'बेटी की कामयाबी के सामने सब फीका'

सानिया मिर्ज़ा ने 6साल की उम्र में टेनिस रैकेट थामा2003 में जूनियर विंबल्डन चैंपियन ख़िताब सानिया की सिंगल्स में अब तक उनकी सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग 27 रहीमहिला डबल्स में दुनिया की नंबर वन खिलाड़ीमिक्स्ड डबल्स में 3 ग्रैंड स्लैम और 26 डब्ल्यू.टी.ए ख़िताब हर कदम पर माता-पिता ने साथ दियासानिया के मैनेजर उनके पिता इमरान मिर्जा हैं माता-पिता ने ट्रेवल एजेंट, फाइनेंसर, सपोर्ट स्टाफ की तरह काम किया

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कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जो कामयाबी के पीछे नहीं बल्कि कामयाबी उनके पीछे भागती है और ऐसे में वो आसमान में इतनी सीढ़ियां लगा लेती हैं कि उनके साथ चलने वाले काफी पीछे छूट जाते हैं। टेनिस के आसमान में चमकने वाला एक सितारा ऐसा ही है, जो सफलता के उस मुकाम पर है, जहां पहुंचना मुश्किल तो नहीं पर फिलहाल भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए आसान नहीं है। जी हां, उस चमकते सितारे का नाम है सानिया मिर्ज़ा। सानिया मिर्ज़ा, भारतीय टेनिस की दुनिया में चलती फिरती एक संस्थान। कीर्तिमान और तमगे इतने, कि जिसे पाने में अच्छे खासे खिलाड़ियों की उम्र निकल जाती है। फिलहाल उनका सबसे अहम परिचय है महिला युगल वर्ग में दुनिया के पहले पायदान की खिलाड़ी बनना। डब्ल्यू.टी.ए ख़िताब जीतने वाली और महिला युगल वर्ग में नंबर एक के गौरव को पाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी। भारत की सानिया मिर्ज़ा और स्विट्ज़रलैंड की मार्टिना हिंगिस की यही जोड़ी अब दुनिया की नंबर एक जोड़ी है। नंबर वन होने के साथ-साथ प्रतिष्ठात्मक ग्रैंड स्लैम का खिताब जीतने वाली भी सानिया पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं।

महिला टेनिस का चमकता सितारा

अंतर्राष्ट्रीय टेनिस और सानिया मिर्ज़ा का आमना सामना 2003 में हुआ और इसी साल से उन्होंने कामयाबी का इतिहास लिखना शुरू कर दिया। शुरूआत हुई 2003 में जूनियर विंबल्डन चैंपियन ख़िताब जीतने से। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ये उनकी सबसे बड़ी कामयाबी थी। बस ये तो शुरुआत थी। इसके बाद वे टेनिस कोर्ट में अपना परचम लहराती रहीं और एक के बाद एक खिताब अपने नाम करती गईं। नतीजा ये हुआ कि सानिया मिर्ज़ा सिंगल्स में टॉप 30 में जगह बनाने वाले वाली पहली भारतीय महिला बनीं। सिंगल्स में अब तक उनकी सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग 27 रही है। सानिया मिर्ज़ा ने 2012 से सिंगल्स के बजाय डबल्स पर ध्यान देना शुरू किया और महज़ 3 साल में ही नंबर-1 बन गईं। वे मिक्स्ड डबल्स में 3 ग्रैंड स्लैम और 26 डब्ल्यू.टी.ए ख़िताब अपने नाम कर चुकी हैं। इन्हीं असाधारण कामयाबियों की वजह से ही सानिया मिर्ज़ा को "पद्म श्री" सम्मान और अर्जुन पुरस्कार ने भी नवाज़ा जा चुका है। दुनिया-भर में भारत का नाम रौशन करने वाली सानिया मिर्ज़ा कई भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हैं। भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर की कई महिलाओं के लिए सानिया रोल मॉडल हैं।

परिवार का योगदान

अपने बच्चों को एक मुकाम देने और उसे सफल और सार्थक देखने की तमन्ना हर माता-पिता में होती है। सफलताओं का जब लेखा-जोखा सामने रखा जाता है तो भले ही खिलाड़ी सबसे ऊपर रहता है पर इस मुकाम तक पहुंचाने में उसका पूरा परिवार बड़ी शिद्दत से जुटा रहता है। सानिया मिर्ज़ा की अब तक की छोटी, बड़ी, असाधारण कामयाबियों के पीछे उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान हैं। खासतौर पर पिता इमरान मिर्ज़ा, माँ नसीमा और बहन अन्नम का। एक मायने में सानिया मिर्ज़ा की कामयाबी का रहस्य उन्हें माता-पिता की मेहनत, लगन और उनके त्याग में भी छिपा है और इस बात में दो राय नहीं कि सानिया की ताकत को उनके माता-पिता अपने हैसियत और हिसाब से लगातार बढ़ाते रहे हैं।


हाल ही में योर स्टोरी ने हैदराबाद में सानिया के पिता इमरान मिर्ज़ा से सानिया मिर्ज़ा टेनिस अकादमी में मुलाकात की। सानिया मिर्ज़ा टेनिस अकादमी की शुरूआत सानिया ने सिर्फ इसलिए की ताकि टेनिस की दुनिया में उनके जैसे और चैंपियन बनें और देश का नाम रौशन करें।

सानिया की ख़ूबियां

इस ख़ास मुलाकात में इमरान मिर्ज़ा ने न सिर्फ सानिया की कामयाबियों के राज़ बताए बल्कि उन्होंने बताया कि एक संतान जब सफलता की शिखर पर चढ़ता है तो कैसे उसके माता-पिता का गर्व देश के साथ जुड़कर ऐतिहासिक हो जाता है। इमरान मिर्ज़ा के मुताबिक, सानिया की सबसे बड़ी खूबी है खेल के प्रति जज़्बा। खेल सानिया के लिए जीने मरने का सबब है, इसलिए वो उसका भरपूर लुत्फ़ उठाती हैं। असल में खेल के प्रति लगन और उसमें जीने का मज़ा, उनकी फितरत में है। सानिया के लिए जब खेल, जीने और मरने के समान है तो फिर उसकी चुनौतियों का सामना करना भी उन्हें खूब भाता है। जितनी बड़ी चुनौती, उतना बड़ा मज़ा। यही वजह है कि कड़ी प्रतिद्वंद्विता में भी सानिया को आनंद मिलता हैं। सानिया की सबसे बड़ी ताकत है दबाव में खेलना। उन्हें एहसास होता कि टेनिस कोर्ट में मैच के दौरान अगर वो मुश्किल हालात में हैं तो स्वाभाविक तौर पर उनपर दबाव होगा। लेकिन वो ये भी जानती है ऐसे हालात में दबाव उनकी प्रतिद्वंद्वी पर भी ज़रूर होगा। सानिया खुद दबाव में रहते हुए प्रतिद्वंदी के दबाव का फायदा उठाना सीख चुकी हैं।

सानिया का विवादों से सामना

ऐसा नहीं हैं कि सानिया मिर्ज़ा ने सिर्फ टेनिस कोर्ट में ही मुश्किल हालातों और चुनौतियों का सामना किया। निजी ज़िंदगी में भी सानिया ने बहुत संघर्ष किए और हर बार विरोधियों को मुँह तोड़ जवाब दिया है। टेनिस कोर्ट पर स्कर्ट पहनकर खेलने से लेकर एक पाकिस्तानी खिलाड़ी शोएब मलिक से शादी तक को भी विवाद बनाया गया। सानिया के खिलाफ कई बार फतवे भी जारी हुए। उन पर भारतीय राष्ट्र ध्वज के अपमान का आरोप लगा था, उनकी देशभक्ति पर भी सवाल उठाए गए। हाल ही जब उन्हें तेलंगाना का ब्रैंड एंबेसडर बनाया गया तब भी बहुत हंगामा हुआ। लेकिन, अपने स्वभाव के मुताबिक सानिया ने हर मुसीबत और चुनौतियों का डट कर मुकाबला किया। हर बार विपरीत परिस्थितियों में विरोधियों से लड़ते हुए सानिया और भी ताकतवर बनकर उभरीं। सानिया का परिवार इन तमाम स्थितियों में हमेशा उनके साथ रहा और लगातार बेहतरी के लिए आगे बढ़ने के लिए हौसलाअफ़ज़ाही करता रहा। परिवारवालों की मदद का ही ये नतीजा था कि सानिया के लिए कठिनाईयों पर फ़तह हासिल करना भी आदत-सी बन गयी।

चुनौतियां का सामना

महत्वपूर्ण बात ये भी कि सानिया ने जब से टेनिस खेलना शुरू किया तभी से विपरीत परिस्थितियों और कठोर चुनौतियां का सामना किया।

पिता इमरान मिर्ज़ा बताते हैं कि, "जब सानिया ने 6 साल की उम्र में टेनिस का रैकेट थामा था तब उन्होंने ये कल्पना भी नहीं की थी कि सानिया इतनी बड़ी खिलाड़ी बनेंगी और उनका दुनिया में इतना नाम होगा। सानिया ने जब खेलना शुरू किया था तब भारत में उनके लिए कोई रोल मॉडल भी नहीं था। कोई ऐसा डोमेस्टिक हीरो नहीं था जिसे देखकर प्रेरणा ली जा सके। जिससे कुछ सीखा जा सके।"

इमरान बड़े फ़क्र से साथ कहते हैं, " आज भारत के पास स्टार खिलाड़ी है, अपना सुपर स्टार हैं । सानिया मिर्ज़ा के रूप में ऐसी खिलाड़ी है जो 125 साल में टॉप महिला टेनिस खिलाड़ियों में जगह बनाने वाली पहली महिला है। मौजूदा पीढ़ी सानिया के साथ खेल सकती है, उनसे सीख सकती हैं। "

ये कहते भी पिता इमरान फूले नहीं समाते कि सानिया की कामयाबियों के बाद अब भारतीय लड़कियों के मन में ये जज़्बा पैदा हुआ कि यस, आई टू कैन डू इट।

सानिया के खेल सफर की शुरुआती मुश्किलों की यादें ताज़ा करते हुए इमरान ने बताया कि, “मैंने भी वही किया जो महेश भूपति और लिएंडर पेस के पिता ने अपने बच्चों के लिए किया था। अच्छी बात ये थी कि महेश, लिएंडर और सानिया के परिवारवालों की पृष्ट्भूमि खेल से जुड़ी थी। इस वजह से थोड़ी सहूलियत हुई। लेकिन, मेरे परिवार में क्रिकेट से ज्यादा जुड़ाव और लगाव था। मेरे चार बेहद करीबी रिश्तेदार नामचीन क्रिकेटर थे। लेकिन सानिया ने टेनिस का रैकेट थामा और आगे बढ़ी।”

सानिया मिर्ज़ा को पेशेवर ट्रेनिंग दिलवाने के लिए माता-पिता को कुछ व्यापारिक समुदायों से स्पाँसरशिप के रूप में मदद लेनी पडी थी। महेश भूपति के पिता कृष्णा भूपति ने भी सानिया को पेशेवर ट्रेनिंग दिलवाने में मदद की। लेकिन, सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात है कि, सानिया के लिए उनके पिता - इमरान और माँ - नसीमा ने हमेशा कोच, मोटिवेटर, मेंटर की भूमिका निभायी। इमरान ने बताया कि उनकी पत्नी और उन्होंने सानिया के लिए इतने काम किये हैं जिनकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

“हमने सानिया के ट्रेवल एजेंट, फाइनेंसर, सपोर्ट स्टाफ की तरह भी काम किया है। एक समय तो सानिया ने एक साल में 20 से 25 टूर्नामेंट खेले। इसके लिए हमें बहुत प्लानिंग करनी पड़ती थी। वीज़ा का काम भी हमें ही करना पड़ता था। फ्लाइट बुकिंग और होटल चेंजिंग भी हमारे ही जिम्मे था। अलग-अलग देशों में टैक्स भरने की जिम्मेदारी भी हम ही निभाते हैं।"

बेटी की काबिलियत और कामयाबी पर बेहद गर्व महसूस करने वाले इमरान ये भी कहते हैं कि, " टेनिस जैसे अंतर्राष्ट्रीय और बेहद प्रतिस्पर्र्धा वाले खेल में हर खिलाड़ी के लिए एक बेहद मज़बूत सपोर्ट सिस्टम का होना बहुत ज़रूरी है। इस सपोर्ट सिस्टम की वजह से ही खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ अपने खेल पर फोकस कर पाता है। मजबूत सपोर्ट सिस्टम न होने की स्थिति में खिलाड़ी कमजोर नज़र आता है।”

अपने अनुभव का हवाला देते हुए इमरान मिर्ज़ा कहते हैं कि किसी भी टेनिस खिलाड़ी के लिए सबसे मजबूत सपोर्ट सिस्टम उसके माता-पिता ही दे सकते हैं।

नए खिलाड़ियों को सलाह

मौजूदा दौर के खिलाड़ियों को सलाह के तौर पर इमरान मिर्ज़ा ये कहते हैं कि सिर्फ पैसों के लिए बच्चों को खेल की ओर मोड़ना नहीं चाहिए। अगर जुनून है तो हर काम जुनून से करना चाहिए। जूनून ही खिलाड़ियों को आगे बढ़ाता हैं। इमरान की शिकायत है कि कई होनहार और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के माता-पिता वो सब नहीं कर रहे, जो उन्हें करना चाहिए। कई माता-पिता अपने बच्चों के लिए सही टूर्नामेंट चुनने में विफल हो रहे हैं। कम समय में बड़ी कामयाबी और बड़ी रकम उन्हें गलत फैसले लेने पर मजबूर कर रही हैं।

अब तक के अपने सारे अनुभवों का निचोड़ दूसरे अभिभावकों से सामने रखने की इच्छा के साथ इमरान कुछ सलाह भी दे रहे हैं। वे कहते है कि “शुरुआत में माता-पिता को खेल के साथ साथ बच्चों की पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए। किसी भी हाल में पढ़ाई छूटनी नहीं चाहिए। वजह ये कि न जाने किसी वजह से खेल छूट भी सकता है। वजह पैसों की किल्लत हो सकती हैं। किसी शारीरिक चोट की वजह से खेल छूट सकता है। दूसरे खिलाड़ी काफी आगे निकल जा सकते हैं। यही वजह है कि अगर खेल छूट भी गया तो पढ़ाई की वजह से बच्चे का करियर खराब नहीं हो सकेगा।”

पैसों के खर्च के मामले में इमरान मिर्ज़ा के अपने तर्क और सुझाव हैं। वे कहते हैं कि “माता-पिता का जुनून अगर सातवें आसमान पर भी हो तब भी अपने बच्चों के खेल में उतना ही निवेश करना चाहिए जितना कि ज़रूरी हैं और उतना मिलने की पूरी गुंजाइश हो। वरना जुनून की वजह से नुकसान ही नुकसान हो सकता है।”

इमरान कहते है कि “माता-पिता के लिए ये भी बेहद ज़रूरी है कि वो सही निर्णय सही समय पर लें। इतना ही नहीं माता-पिता को अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ करना चाहिए। सिर्फ कोच के भरोसे छोड़ना सही नहीं है। खिलाड़ियों के साथ माता या पिता का सफर करना भी ज़रूरी है। मैं और मेरी पत्नी में से कोई एक हमेशा सानिया के साथ रहा है। सही टूर्नामेंट चुनना भी अभिभावकों की ही ज़िम्मेदारी हैं। कुछ टूर्नामेंट जीतने के मकसद से ही खेले जाते हैं और कुछ सिर्फ इस मकसद से बढ़िया अनुभव मिल सके। मुझे आज भी वो दिन याद हैं जब मैंने सानिया के लिए पाकिस्तान में एक ऐसा ही टूर्नामेंट चुना था। मैं जानता था कि सानिया ये टूर्नामेंट जीत सकती हैं और इससे उसे करियर में फायदा मिलेगा। चूँकि टूर्नामेंट पाकिस्तान में था और वहां हालात ठीक नहीं थे कई लोगों ने बेवजह, जाने का विरोध किया। लेकिन सानिया वहां गयी और वो हासिल लिया जिसका भरोसा था।”

बड़ी सलाह इमरान मिर्ज़ा ये देते है कि माता-पिता को अपना जूनून बच्चों पर नहीं थोपना चाहिए। बल्कि बच्चों के जूनून को सही अंजाम तक पहुँचाना चाहिए। इमरान मिर्ज़ा के मुताबिक भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है। चैंपियन बनने की काबिलियत कई खिलाड़ियों में हैं। इन खिलाड़ियों के लिए ज़रूरी है कि वे मौजूदा समय में मौजूद सभी सुविधाओं का भरपूर लाभ उठाये और अपने सपने साकार करें।

ये पूछे जाने पर कि क्या सानिया को चैंपियन की कोशिश में उनके कई सारे काम और शौक पीछे छूट जाने पर कोई गिला है क्या? इमरान मिर्ज़ा ने कहा,

"बेटी के यश के सामने सब फीका है। सानिया की कामयाबी से बड़ी चीज़ हमारे लिए कुछ नहीं। बेटी की काबिलयत और हमारे खेल के प्रति प्रेम ने हमसे सब कुछ करवाया है।"

इमरान मिर्ज़ा की बात सच है क्योंकि संतान की कामयाबी एक पिता के लिए पूरे जीवन की सबसे बड़ी कमाई है। हर भारतीय माता-पिता अपनी संतान को खुद से ज्यादा बड़ा और बेहतर देखने के सपने संजोता है। हिंदी के मशहूर कवि और मधुशाला के रचयिता हरिवंश राय बच्चन से जब किसी ने पूछा था कि आपके जीवन की सबसे अच्छी कविता कौन सी है तो जवाब में उन्होंने कहा था-‘अमिताभ’

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