कालेधन पर अंकुश के लिए ज़रूरी है कामकाज का संचालन तथा सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार 

कालाधन एक बड़ी समस्या है और इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए अत्यधिक नियमनों से बचा जाए : रिजर्व बैंक।

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कालेधन पर लगातार जारी बहस के बीच रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि इस बुराई पर अंकुश का सबसे बेहतर तरीका यह है कि कामकाज का संचालन तथा सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार किया जाए, अत्यधिक नियमनों से बचा जाए, कड़ा जुर्माना लगाया जाए और कर ढांचा अनुकूल हो। दुनिया के उदाहरण देते हुए रिजर्व बैंक द्वारा जारी वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) में कहा गया है, कि व्यक्तिगत आयकर की दर में एक प्रतिशत की वृद्धि से समानांतर अर्थव्यवस्था का आकार 1.4 प्रतिशत बढ़ता है। वहीं नियमन सूचकांक में एक प्रतिशत की बढ़ोतरी से काली या समानांतर अर्थव्यवस्था 10 प्रतिशत बढ़ती है।

रिपोर्ट में कहा गया है, कि काली अर्थव्यवस्था पर अंकुश का सबसे अच्छा तरीका संचालन तथा सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार, अत्यधिक नियमनों से बचाव, कड़ा जुर्माना तथा अनुकूल कर ढांचा है।

साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, कि छद्म अर्थव्यवस्था की एक और बड़ी समस्या यह है कि इससे आधिकारिक आंकड़े विश्वसनीय नहीं दिखते, जिससे सरकारों की नीतियां बनाने की योजना प्रभावित होती है। अमेरिका का उदाहरण देते हुए एफएसआर रिपोर्ट में कहा गया है कि कर राजस्व में कमी से सरकार कर दरें बढ़ाने को बाध्य होती हैं। इससे काली अर्थव्यवस्था की गतिविधियां और बढ़ती हैं।

उधर दूसरी तरफ रिजर्व बैंक ने नोटबंदी से प्रभावित लघु एवं मझोले उद्यमों को राहत देते हुए कहा है, कि बैंक एमएसएमई कर्जदारों को अतिरिक्त कार्यशील पूंजी सीमा उपलब्ध करा सकते हैं। रिजर्व बैंक ने एक अधिसूचना में कहा, ‘बैंकों को सलाह दी जाती है, कि वे अपने एमएसई (मझोले एवं लघु उद्यम) कर्जदारों को अतिरिक्त कार्यशील पूंजी सीमा उपलब्ध कराने की सुविधा का उपयोग कर सकते हैं।’ इसमें कहा गया है, कि यह 31 मार्च तक एक बारगी उपाय होगा और उसके बाद कार्यशील पूंजी के ताजा आकलन चक्र में सामान्य हो जाना चाहिए। केंद्रीय बैंक ने कहा कि 500 और 1,000 रूपये के नोटों पर पाबंदी तथा यह सूचना मिलने पर कि कुछ एमएसई नकदी की कमी के कारण अपने सामान्य कारोबार में अस्थायी तौर पर कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, उक्त निर्णय किया गया।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर को 500 और 1,000 रपये के नोट को चलन से बाहर करने का फैसला किया है जिससे बाजार में नकदी की कमी और कारोबार में नरमी आयी।

साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की जारी वित्तीय स्थिरता रपट में कहा गया है, कि सरकार की ओर से जारी आय घोषणा योजनाओं से राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पाने में मदद मिल सकती है।

रपट के अनुसार इससे प्राप्त होने वाला अतिरिक्त राजस्व विनिवेश और स्पेक्ट्रम नीलामी से अनुमानित तौर पर कम मिले राजस्व को पाटने का काम करेगा।

वित्त वर्ष 2016-17 के लिए सरकार ने राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 3.5 प्रतिशत रखने का लक्ष्य तय किया है।

उधर दूसरी तरफ भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है, कि बैंकिंग क्षेत्र की आस्तियों की गुणवत्ता भारी दबाव में है और बैंकों की सकल गैर निष्पादित आस्तियां (जीएनपीए) सितंबर में बढ़कर 9.1 प्रतिशत हो गई जो कि मार्च में 7.8 प्रतिशत थी। केंद्रीय बंक ने अपने जारी वित्तीय स्थिरता रपट (एफएसआर) में यह निष्कर्ष निकाला है, जिसमें कहा गया है, ‘अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों का जीएनपीए अनुपात मार्च व सितंबर 2016 के दौरान 7.8 प्रतिशत से बढ़कर 9.1 प्रतिशत हो गया।’ बैंक का कहना है कि इससे बैंकों कुल फंसे अग्रिमों का अनुपात 11.5 प्रतिशत से बढ़कर 12.3 प्रतिशत हो गया। रपट में कहा गया है कि मूल्यांकन में नुकसान के ऊंचे स्तर के मद्देनजर बैंकों के लिए जोखिम निकट भविष्य में भी बना रह सकता है, क्योंकि वे अपनी बैलेंस शीट को साफ करेंगे और ऊंची ऋण वृद्धि के लिए उनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं होगी। आलोच्य अवधि में बड़े कर्जदारों की आस्ति गुणवत्ता में खासी गिरावट आई, क्योंकि विशेष उल्लेखित खातों (एसएमए)-2 का हिस्सा सभी बैंक समूहों में बढ़ा है।

इसके अनुसार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का कुल ऋण पोर्टफोलियो में बड़े कर्जदारों का हिस्सा मार्च से सितंबर 2016 के दौरान घटा जबकि जीएनपीए में उनका हिस्सा इसी दौरान बढा। इसमें कहा गया है कि दबाव परीक्षण के अनुसार बेसलाइन परिदृश्य के हिसाब से सकल एनपीए अनुपात बढ़कर मार्च 2017 तक 9.8 प्रतिशत हो सकता है जो सितंबर 2016 में 9.1 रहा। यह मार्च 2018 तक 10.1 प्रतिशत तक हो सकता है।

रपट के अनुसार,‘ अगर व्यापक आर्थिक परिस्थितियां और खराब होती हैं तो जीएनपीए अनुपात और भी बढ़ सकता है।’


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