किसानों की जेब भर रही तालमखाने की खेती

बढ़ती महंगाई में मखाने की खेती साबित हो रही है बेहतर विकल्प...

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वह जमाना गुजर चुका, जब मखाने खेती में जान खपाना घाटे का सौदा हुआ करता था। अब अमेरिका, यूरोप, अरब देशों में मखाने की भारी डिमांड है और उत्पादन उस स्तर पर नहीं हो पा रहा है। इसके निर्यात और विदेशी मुद्रा अर्जन की पर्याप्त संभावनाएं बनी हुई हैं। इसीलिए सरकार और कृषि वैज्ञानिक भी तालमखाना की खेती प्रोन्नत-प्रोत्साहित करने में जुट गए हैं। अब किसानों को बिचौलिय मुक्त बाजार मुहैया कराने के साथ ही पट्टे पर जमीनी उपलब्धता ग्यारह माह से बढ़ाकर सात साल कर दी गई है।

तालमखाना (फोटो साभार- ज्योत्सना पंत)
तालमखाना (फोटो साभार- ज्योत्सना पंत)
किसानों को ऑर्गेनिक मखाना के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ऑर्गेनिक मखाना में अपेक्षाकृत ज्यादा न्यूट्रीशंस पाए जाते हैं। इसीलिए यूके, यूएस, कनाडा और अरब देशों में इसकी मांग बहुतायत से होने लगी है।

खेती-किसानी पर सरकार ही मेहरबान नहीं, कृषि-प्रतिभाएं और बाजार भी उसे नई देश-दुनिया की दिशा में ले जा रहा है। दलदल में उगने वाले तालमखाने की खेती एक नई संभावना के रूप में कृषि-रोजगार क्षेत्र में उम्मीदें जगाने लगी है। विश्व का लगभग नब्बे फीसद मखाना उत्पादन बिहार में ही होता है और अमरीका से यूरोप तक मखाना निर्यात की बड़ी सम्भावनाएँ हैं। यह एक नकदी खेती है। साथ ही यह विदेशी मुद्रा कमाने का एक अच्छा माध्यम भी है। खाने के साथ ही इसका पूजा-पाठ में भी इस्तेमाल होता है। पोषक तत्वों से भरपूर तालमखाना एक जलीय उत्पाद है। इसका बीज भूनकर मिठाई, नमकीन, खीर आदि में इस्तेमाल होता है।

औषधीय गुणों वाले इस चमत्कारी एवं सुपाच्य तालमखाने में 9.7 प्रतिशत प्रोटीन, 76 प्रतिश कार्बोहाईड्रेट, 0.1 प्रतिशत वसा, 0.5 प्रतिशत खनिज लवण, 0.9 प्रतिशत फॉस्फोरस एवं प्रति एक सौ ग्राम 1.4 मिलीग्राम लौह पदार्थ होता है। ताल मखाने में अनेक औषधीय गुण हैं। वृद्धों, बीमारों, खासकर हृदय रोगियों के लिए यह अत्यन्त लाभकारी है। यह श्वास व धमनी के रोगों तथा पाचन एवं प्रजनन सम्बन्धी शिकायतें दूर करने में उपयोगी है। इसके बीज का अर्क कान के दर्द में आराम पहुँचाता है। पेट संबंधी शिकायतों की रोकथाम में भी इसका उपयोग लाभदायक होता है। भारत में इसका मुख्यतः 88 फीसद उत्पादन बिहार राज्य के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, सुपौल, सीतामढ़ी, पूर्णिया, कटिहार आदि जिलों में होता है।

उत्तरी बिहार देश के उन कुछ चुनिन्दा अंचलों में एक है, जहाँ पानी की कोई कमी नहीं है। इसीलिए इस क्षेत्र में जल आधारित उद्यमों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो रोजगार देने के साथ-साथ जल की गुणवत्ता भी बनाए रखें। बिहार में कोसी नदी के पूर्वी और पश्चिमी तटबंध किनारे को सुपौल के भीमनगर बांध से लेकर सहरसा के कोपरिया तक ऑर्गेनिक मखाना कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है। दरभंगा और मधुबनी जिले में मखाना का उत्पादन अधिक होता है। इसका कारण यह है कि वहाँ हजारों की संख्या में छोटे-बड़े तालाब और सरोवर हैं जो वर्षपर्यन्त भरे रहते हैं। दरभंगा के निकट बासुदेवपुर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का राष्ट्रीय मखाना शोध केंद्र भी है। हाल के वक्त में इसकी कृषि ने नए बदलाव के दौर में कदम रखा है।

कृषि वैज्ञानिक भी इसे गंभीरता से लेने लगे हैं। इससे बड़ी संख्या में महिलाओं को भी रोजगार मिलने लगा है। मखाना विशेषज्ञ कृषि-वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले उपयुक्त बाजार न मिलने से तालमखाना उत्पादक किसान इसकी खेती को लेकर निरुत्साहित रहते थे। अब उनको अपने आसपास ही ऊंची तथा सरकारी दरों पर मखाना बेचने के लिए बाजार उपलब्ध होने लगे हैं। इसकी खेती को डीपीआर के दायरे में भी लाया जा रहा है। किसान तैयार लावा विदेशों में भी भेजा जाएगा। ऑर्गेनिक मखाना उत्पाद की विदेशों में दिनों दिन मांग बढ़ती जा रही है। कीमत भी पारंपरिक मखाना से कम से कम पांच गुना ज्यादा मिल रही है।

किसानों को ऑर्गेनिक मखाना के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ऑर्गेनिक मखाना में अपेक्षाकृत ज्यादा न्यूट्रीशंस पाए जाते हैं। इसीलिए यूके, यूएस, कनाडा और अरब देशों में इसकी मांग बहुतायत से होने लगी है। कोसी क्षेत्र में बीपीएस कृषि महाविद्यालय के मखाना वैज्ञानिकों की टीम एक प्रोजेक्ट के तहत किशनगंज, पूर्णिया, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल आदि क्षेत्रों के मखाना किसानों को प्रशिक्षित करने की कार्ययोजना में जुटी है। ऑगेर्निक मखाना उत्पादक किसानों को प्रशिक्षण के दौरान उनको अपना उत्पाद बाजार को मुहैया कराने के तरीके भी सिखाए जा रहे हैं।

सरकारी स्तर पर भी अब मखाना किसानों की सभी समस्याओं को निपटाने को प्राथमिकता से लिया जाने लगा है। मखाने की खेती के योग्य जमीनों को भी हम चिन्हित करने में लगातार जुटे हुए हैं। मखाना कृषकों का कहना है कि वह फिलहाल अपना उत्पाद बेचने के लिए कोलकाता जैसे बड़े शहरों के थोक विक्रेताओं से संपर्क साधते रहते हैं लेकिन उन्हें लागत के अनुरूप कमाई नहीं मिलती रही है। इससे इसकी खेती में नुकसान के चलते कई किसान मुंह मोड़ने लगे जबकि आज भी इसकी मांग और खपत की बाजार में पर्याप्त संभावनाएं बनी हुई हैं। बाहरी नगरों से बिहार आकर महिलाएं मखाना के गुर्री से लावा बनाती हैं। इसके लिए अतिरिक्त मजदूरी देनी पड़ती है। जलकर की सफाई में भी समस्याएं होती हैं। अधिकांश जलकर पर जलकुंभी का प्रकोप रहता है। सरकारी तालाबों की बन्दोबस्ती किसानों के साथ नहीं हो पाती है। बन्दोबस्ती की शर्तों को आसान बनाया जाना चाहिए।

मखाने की खेती के लिए अपेक्षित क्षेत्रफल का तालाब होना चाहिए, जो कम से कम दो से ढाई फीट तक पानी से भरा रहे। पहले सालभर में एक बार ही इसकी खेती होती थी लेकिन अब कुछ नई तकनीकों और नए बीजों के आने से साल में दो बार इसकी उपज ली जा रही है। इसकी खेती दिसम्बर से जुलाई तक होती है। ताजा बदलाव यह आया है कि इसका उत्पादन मशीनी युग में प्रवेश कर गया है। अब मखाना का लावा मशीन से तैयार होने लगा है। ऑर्गेनिक तालमखाने के उत्पादन में किसी भी प्रकार के रसायनिक खादों के प्रयोग के बदले नीमयुक्त, वर्मी कंपोस्ट का प्रयोग किया जा रहा है। मधुबनी और दरभंगा जिले में पहले लगभग एक हजार किसान मख़ाने की खेती में जुटे थे, आज उनकी संख्या दस हजार के आसपास तक पहुंच चुकी है।

मनीगाछी गाँव के एक किसान ने पहले चार एकड़ रकबे के तालाब में मखाने की खेती शुरू की। अब दूसरे तालाब भी पट्टे पर लेकर उनमें मखाना उगा रहे हैं। इसी तरह मधुबनी के किसान रामस्वरूप मुखिया हर साल तीन से चार टन तक तालमखाने का उत्पादन कर ले रहे हैं। कृषि विभाग के अधिकारी खेती-किसानी और बाजार के बीच से बिचौलियों को हटाने में भी जुटे हुए हैं। होता क्या है कि किसान बिचैलियों को अपना उत्पाद औने-पौने दामों पर बेच देते हैं। मछुआरा महासंघ का कहना है कि आज भी मखाना उत्पादन पर साहूकारों और बिचौलियों का शिकंजा कसा हुआ है। अब उसे सुनियोजित तरीके से दाम दिलाने की कोशिशें की जाने लगी हैं।

मखाने की ऑर्गेनिक खेती को कृषि वैज्ञानिक और संबंधित महकमे लगातार प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे इस प्रयास में भी जुटे हैं कि विदेशी पूंजी निवेश का लाभ सीधे मखाना किसानों को मिले। इस दिशा में राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान(नियाम) जयपुर भी प्रयासरत है। वह किसानों को ब्रांडिंग, मार्केटिंग में प्रशिक्षित करने के साथ ही इसमें सहयोग भी कर रहा है। इसी दिशा में राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा, आईआईटी खड़गपुर, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी लुधियाना आदि भी जुटे हुए हैं।

कृषि वैज्ञानिकों और सरकारी हस्तक्षेप के बाद से बिहार में तालमखाने की खेती लगातार विकसित और विस्तारित होती जा रही है। राज्य में पहले कुल लगभग पांच से छह हजार टन तक ही मखाने का उत्पादन था, जो आज तीस-पैंतीस हजार टन तक पहुंच चुका है। यहाँ कुछ वर्षों में केवल उत्पादन में ही वृद्धि नहीं हुई है, उत्पादकता भी 250 किलोग्राम प्रति एकड़ की जगह अब 400 किलोग्राम प्रति एकड़ हो चुकी है। पहले किसानों के सामने मखाना बेचने की समस्या थी। इसकी ख़रीद के लिए कोई एजेंसी नहीं थी। नतीजतन मखाना उत्पादकों को औने-पौने दाम में अपने उत्पाद को बेचना पड़ता था। तकनीक के अभाव में मखाना उत्पादक अधिक दिनों तक इसे अपने घर में रख भी नहीं सकते थे लेकिन अब हालात आसान हो चले हैं।

मखाने की ख़रीद के लिए विभिन्न शहरों में 40 केन्द्र खोल दिए गए हैं। अब बैंक भी मखाना उत्पादकों को ऋण देने को तैयार हो गए हैं। सैकड़ों टन मखाना विदेशों में निर्यात हो रहा है। अरब और यूरोप के देशों से भी मखाने की माँग बढ़ती जा रही है। फिलहाल माँग के अनुरूप आपूर्ति नहीं हो पा रही है। कोलकाता, दिल्ली, मुम्बई में तीन-चार रुपए प्रति किलो मखाना बिक रहा है। आज मखाने की अधिक उपज के लिए कांटा रहित पौधों की नयी किस्म विकसित करने, गूड़ी बटोरने, लावा तैयार करने वाली नई मशीनों का आविष्कार जरूरी है। सरकार का भी ध्यान मखाने की खेती पर है। इसीलिए अब मखाने की ख़ेती के लिए पानी वाली जमीन ग्यारह महीने की बजाए सात वर्ष तक के लिए पट्टे पर दी जाने लगी है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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