छत्तीसगढ़ में 'नेकी का पिटारा' से भूखों को मिलता है मुफ्त भोजन

घर में बचा है खाना, तो फेंके नहीं "नेकी का पिटारा" है न...

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छत्तीसगढ़ की राजधानी बिलासपुर स्थित सदर बाजार में होटल व्यवसायी द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ने हाल ही में लोगों की मदद से भूखों के लिए फ्री भोजन की व्यस्था की है। वह कहते हैं- 'आपके घर में खाना बच गया हो तो मत फेंकिए, 'नेकी का पिटारा' में रख जाइए, इससे कुछ लोगों की भूख मिट जाएगी।' इसी तरह नागपुर के खुशरू पोचा अपने नगर के अलावा मुंबई, दिल्ली समेत बीस अन्य शहरों में भूखे मरीजों, तीमारदारों के लिए 'सेवा किचन' चला रहे हैं।

नागपुर और छत्तीसगढ़ में नेकी का पिटारा से जुड़े लोग
नागपुर और छत्तीसगढ़ में नेकी का पिटारा से जुड़े लोग
 करीब हर घर में रोज ही खाना व नाश्ता बचता है। जागरूकता के अभाव में लोग इसे फेंक देते हैं, जबकि यह किसी भूखे के काम आ सकता है। काम कर पाने में अक्षम और गरीबी का सामना कर रहे कई बुजुर्ग और बच्चों को अमूमन भरपेट भोजन नहीं मिलता। कई बार भूखे भी रहना पड़ता है।

कहते हैं कि भूखे को भोजन, प्यासे को पानी नहीं दिया तो छप्पन भोग बेकार। मोहद्दीपुर (गोरखपुर) निवासी सरदार मनजीत सिंह का शौक है अपनी कमाई से हर महीने में एक बार राहगीरों को भोजन कराना। संकल्प है कि जब तक उनका जीवन और साम‌र्थ्य है, अपने पथ से विचलित नहीं होंगे। इस मासिक लंगर के लिए उन्होंने बकायदा रसोइये रखे हैं। स्टाल के लिए दिल्ली से एक लाख खर्च कर रेडीमेड टेंट व गुरुवाणी भजन सुनाने के लिए म्यूजिक सिस्टम खरीदे हैं। लंगर वितरण करने वाले सेवादारों के लिए काले रंग की टी-शर्ट दिए हैं, जिस पर फ्री गुरुनानक किचेन का लोगो लगा रहता है। वह कहते हैं, गुरुनानक साहिब ने एक साथ संगत, पंगत और लंगर की परंपरा समाज को एक रूप में पिरोने के लिए शुरू की थी।

हर महीने लंगर पर उनके लगभग चालीस हजार रुपए खर्च होते हैं। बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में साहित्यकार एवं बिजनेसमैन द्वारिका प्रसाद अग्रवाल कुछ दिनो से भूखे लोगों को भोजन उपलब्ध कराने का एक नया ही मिशन शुरू किए हैं। वह लिखते हैं- 'मैं व्यापारी हूँ और लेखक भी। मेरी प्राथमिकता में ये दोनों उपक्रम हैं। उसके बाद परिवार है। उसके बाद समाज सेवा। समय प्रबंधन का मेरा यह क्रम तय है। हाँ, मैं जो भी काम करता हूँ, दिल से करता हूँ। कुछ करके अच्छा लगा, संतुष्टि मिली, उतना पर्याप्त है- मेरे लिए यही सफलता है।' वह कहते हैं- 'मेरी व्यवस्था में गरीबों को नहीं, भूखों को भोजन। यह भोजन मुफ्त नहीं है। इसके बदले खुशी का भुगतान करना होगा। मेरा पता है - सिम्स के पास, मेन रोड, सदरबाजार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) एवं मेरा फोन नंबर है - 07752236633, 07752411633.' भूखों के लिए बिलासपुर के सदर बाज़ार में इस मुफ्त भोजन ठिकाने पर लिखा है- 'अन्न केंद्र'।

इस भावना से ये केंद्र शुरू किया गया कि बचे हुए अन्न का सदुपयोग हो। वहां एक फ्रिज भी रखा रहता है। गत 14 जून की रात कोई परिवार कार से उतरा और दो व्यक्तियों का भोजन फ्रिज में रखकर चुपचाप चला गए। वह किसी होटल से पैक करवाया हुआ ताजा भोजन था। दो लड़कियां आम लेकर पहुंचीं और बताकर गईं कि 'कल से हम रोज ताजा खाना बनाकर लाएंगी, बचा हुआ नहीं।' जब उनकी फोटो लेने की कोशिश की गई तो उन्होंने पहले तो मना कर दिया लेकिन फिर समझाने पर मान गईं। उनके नाम हैं, प्रिंसी गंभीर और तरण सलूजा। इसीलिए कहा जाता है, 'मीलों दूर जाने के लिए एक कदम उठाना ज़रूरी है।'

द्वारिका प्रसाद अग्रवाल अपने शहर के लोगों से कहते हैं कि अक्सर आपके घरों में खाना या नाश्ता बच जाता होगा। कई बार होटल में भी खाना बच जाता है। उसे फेंक भी देते होंगे। यदि ऐसा कर रहे हैं तो अब बिल्कुल मत कीजिए। बचा हुआ खाना-नाश्ता सदर बाजार के जगदीश लॉज में बने केंद्र में रख दीजिए। कुछ घंटे खाना-नाश्ता खराब न हो, इसलिए वहां फ्रीज भी रखा है। कुछ लोगों ने बचाखुचा खाना-नाश्ता देना शुरू कर दिया है, जिससे भूखों का पेट भरने लगा है। इस तरह शहर के सबसे व्यस्त क्षेत्र सदर बाजार के होटल व्यवसायी द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ने अपने अनूठे केंद्र की शुरुआत की है। लोग अपने घरों-होटलों का बचा हुआ खाना पहुंचा रहे हैं।

अग्रवाल कहते हैं कि घरों में रोजाना अन्न की बरबादी रोकने और उसका सही उपयोग करने के लिए उन्होंने अपने संस्थान में 'अन्न केंद्र' की शुरुआत की है। इंदौर में पिछले कई वर्षों से एक संस्था ऐसा ही काम कर रही है। उन्होंने कहा कि करीब हर घर में रोज ही खाना व नाश्ता बचता है। जागरूकता के अभाव में लोग इसे फेंक देते हैं, जबकि यह किसी भूखे के काम आ सकता है। काम कर पाने में अक्षम और गरीबी का सामना कर रहे कई बुजुर्ग और बच्चों को अमूमन भरपेट भोजन नहीं मिलता। कई बार भूखे भी रहना पड़ता है। केंद्र शुरू होने के साथ ही कुछ लोग सहयोग का आश्वासन देने लगे थे। पुराने हाईकोर्ट रोड स्थित एक होटल कारोबारी ने बचा हुआ खाना व नाश्ता उपलब्ध कराने का भरोसा दिया। फिर शहर के तमाम लोग संपर्क में आने लगे। यहां रोजाना रात 11 बजे तक खाना-नाश्ता दिया जा सकता है। पहले दिन दो छोटे बच्चों की भूख इस खाने से मिटी। लोगों पर पूरा भरोसा है कि वे यहां ताजा व शुद्ध खाना ही रखेंगे ताकि ईमानदारी से उसे जरूरतमंदों को दिया जा सके। पहले लोगों ने बासी खाना भी रखने की आशंका जताई थी पर उन्हें नहीं लगता कि लोग ऐसा करेंगे।

इसी तरह नागपुर में एक संगठन बड़े पैमाने पर भूखों को खाना खिला रहा है। उसको नाम दिया है- 'नेकी का पिटारा'। द्वारिका प्रसाद अग्रवाल बताते हैं कि पिछले दिनो नागपुर से उन भोजन व्यवस्थापक खुशरू पोचा का फोन आया था। वह चाहते थे कि हम भी उनसे जुड़ जाएँ। लीजिए, जुड़ गए। अब बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में अन्नदान का यह कार्यक्रम 'अन्न केंद्र' नहीं, बल्कि 'नेकी का पिटारा' के नाम से ही जाना जाएगा। अब तो हमारा फ्रिज इतना भर जा रहा है कि उसमें भोजन रखने की जगह कम पड़ने लगी है। लगता है, अब बड़े साइज के फ्रिज का इंतजाम करना पड़ेगा। हमारे शहर के माधव मजुमदार बीती रात अपने दो साथियों के साथ आए थे। वह समाज सेवा के कई अनोखे कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारे लायक कोई कार्य तो अवश्य बताएं।

इसके बाद नीरज गेमनानी आए और ये कहते हुए बिस्किट के 120 पैकेट दे गए कि जिस समय भोजन न हो यहाँ, उस समय ये बिस्किट दे दिया करें। एक दिन मैं घर से अपनी लॉज के लिए स्कूटर पर निकला। रोज हेलमेट पहनता था, उस दिन चूक गया। अग्रसेन चौक पर ट्रैफिक सिपाही ने मुझे हाथ दिखाकर रोक लिया। मैं घबरा गया। सोचने लगा, 'रोज हेलमेट लगाता था, आज भूल गया। अब तो पकड़ा गया। सिपाही ने अपने हाथ जोड़ का मुझे प्रणाम किया और कहा, 'अंकल, अन्न वाला काम आप बहुत अच्छा कर रहे हैं।'

अपने लिए तो सभी जीते हैं, दूसरों की मदद करने के लिए कम ही लोग आगे आते हैं, लेकिन नागपुर के खुशरू पोचा उन शख्सों में शामिल हैं, जो दूसरों के दर्द को समझते हैं। यही कारण है कि उन्होंने गरीब लोगों की सेवा करने का बीड़ा उठाया है। खुशरू गरीबों के लिए खाने का इंतजाम करते हैं। गरीबों के लिए शुरु की गई इस फ्री सेवा को उन्होंने नाम दिया है 'सेवा किचन'। खुशरू पोचा कहते हैं कि जब मेरी मदर हॉस्पिटल में एडमिट थीं, तब मैंने देखा कि कई मरीज तथा उनके परिजनों के पास भोजन के लिए पैसा नहीं होता था। उनकी ऐसी हालत देखकर मन में ख्याल आया कि ऐसा सामाजिक कार्य किया जाए, जिससे सभी को पेट भरने के लिए भोजन मिल सके। तभी से शुरू हुआ हमारे 'सेवा किचन' का सफर।

आज 'सेवा किचन' के जरिए हम न केवल शहर में बल्कि हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई सहित बीस अन्य शहरों के हॉस्पिटलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। खुशरू पोचा पिछले तीन साल से 'सेवा किचन' चला रहे हैं। अकेले नागपुर शहर के ही दस से ज्यादा हॉस्पिटल में मरीजों तथा उनके परिजनों को संडे टू संडे भोजन दिया जा रहा है। साथ ही कई समाजसेवी संस्थाएं ऐसी हैं, जहां हॉस्पिटल में डेली भोजन की व्यवस्था फ्री दी जाती है। नागपुर में 'नेकी का पिटारा, नेकी की पोटली' नाम से फ्रिज रखे गए हैं, जिनमें फल, जूस, दूध के साथ कई पोषक तत्व रखे रहते हैं। शहर के कई हॉस्पिटलों में इन्हें रखा गया है, ताकि जिन मरीजों को इन चीजों की जरूरत है और वे नहीं खरीद सकते, उन्हें यह मिल सके।

दस नेकी का पिटारा में से नागपुर में चार, बंगलुरु में एक, दिल्ली में एक, हैदराबाद में तीन तथा ठाणे में एक रखा गया है। 'सेवा किचन' संस्था में लगभग 500 सदस्य हैं, जो बिना किसी से डोनेशन लिए काम करते हैं। डोनेट कार्ड नामक वेबसाइट से भी भोजन उपलब्ध कराया जाता है। पोचा के घर के किचन में रोज सुबह से भोजन बनना शुरू हो जाता है। बारह बजे से मरीजों के परिजन इंतजार में रहते हैं। भोजन के पैकेट अलग-अलग बनाकर दिए जाते हैं, जिसमें दाल, चावल, सब्जी, रोटी के साथ सलाद भी होता है। मरीजों के लिए अलग से खिचड़ी और परहेज का भोजन भी दिया जाता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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