॉन क्विक्सोटे जैसी हूं?” पुरानी सोच से मेरा मोहभंग हो गया है मेरी संवेदनशीलता, बौद्धिक ईमानदारी और मनोबल जो नेतृत्व की विशेषता है, को एक नैतिक ताकत मिली है।

आज मेरी बेटियां और दूसरी युवा महिलाएं अच्छे नतीजों को ध्यान में रखकर काम कर रही हैं। वो ये जानती हैं कि उन्हें कब अपने क्रेडिट के लिए बोलना चाहिए और कब उनकी मांग को स्वीकार करना चाहिए।

मैं जानती हूं कि मैं कुछ ज्यादा बोल गई हूं। मैं सिस्टम से कहना चाहती हूं कि वे अपने को बदले। हमें ऐसी डिबेट को प्रोत्साहन देना चाहिए जिसमें आपसी बहस से सीखने को मिले। मुझे उम्मीद है कि आगामी सालों में शांति के माहौल में बातचीत के जरिये बदलाव के रास्ते खुलेंगे। मैं जानती हूं कि इसका तुरन्त कोई हल नहीं है, लेकिन ये महत्वपूर्ण है कि कहीं न कहीं से तो शुरूआत हो। मैं खुश हूं कि मेरे आगे बढ़ने के छोटे से कदम से एक बहस की शुरूआत तो हुई कि महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा नेतृत्व करना चाहिए भले ही अपने स्टार्टअप के जरिये।