इस जिद्दी लड़की को मार्शल ऑर्ट में है महारत हासिल, पुलिस को भी दे चुकी है ट्रेनिंग

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एक लड़की जिसने शौकिया तौर पर मार्शल ऑर्ट की ट्रेनिंग ली थी, वो आज हजारों लड़कियों को ट्रेनिंग दे चुकी है। जिस लड़की को राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भेदभाव का सामना करना पड़ा उसने कई अंतर्राष्ट्रीय पदक अपने नाम किये। इतना ही नहीं राजस्थान के जयपुर शहर में रहने वाली ऋचा गौड़ ने 17 साल की उम्र ‘ग्लोबल इस्टिट्यूट ऑफ सेल्फ डिफेंस एंड मार्शल आर्ट’ नाम से अपनी अकादमी शुरू की। जिसके बाद अब उनकी कोशिश है कि वो दिव्यांग बच्चों को भी ट्रेनिंग दे सके ताकि वो भी आत्मरक्षा के गुर सीख सकें।


बचपन से ही ऋचा गौड़ दूसरी लड़कियों से हटकर एक टॉम बॉय टाइप की लड़की थी। ऋचा गौड़ जब 6 साल की थीं तब उन्होने शौकिया तौर पर दूसरे खेलों के साथ मार्शल आर्ट खेलना शुरू किया। धीरे-धीरे जब उनके मार्शल आर्ट में मेडल आने लगे तो उनका रूझान इस खेल की ओर हो गया। इस दौरान वो स्कूल के अलावा दूसरे कोचों से भी मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग लेती थी। वो बताती हैं कि “उस समय जयपुर में कोचिंग का लेवल इतना ऊंचा नहीं था इसलिए मैंने जयपुर के बाहर जाकर भी ट्रेनिंग ली। जिसके बाद जब मैंने अपना पहला टूर्नामेंट खेला तो उसमें मैंने गोल्ड मेडल हासिल किया। इससे मैं बहुत उत्साहित हुई और 10वीं क्लास तक आते-आते मुझे अहसास हो गया था कि मेरा करियर मार्शल आर्ट में ही है।”


साल 2005 में ऋचा का चयन नेशनल चैम्पियनशिप के सब जूनियर लेवल के लिए हुआ। इसमें वो राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। उस वक्त किसी भी चैम्पियनशिप में हिस्सा लेने के लिए खुद से फंडिग करनी होती थी, लेकिन ऋचा के आर्थिक हालात उस समय ऐसे नहीं थे कि वो इसमें भाग ले पाती। बावजूद वो 6 बार नेशनल चैम्पियन बनी। उन्होने ताइकांडो और मुथई जिसे थाई बॉक्सिंग भी कहते हैं, में 6 गोल्ड मेडल जीते हैं जिसमें से 2 ताइकांडो और 4 मुथई में हैं। वर्ल्ड मुथई चैम्पियनशिप में उन्हें 1 ब्रांज मेडल मिला और साउथ एशियन गेम्स में ताइकांडो में उनको 1 गोल्ड मेडल मिला। ऋचा के मुताबिक “मेरा चयन एशियन चैम्पियनशिप के लिए भी हुआ था लेकिन कोच और अफसरों के भेदभाव के कारण मेरे पेपर सही वक्त पर आगे नहीं पहुंच पाये जिस कारण मैं उसमें हिस्सा नहीं ले पायीं।”


ऋचा को इस बात का अफसोस है कि उनके कई सारे कोच उनके साथ भेदभाव करते थे क्योंकि वो इस खेल में बहुत अच्छा खेल रहीं थी और अहम मुकाबलों में आपसी मिलीभगत से वो अपनी पसंद के खिलाड़ी को आगे कर देते थे। यही वजह रही की ऋचा ने राजस्थान से बाहर बेंगलुरू, हैदराबाद और मुंबई के कोचों से ट्रेनिंग ली। इसके अलावा उन्होने कोरिया के कोचों से भी ट्रेनिंग ली है। इसके अलावा ऋचा को जब टूर्नामेंट खेलने के लिए बाहर जाना होता था तो उनके साथ कोई भी महिला कोच या अधिकारी नहीं होता था जिस कारण वह हमेशा अपने आप को असुरक्षित मानती थीं जिस कारण उन्हें हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता था। भेदभाव और दूसरी परेशानियों से सबक लेते हुए 17 साल की ऋचा ने साल 2011 में ‘ग्लोबल इंस्टिट्यूट ऑफ सेल्फ डिफेंस एंड मार्शल आर्ट’ की स्थापना की। इसके तहत उन्होने महिलाओं और लड़कियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग देना शुरू किया। शुरूआत में उन्होने 15 छोटे बच्चों के साथ इसे शुरू किया था। इसके बाद से अब तक वो करीब 40 हजार लोगों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दे चुकी हैं। इसके अलावा उन्होने राजस्थान पुलिस के 2 हजार महिला और पुरुष कर्मियों को भी ट्रेनिंग दी है। हालांकि इसमें ज्यादा संख्या महिलाओं की है। ऋचा को ताइकांडो, जूडो, बॉक्सिंग, किक बॉक्सिंग सभी में महारत हासिल है इसलिए उन्होने ट्रेनिंग के लिए खुद का सिलेबस तैयार किया है। वो समाज के सभी वर्गों चाहे वो युवा हों, महिला हों या बच्चे सभी को वो सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दे रहीं है। इस समय जयपुर में उनके 15 सेंटर चल रहे हैं जिसमें 5 हजार लोगों को वो इस वक्त ट्रेनिंग दे रहीं हैं।


ऋचा की शुरूआत से ही कोशिश रही है कि वो इस खेल को ज्यादा से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं तक पहुंचाये। इसलिए वो कहती हैं कि अगर किसी खिलाड़ी को आगे बढ़ना है तो उसे शहर के बाहर टूर्नामेंट खेलने जाना ही पड़ेगा। इसलिए उनकी योजना है कि वो ज्यादा से ज्यादा महिला कोच तैयार करें ताकि और लड़कियां इस खेल को अपना करियर बना सकें। ये उनकी ही कोशिशों का नतीजा है कि जिन 100 पीटीआई और 100 कांस्टेबलों को उन्होने सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दी थी वो आज अपने स्कूलों और जिलों में जाकर लोगों को और स्कूली बच्चों को इसकी ट्रेनिंग दे रहे हैं। अपनी सफलता पर ऋचा का कहना है कि “मैं काफी सारे उतार चढ़ाव के बाद अपनी मेहनत और लगन से इस मुकाम तक पहुंची हूं। तभी तो कल तक जो लोग मेरा विरोध करते थे आज वो ही लोग मुझे अपने कार्यक्रम में बुलाते हैं। मुझे समाज को बताना था कि एक लड़की होकर भी मैं वो सब कुछ कर सकती हूं जो कि लड़के करते हैं। इसलिए आज मैं एक सफल कोच, खिलाड़ी और डिंफेस ट्रेनर हूं। यही वजह है कि अब तक मेरे सिखाए हुए 5 सौ से ज्यादा लोग विभिन्न प्रतियोगिताओं में मेडल हासिल कर चुके हैं।”


अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में ऋचा का कहना है कि वो भारत के लिए और मेडल जितना चाहती हैं। साथ ही उनकी योजना करीब 10 लाख लोगों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग देने की है। उनकी चाहती हैं कि वो ज्यादा से ज्यादा महिला कोच तैयार करें ताकि हर चैम्पियशिप में महिला कोच हो जिससे लड़कियों को ट्रेनिंग लेने में आसानी हो। इसके साथ साथ वो आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की भी मदद करना चाहती हैं जिससे की किसी भी चैम्पियनशिप में भाग लेने में उनको कोई परेशानी न हो। फिलहाल ऋचा एक ऐसा सिलेबस तैयार कर रही हैं जिस जरिये वो दिव्यांग बच्चों को भी ट्रेनिंग दे सकें।