गणेश सावंत से गौरी सावंत बनने की कहानी

एक पुरुष के माँ बनने की कहानी...

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समाज ने हमेशा उसे ये एहसास कराया कि वो औरत नहीं है, लेकिन इसके बाद भी वह माँ बनी। लोगों ने उसे बताया था, कि उनके पास कोई अधिकार नहीं है, कानून की नज़रों में तो उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है, फिर भी उसने एक अनाथ लड़की को उसके अधिकार के संरक्षण के लिए अपना लिया। ताकि एक और छोटी लड़की मानव तस्करी की दुनिया में गुम ना हो जाए। प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ एवं एक निर्दोष मानव अवतार में, गौरी सावंत एक दुर्जेय महिला हैं। आईये जानें गौरी को थोड़ा और करीब से...

गौरी सावंत
गौरी सावंत
प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ एवं एक निर्दोष मानव अवतार में, गौरी सावंत एक दुर्जेय महिला हैं। उनकी कलफ लगी सूती साड़ी और उषा उथुप स्टाइल वाली बिंदी ही दुनिया में उन्हें भारतीय महिला की पहचान नहीं देती, बल्कि जब वो आप पर मर मिटती हैं और प्रसन्नचित्त आत्मविश्वास के साथ आपसे बात करती हैं तो एक सम्पूर्ण भारतीय महिला लगती हैं।

गौरी सावंत आज के समय में एक ऐसा सशक्त उदाहरण हैं, जिन्होंने खुद की पहचान के लिए अपने जीवन में कई शानदार साहसिक निर्णय लिए। महिला प्रवृत्तियों वाले इस लड़के के लिए खुद को कमरे में बंद रखना आसान तो नहीं था, लेकिन उसने ऐसा किया।

गौरी सावंत की पहचान विक्स द्वारा एक आइकन के रूप में होने लगी है। बीते दिनों की बात की जाये, तो सोशल मीडिया पर इस नाम ने करोड़ों शेयरिंग्स और व्यूज़ बटोरे। गौरी का जन्म हुआ तो गणेश सावंत के रूप में, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान के लिए लिंग परिवर्तन की बजाय व्यवहार में लिंग के अनुरूप बदलाव करने का निर्णय लिया और परिवार के सुख से वंचित होने के बाद, ये सुनिश्चित करने के लिए कि हर किसी का भाग्य एक समान नहीं होता इस दकियानूसी देश में अपनी सामाजिक स्थिति से नहीं डरने का फैसला किया और एक परिवार विहीन अनाथ बच्चे को अपना कर उसकी मां बनीं।

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गौरी का बचप बहुत अजीबो गरीब परिस्थितियों में गुज़रा है। उनके हिस्से एक चिंतित और चिढ़ी हुई माँ और उन्हें लेकर बड़े-बड़े सपने देखने वाला पिता आया। उनका बचपन बहुत आनंददायक एवं सुखद नहीं था। एक डरा हुआ और भ्रमित बचपन, जहां उन्हें सिर्फ डांट और निंदा के सिवा कुछ और नहीं मिला। पुणे के भवानीपीठ में गणेश सावंत के रूप में जन्मेंं गौरी एक पुलिस अधिकारी के बेटे था, जिनका पालन पोषण सरकारी क्वार्टर में सामान्य सामाजिक वातावरण से भी बेहतर माहौल में हो रहा था। उनकी माँ के गर्भधारण के बीच 10 साल के लम्बे अंतर के कारण उनकी मां एक और बच्चे के रूप में गौरी को बिल्कुल नहीं चाहती थी, हालांकि उनके पिता एक दूसरे बच्चे के लिए तैयार थे। अपने भावों को अपने शब्दों को रूप देते हुई गौरी कहती हैं,

'मेरी माँ नहीं चाहती कि मैं इस दुनिया में आऊं और इसके लिए सातवें महीने में उन्होंने गर्भपात कराने की कोशिश की, लेकिन डॉक्टर्स ने उन्हें बताया कि ये बच्चा अब इतना विकसित और मजबूत है कि कोई भी उसे नष्ट नहीं कर सकता। आप इसे दीवार पर भी फेकेंगे तो, वो वापस आ जायेगा। इसी तरह की हां/ना की परिस्थितियों में मेरा जन्म हुआ और इसीलिए मुझे भी अपनी सेक्सुअल आइडेंटिटी को लेकर भ्रम होने लगा।'

शुरू में गौरी को कुछ अलग नहीं लगता था, लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ी होती गईं और लोगों ने उन्हें कठोर सीमाओं में बांधने का प्रयास किया, तो स्त्री स्वभाव के प्रति उसका आकर्षण और अधिक बढ़ गया और वह समझने लगीं कि वह दूसरों की तरह नहीं हैं। वो कहती हैं, 

'मुझे हिजड़ा या लड़की की तरह महसूस नहीं होता था, लेकिन मुझे पता था कि मुझमें कुछ असामान्य लक्षण हैं। मैं हमेशा लड़कियों को अपना दोस्त बनाती और लड़कों के साथ कभी नहीं खेलती। मुझे लड़कियों के साथ घर-घर खेलना पसंद था। अजवाइन के पेड़ से पत्ते तोड़ना और उन्हें थम्सअप के ढक्कन से रोटी के रूप में काटने से लेकर सींग दाना इकट्ठा करके उसे कुकर में उबालने का दिखावा करने तक में मुझे बहुत आंनद आता। इन सबको लेकर घर में खूब डांट पड़ती, लेकिन मुझे कभी कोई फर्क नहीं पड़ता।'

दस बरस की उम्र में गौरी की चाची ने उनसे पूछा कि तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो? तो उन्होंने जवाब दिया, कि 'मैं एक माँ बनना चाहती हूं।' इनके जवाब को लोगों ने बच्चा समझ कर आया गया मान लिया। जैसे जैसे वो बड़े होने लगे लोग उन्हें समझाते कि तुम माँ नहीं बल्कि पिता बन सकते हो या फिर पुलिस अधिकारी। पांच साल की उम्र में ही गौरी ने अपनी माँ को खो दिया। माँ की मृत्यु के बाद पिता ने पैतृक कर्तव्यों का निर्वहन सही तरीके से नहीं किया। घर में ऐसा कोई नहीं था, जो उनके किसी काम में उनकी मदद करता। पिता उनकी व्यवहारिक दिक्कतों को लेकर शर्मिंदा रहते थे, जिसके चलते उन्होंने गौरी को कभी प्यार नहीं किया। वो कहती हैं, 'मेरे पास मेरे बचपन की कोई मीठी याद नहीं।'

वो बात जिसने गौरी के दिल को दर्द से बर दिया

गौरी के पिता का जल्द ही तबादला हो गया और वे लोग मुंबई आ गये। नये स्कूल के प्रिंसिपल ने एक बार उनके पिता को बुला कर उन्हें एक शिकायत के रूप में नहीं, बल्कि एक अवलोकन के रूप में बताया कि गौरी में स्त्रीत्वपूर्ण लक्षण हैं। लेकिन उनके पिता को ये बात अच्छी नहीं लगी और इसके बाद उनके जीवन में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की एक श्रृंखला सी प्रारम्भ हो गयी। पिता प्रिंसिपल की बात को दिल पर ले लिया और गौरी से आंखे मिलाकर बात नहीं करते थे, धीरे-धीरे पूरी तरह से बात करनी बंद कर दी। उन दिनों को याद करते हुए गौरी कहती हैं,

'जब वो घर आते तो मैं जल्दी से भाग कर बेडरूम में चली जाती। वो मेरा चेहरा नहीं देखना चाहते। ये उनकी गलती नहीं थी। मेरा व्यवहार ही ऐसा था, कि कोई भी मेरा मजाक उड़ाता। वो हमेशा से ऐसे नहीं थे। जब मैं छोटा था हर पिता की तरह वो भी मुझे बाइक पर घूमाने ले जाते और मुझे प्यार करते। लेकिन मेरे परिवार में लैंगिकता, लैंगिक पहचान और लिंग आदि के बारे में कभी कोई विमर्श नहीं होता। वे बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं थे। एक बार मेरे पिता ने मुझसे कहा, ‘तू रोड पे ताली बजाते घूमेगा’। उनकी उस बात से मुझे बहुत दु:ख हुआ। जब मैंने उन्हें कुछ काम के लिए फोन किया तो मेरा 'हैलो' कहना कुछ अलग था, तो उन्होंने मुझ से कहा, ‘क्या हिजड़े जैसा बात करता है?’ इसलिए, उसके बाद जब भी उन्होंने फोन किया तो मैंने कभी भी उनके फोन का जवाब नहीं दिया।'

जिनका होना गौरी के लिए मायने रखता था न केवल उन लोगों की बेरुखी, बल्कि दुनिया में औरों के द्वारा भी उन्होंने अपनी इस पहचान को बेरहमी से पकड़ा हुआ था और कभी भी उसके इंद्रधनुष रंग के आवेगों को रोकने की कोशिश नहीं की, जिसका दुनिया के लिए कोई मतलब नहीं था। वो कहती हैं, 'मेरे भीतर की औरत कभी मरी नहीं। स्प्रिंग की तरह, जितना दबाई गई उतनी ही ऊपर आती गई।'

जेब में थे 60 रुपये और उन्होंने घर छोड़ दिया

17 साल की उम्र में गौरी सभी बंधनों से मुक्त हो गईं। उन्होंने घर छोड़ दिया। वो कहती हैं,

'मुझे पता था कि यही घर छोड़ने के लिए सही समय था। हम लोग घर में खाना नहीं बनाते थे, मेस का खाना खाते थे। मेरे पिता खाने का टिफिन लेने के लिए बाहर गये और मैंने उसी बीच घर छोड़ दिया। बाद में मुझे पता चला कि मेरे जाने के बाद वो सदमे में आ गये थे और टिफिन के उस डिब्बे को तीन दिनों तक पकड़कर बैठे रहे।'

गौरी ने अपना घर, परिवार और शहर सब कुछ छोड़ दिया लेकिन उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोड़ी। उनकी जेब में सिर्फ 60 रुपये थे। उस दिन मंगलवार था, वो सिद्धिविनायक मंदिर गईं और प्रसाद के के रूप में मिले दो लड्डूओं को दोपहर के भोजन के रूप में खाया और शाम को दादर स्टेशन पर रगड़ा पेटिज़ खाकर पेट भरने की कोशिश की। उनकी एक दोस्त थी (एक समलैंगिक सेक्स वर्कर) जो उन्हें तीन या चार दिन तक आपने साथ रखने के लिए सहमत थी। वो कहती हैं,

'मैं सेक्स वर्क में शामिल होने लायक सुन्दर नहीं थी, इसलिए उसने कभी मुझे इस की पेशकश नहीं की, लेकिन उसने मुझे खिलाया और मेरा ध्यान रखा और बाद में मुझे हमसफर ट्रस्ट तक पहुँचाया। ये ट्रस्ट भारत के सबसे पुराने एलजीबीटीक्यू संगठनों में से एक है। भगवान की कृपा से, मुझे कभी भी भीख माँगने की नौबत नहीं आयी।'

उन्होंने एक महीने में 1,500 रुपये कमाए। उनका संचार कौशल उन्हें हिटलर और ओबामा के साथ खड़ा करता है। वो अधिकार के साथ बोलती हैं और यहां तक ​​कि उनके शब्दों में बुद्धि, हास्य, और आम तौर पर बहुत अच्छी भाषा शैली का समावेश होता है। जिसके चलते उन्हें पहचान संकट के दौर से गुजर रहे लोगों को उनकी खुद की वास्तविक पहचान के लिए संचार और आउटरीच टीम में लगाया गया। औपचारिक रूप से उसके जैविक लिंग को नकार कर, उन्होंने भी स्वयं को एक 'हिजड़ा' में परिवर्तित करने का चयन किया, जिसे कि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में अब आधिकारिक रूप से तीसरा लिंग माना जाता है। जैविक रूप से वे न तो पुरुष और न महिला ही हैं। वह कहती हैं,

'मैं वास्तविकता जानती थी, इसलिए मैं महिला नहीं बनना चाहती थी। भले ही दर्दनाक प्रक्रिया द्वारा मैं अपना लिंग परिवर्तन करवा लूं, फिर भी लोग मुझे और मेरे शरीर को एक महिला के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। गोदरेज के पंखे पे आप कभी भी कंप्रेसर लगाओगे और वह कूलिंग भी देगा, लेकिन लोगों को डाइजेस्ट नहीं होगा. बाद में मालूम पड़ा कि हरयाणवी औरतें तो मुझसे भी लम्बी होती हैं।'

वह बहुत सारे लोगों के साथ काम करने लगी थीं और यौन कर्मियों को परीक्षण करने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ ही यौनजनित रोगों के बारे में जागरुकता फैलाना उनके मुख्य कार्यों में से एक था। इनमें से ही एक गायत्री की मां थीं, जो कि एक एचआईवी पॉजिटिव सेक्स वर्कर थीं। उन्होंने गायत्री को कभी भी स्तनपान नहीं कराया और जब गायत्री मात्र पांच साल की थी, तब इस बीमारी ने अंततः उसके मां की ज़िन्दगी को समाप्त कर दिया। उसकी माँ की मृत्यु के बाद यौन वर्कर के तौर पर  गायत्री को सोनागाछी में बेचने की बात हो रही थी, जिसे गौरी ने सुन लिया। वो कहती हैं, 

'मैं दृढ़ता से इसके खिलाफ थी। उस समय, मुझे नहीं पता था कि मैं एक माँ बन जाउंगी। उसका पालनपोषण करूंगी और एक दिन अपनी कहानी लोगों को बताउंगी। मैं बस इतना जानती थी कि इस छोटी, बिना मां की कमजोर लड़की को सुरक्षा और देखभाल की जरूरत है।'

गौरी गायत्री को नहलाती, खिलाती, स्कूल भेजती और उसकी पढ़ाई-लिखाई का खयाल रखती। इस दुनिया के खिलाफ जाते हुए गौरी और गायत्री सामान्य तौर पर एक मां और बेटी के खूबसूरत रिश्ते में बंध गये। गौरी ने औपचारिक रूप से गायत्री को गोद लेकर उसके साथ अपने रिश्ते को कानूनी जमा भी पहनाने की कोशिश की, लेकिन सरकार किसी भी बच्चे को एलजीबीटी समुदाय की निगरानी में नहीं देती है। लेकिन इस बात से गौरी को कोई फर्क नहीं पड़ा है और इन सब बातों से बेफिक्र वह गायत्री का पालन पोषण उसी तरीके से कर रही हैं। गौरी ने एलजीबीटी समुदाय के लिए इन बुनियादी अधिकारों की मांग करने वाली एक याचिका दायर की है और वे उस संघर्ष में शामिल थी, जो ये सुनिश्चित करता था कि तीसरे लिंग को भी आधार कार्ड बनवाने का हक़ मिले।

विक्स के सैट पर गौरी सावंत
विक्स के सैट पर गौरी सावंत

विक्स एड से पहले गौरी को कई बार चित्रित किया जा चुका हैं। हालांकि, इस अभियान की शूटिंग ने उन्हें रातोंरात स्टारडम में पहुँचा दिया है। उन्होंने पहले इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था, लेकिन छह महीने बाद जब उन्होंने स्क्रिप्ट पर दोबारा गौर किया और इसे बेहद उत्साही कार्यकर्ता के लिए कम चुनौतीपूर्ण बना दिया गया, तब वो इसके लिए सहमत हो गईं। विक्स के चार मिनट के वीडियो को देखकर पूरा देश रो पड़ा, लेकिन गौरी ने गायत्री को जो जल्द ही छात्रावास से गर्मियों की छुट्टियों के लिए आयेगी, तब तक ये वीडियो नहीं दिखाने का निश्चय किया है। वो कहती हैं, 

'मेरे इरादे स्पष्ट थे, फिर भी मैं कभी गायत्री को ऐसा महसूस नहीं होने देना चाहती कि मैंने इस प्रसिद्धि को पाने के लिए उसका इस्तेमाल किया हैं। मेरे पास उसके प्रश्नो का कोई जवाब नहीं होता। जिस क्षण मैं उसे इस बारे में बताने का निश्चय करुंगी उस वक्त बताउंगी।'

गायत्री को पालने के दौरान, गौरी ने एक सेक्सिस्ट सिंड्रोम का अनुभव किया हैं। वो कहती हैं,

'एक पिता की अनुपस्थिति में, इस तथ्य के बावजूद कि मैं खुद अभी भी गायत्री के माता-पिता के रूप में मौजूद हूँ, उसके पड़ोसी, चाचा और आसपास के सभी लोग अतिरंजना में उसके प्राथमिक देखभाल करने वालों की आवश्यकता महसूस करते हैं और जब कि मैं माता और पिता दोनों हूँ। ये लोग इस नाजुक रिश्ते पर गायत्री की राय को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, जो कि हम दोनों के लिए ही किसी भी चीज से ऊपर है। इसलिए, मैं अभियान के बारे में उसे बताने के लिए सही समय का इंतजार करुँगी।'

गायत्री गौरी को 'आई' कह कर बुलाती है, जो कि 'माँ' के लिए मराठी शब्द है और इसका शाब्दिक अर्थ है "आदमी के रूप में ईश्वर"। गौरी कहती हैं,

'गायत्री मेरी नज़रों में एक फरिश्ता है। मैंने उसके लिए कुछ नहीं किया है, जबकि उसने मुझे सब कुछ दिया है, लड़के से लड़की बनने की मेरी इस यात्रा में उसने मुझे माँ का नाम दिया है, जो नारीत्व के सबसे सशक्त रूपों में से एक है।'

अपनी सक्रियता के तहत गायत्री 1,000 से 2000 लोगों के साथ काम करते हुए, उन्हें कानूनी अधिकारों और यौनजनित रोगों के बारे में उनका संवेदीकरण करती है, साथ ही वे सक्रिय रूप से युवा ट्रांस व्यक्तियों के लिए (जो परिवार से दूर हो जाते हैं) एक आश्रय चलाने में भी शामिल हैं। इन्हीं सबके बीच वे कछुओं को बचाने और सड़क के कुत्तों का पोषण करके जानवरों के लिए भी काम करती हैं।

इस वीडियो को देखना बिल्कुल न भूले, इसे देखने के बाद आप गौरी और गायत्री को और करीब से जान पायेंगे...

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