तीस करोड़ का चंदा और कमल हासन का सबक

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कमल हासन दरअसल अपने ऐलान के बहाने भारतीय राजनीति की शुचिता की ओर इशारा करते हैं। वह भी, ऐसे वक्त में, जब सत्ताजीवी राजनीति सिर्फ पैसे कमाने का जरिया होकर रह गई है। 

कमल हासन
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होता क्या है कि कमल हासन जिस शुचिता की ओर इशारा कर रहे हैं, उसी तरह का इशारा कभी 'आम आदमी पार्टी' के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने भी किया था। लेकिन हकीकत सामने है कि आज हो क्या रहा है। 

किसी जमाने में डॉ राममनोहर लोहिया अपनी तरह की राजनीति की मनमाना परिभाषा गढ़ते हुए रिक्शे पर इसलिए नहीं बैठते थे कि उसे आदमी खींचता है। उससे भी एक ज्वाला फूटी, जेपी आंदोलन के रूप में, लेकिन हुआ क्या, उसकी भी हवा निकल गई!

सियासत में अपना दम आजमाने के लिए उतावले अभिनेता कमल हासन ने एक ऐसी बात का ऐलान किया है, जिसके निहितार्थ बहुत दूर तक जाते हैं। वह कहते हैं कि अपनी पार्टी बनाने के लिए उन्होंने जो फंड इकट्ठा किया था, अब उसे वह वापस लौटा देंगे। वह रकम कोई थोड़ी-बहुत नहीं बल्कि 30 करोड़ रुपए है। वह ये कहकर पैसा लौटाना चाहते हैं कि अभी तक उन्होंने अपनी पार्टी गठित नहीं की है, इसलिए अपने समर्थकों से पैसे लेना गलत है। वह ये भी कहते हैं कि इससे कोई कत्तई ये अंदाजा न लगा ले कि उन्होंने पार्टी बनाने के पहले के अपने फैसले से वह अपने कदम पीछे हटा रहे हैं। जब वह पार्टी बनाएंगे, तभी चंदा लेंगे।

यहां खास बात न कमल हसन की है, न उनकी भावी पार्टी की, न चंदे की, मुख्य बात है, उनकी उस नीयत की, जिसका भारतीय राजनीति में लंबे वक्त से अभाव दिख रहा है। हासन दरअसल अपने ऐलान के बहाने भारतीय राजनीति की शुचिता की ओर इशारा करते हैं। वह भी, ऐसे वक्त में, जब सत्ताजीवी राजनीति सिर्फ पैसे कमाने का जरिया होकर रह गई है। सेवाभाव नदारद हो चुका है। इसीलिए आएदिन जनसेवा के विचित्र दावे-प्रतिदावे किए जाते हैं। यहां तक कि सेवा के लिए दलों में खून-खराबे भी होते रहते हैं।

जनसेवा के लिए खून-खराबा करना, दंगा-फसाद करना, जनता को हिंसक तरीके से यह समझाने की कोशिश करना कि वे नहीं, वे सच्चे जनसेवक हैं, बाकी झूठे, कहने-सुनने में यह बात कितनी हास्यास्पद लगती है, आश्चर्यजनक भी। ऐसे मतलबी जमाने में यदि किसी के अंदर जनता की सेवा का भाव उमड़ रहा है तो क्या वह अपनी मंशा साफ करने के लिए लाठी-गोली का सहारा लेना चाहेगा, कत्तई नहीं। यही से शुरू होता है, सियासत में सेवा का ढोंग और जनता का पैसा सरकारी खजाने तक से लूट लेने का तिलिस्म।

होता क्या है कि कमल हासन जिस शुचिता की ओर इशारा कर रहे हैं, उसी तरह का इशारा कभी 'आम आदमी पार्टी' के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने भी किया था। लेकिन हकीकत सामने है कि आज हो क्या रहा है। दिल्ली में आप की सरकार कर क्या रही है। यद्यपि उसमें बहुत कुछ दुष्प्रचार का जादू-मंतर भी मिश्रित है। केंद्र सरकार और केजरीवाल सरकार के बीच सत्ता संभालने के पहले से चल रही रस्साकसी भी तमाम तरह की गलत बातों की वजह है।

इतना स्पष्ट है कि केजरीवाल की नीयत पर उस वक्त ही शक होने लगा था, जब उन्होंने मुख्य आंदोलनकारी अन्ना हजारे से किनारा किया था। पूरे देश को समझ में आ गया था कि दाल में कुछ काला जरूर है। और अब हकीकत सामने है। होता क्या है कि जब राजनेता कुर्सी पर बैठ जाता है तो उसकी नीति और नीयत दोनो में पहले के मुकाबले जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है। जनता तब मानने को मजबूर हो जाती है कि, अरे, ये तो वो भी वही निकला। अरविंद केजरीवाल का अन्ना हजारे से पृथक हो जाना, कोई मामूली बात नहीं रही है। वह दरअसल उस जनविश्वास के साथ धोखा रहा है, जिसके बूते भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव और देश के कायांतर के सपने देखे गए थे। केजरीवाल के करवट बदलते ही वे सारे सपने हवा हो गए।

भारतीय राजनीति में शुचिता की बात करने वाले अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल या कमल हासन कोई नए नही हैं, न उनकी बातें नई हैं। इसी तरह किसी जमाने में डॉ राममनोहर लोहिया अपनी तरह की राजनीति की मनमाना परिभाषा गढ़ते हुए रिक्शे पर इसलिए नहीं बैठते थे कि उसे आदमी खींचता है। उससे भी एक ज्वाला फूटी, जेपी आंदोलन के रूप में, लेकिन हुआ क्या, उसकी भी हवा निकल गई, जिस तरह केजरीवाल ने अन्ना के संघर्ष की हवा निकालकर अपनी ताजपोशी कर डाली। कमल हासन ये तो ऐलान कर रहे हैं कि अपने समर्थकों के 30 करोड़ चंदे के पैसे वह लौटाने जा रहे हैं, साथ में यह भी कह रहे हैं कि- लेकिन पार्टी बनाते समय फिर वह चंदे ले लेंगे।

अब इन दो बातों के बीच कुछ उसी तरह का फर्क है, जैसा जेपी आंदोलन और अन्ना आंदोलन के बीच का रहा है। यानी जनता के भरोसे का काम तमाम हो जाना। भरोसा क्या है, स्वतंत्रता आंदोलन की फतह के बाद भारतीय जन मानस में उगा वह स्वप्न कि जनता का राज होगा, जनता के पैसे से राजनेताओं की कोठियां नहीं, देश चलाया जाएगा, कोई अमीर-गरीब नहीं होगा, सब बराबर होंगे। लेकिन हो क्या रहा है। देश देख रहा है, अपने सपनों को तिलतिल मरते हुए। लेकिन सच इतना आसान नहीं होता है। रंग लाता है। वक्त कभी न कभी कोई और करवट जरूर लेगा, जो सारे झूठ के परखचे उड़ा डालेगी। तब तक जाने कितनी कीमतें चुकानी पड़ें हमारे मुल्क की बेचारी जनता को। फिलहाल, कमल हासन के ऐलान को इसलिए शाबासी दी जानी चाहिए कि लीक से हटकर कुछ तो सबक दिया।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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