केरल की नई आरक्षण नीति के तहत पुजारी बने पहले दलित यदु कृष्ण

0

9 अक्टूबर को, जब एक दलित परिवार में जन्मे युवा पुजारी केरल के पथानामथिट्टा जिले में थिरुवल्ला में महादेव मंदिर के प्रवेश द्वार में प्रवेश किया तब वह मंदिर नीति में एक आधिकारिक बदलाव का अवतार बन गया।

साभार: ट्विटर
साभार: ट्विटर
यदु कृष्ण विनम्र व्यक्ति हैं, जो उतनी ही विनम्रता के साथ बात भी करते हैं। जब वो अपने जीवन के दूसरे दशक में थे तो वह अपने 15 साल की उम्र से ही देखे गए सपने पर काम करने लगे थे। वो एक पुजारी के रूप में मंदिरों में देवताओं की सेवा करना चाहते थे।

देश में जिस तरह जातीय कटुता बढ़ रही है, अभी हाल ही में नवरात्रि के पावन अवसर पर गुजरात में एक दलित व्यक्ति को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने नृत्य किया। ऐसे में ये खबर जख्म पर रूई के फाहे की तरह है।

यदु कृष्ण विनम्र व्यक्ति हैं, जो उतनी ही विनम्रता के साथ बात भी करते हैं। जब वो अपने जीवन के दूसरे दशक में थे तो वह अपने 15 साल की उम्र से ही देखे गए सपने पर काम करने लगे थे। वो एक पुजारी के रूप में मंदिरों में देवताओं की सेवा करना चाहते थे। लेकिन 9 अक्टूबर को, जब एक दलित परिवार में जन्मे युवा पुजारी केरल के पथानामथिट्टा जिले में थिरुवल्ला में महादेव मंदिर के प्रवेश द्वार में प्रवेश किया तब वह मंदिर नीति में एक आधिकारिक बदलाव का अवतार बन गया। 

देश में जिस तरह जातीय कटुता बढ़ रही है, अभी हाल ही में नवरात्रि के पावन अवसर पर गुजरात में एक दलित व्यक्ति को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने नृत्य किया। ऐसे में ये खबर जख्म पर रूई के फाहे की तरह है। कृष्ण को केरल की नई आरक्षण नीति के तहत नियुक्त किया गया है। केरल के सबसे शक्तिशाली धार्मिक निकायों में से एक त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने इस नियुक्ति का फैसला लिया है। हालांकि वह देवस्वोम के पहले दलित पुजारी नहीं हैं, लेकिन आरक्षण नीति के आधार पर ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। 

एक साक्षात्कार में यदु कृष्ण ने बताया, यह केवल नौकरी नहीं है। यह भगवान की सेवा है इसलिए मैं खुश हूं। लेकिन नियुक्ति के बारे में विशेष रूप से उत्साहित नहीं हुआ। यह सिर्फ मेरा कर्तव्य है। यहां तक कि अगर वे देवसवम के तहत पहले दलित पुजारी नहीं बनते हैं, तो वह मंदिर में मिलने वाले रिसेप्शन से भी खुश थे। यदु के मुताबिक, मुझे खुशी है कि सेवा संघ के लोगों और मंदिर के भक्तों ने मुझे सम्मान दिया। कुछ लोग सिर्फ नए पुजारी को देखने के लिए आए थे। हर कोई सचमुच सौहार्दपूर्ण है।

आरक्षण भी, योग्यता भी-

त्रावणकोर देवसवम बोर्ड के आयुक्त सी पी राम राजा प्रेमा प्रसाद ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,नव नियुक्त पुजारी को उन्हें आवंटित मंदिरों में शामिल होने के लिए 15 दिन का समय दिया गया है। केरल हिंदू एयक्या वेदी के महासचिव ई एस बिजू ने कहा कि पूर्व में, कुछ कट्टरपंथियों ने इस नियुक्ति का विरोध किया था, क्योंकि वे दलितों को पुजारी के रूप में नियुक्त करने के खिलाफ थे। हालांकि, अब लोगों की मानसिकता में बदलाव आया है। भक्तों की प्रमुख चिंता यह है कि पुजारी को मंदिर के मामलों में अच्छी तरह से वाकिफ होना चाहिए और उसका जीवन भी पदानुकूल होना चाहिए। एससी-एसटी और ओबीसी श्रेणियों के लिए कुल आरक्षण 32% है लेकिन पिछड़ी जाति के 36 नाम इस मंदिर की लिस्ट में शामिल थे। खास बात ये है कि आरक्षण से इतर कुछ नामों ने अपनी जगह मेरिट लिस्ट में भी बनाई है।

साभार: इंडियन एक्सप्रेस
साभार: इंडियन एक्सप्रेस

एससी पुलाया परिवार में जन्मे 22 वर्षीय कृष्ण, त्रावणकोर देवस्वोम भर्ती बोर्ड द्वारा चुने गए छह दलित पुजारी में से एक हैं। धर्म के मामले में केरल के मंदिर के इस उदार दृष्टिकोण का पूरे देश में स्वागत किया गया है। यदु के माता-पिता रवि और लीला दिहाड़ी मजदूर हैं। यदु को बचपन से ही आध्यात्मिकता की ओर झुकाव था। हर रोज भद्रकाली के पास के पास जाकर पूजा करते थे, भले ही ये पूजा केवल सप्ताहांत पर होती थी। 10 वीं कक्षा के बाद, उन्होंने संस्कृत में पढ़ाई शुरू कर दी और विद्यापीडोम में तंत्र-तंत्री (पूजा और अन्य अनुष्ठान करने की विद्या) सीखने लगे। तंत्री तंत्र कोर्स की अवधि 20 साल है। जबकि यदु ने इसे केवल दस वर्ष पूरा लिया। यदु बताते हैं, मंत्र सीखना और संस्कृत में पूजा करने का मार्ग आसान नहीं है। यह बहुत कठिन था।

लगन, मेहनत और श्रद्धा का सम्मिश्रण-

यदु के गुरु अनिरुद्ध तन्त्र ने मीडिया को बताया कि यदु के मूल गांव में उन्होंने नलकुइट श्रीधरम शास्त्री-भद्रकाली मंदिर में कृष्णा से मुलाकात की थी। वहां पर वो तन्त्री मंदिर के आचार्य के रूप में सेवा कर रहे थे, जबकि यदु एक दैनिक मजदूर के पुत्र की हैसियत से वहां एक सहायक था। उसमें अच्छे अनुशासन और आज्ञाकारिता जैसे कई गुण थे। वह मंदिर में पूजा के लिए फूल लाता था। वह इतना अच्छा लड़का था कि अगर मैं उसे दो प्रकार के पत्ते लाने के लिए कहूं, तो वह कम से कम दस टुकड़े लाता था। मैंने उससे उसकी जाति कभी नहीं पूछी। मैंने उससे बस इतना पूछा कि क्या वह शांति पूजा सीखना चाहता है, उसने हां में सिर हिलाया। फिर मैं उसे विद्यापीडोम ले गया।

यदु बताते हैं कि एक पुजारी के रूप में काम करना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन मैं इसका आनंद उठाता हूं। मेरे लिए यह नौकरी नहीं है, इसलिए मैं खुशी के साथ ऐसा करता हूं। मेरे पास छुट्टियां नहीं हैं और मुझे हर सुबह सुबह उठना पड़ता है लेकिन बचपन से मुझे और कुछ नहीं मिला है और मैं हमेशा एक पुजारी होने के नाते भावुक हूं।

ये भी पढ़ें: दिव्यांग लड़कियों को पीरियड्स के बारे में जागरूक करते हैं गांधी फेलोशिप के विनय

यदि आपके पास है कोई दिलचस्प कहानी या फिर कोई ऐसी कहानी जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो आप हमें लिख भेजें editor_hindi@yourstory.com पर। साथ ही सकारात्मक, दिलचस्प और प्रेरणात्मक कहानियों के लिए हमसे फेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ें...