जीवंत तस्वीरों से बोल उठी दीवारें

एक दंपति के अनूठे प्रयास दीवारों पर पेंटिंग्स बनाने के चलन को आगे बढ़ाने में जुटेनई तकनीक के ज़रिए पेंटिग्स बनाने की कोशिश

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सन् 2004 में गौरव खन्ना और उनकी पत्नी श्रद्धा खुराना आस्ट्रेलिया चले गए और 2006 में वहां की नागरिकता ग्रहण कर ली। सन् 2012 तक गौरव वहां वित्तीय क्षेत्र में काम करते रहे और श्रद्धा बैंक में कार्यरत रहीं। दो साल पहले, मेलबोर्न में गौरव को दीवारों पर भित्तिचित्र कला को जानने का मौका मिला और तुरंत ही वह इस कला के दीवाने हो गए।

आम तौर पर दीवारों की सतह पर ताजा प्लास्टर पर मुख्यतः वॉटर कलर्स से उकेरी जानेवाली पेंटिंग को भित्तिचित्र कहते हैं। ये रंग पानी में सूखे पाउडर को घोलकर बनाए जाते हैं, फिर इन्हें सूखाकर प्लास्टर के साथ दीवार पर स्थायी रूप से चढ़ा दिया जाता है।

गौरव ने इस कला के अपने लगाव के बारे में पत्नी से ज़िक्र किया। गौरव की पत्नी श्रद्धा को भी इसका चस्का लगा। और देखते ही देखते दोनों इसके ज़रिए कुछ करने की सोचने लगे। इस दंपति ने पिकस्केप नाम से एक परियोजना बनाई और भारत की ओर रूख किया। गौरव बताते हैं, "हमने अपना बोरिया-बिस्तर बांधा और डेढ़ साल पहले भारत चले आए। आज जहां हम हैं, यहां तक पहुंचने में ढ़ेर सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।" जनवरी महीने में दोनों ने पंजाब में पिकस्केप को लांच किया।

पिकस्केप पारंपरिक तरीकों और नवीनतम विज्ञान को जोड़कर ऐसे भित्तिचित्रों का निर्माण करती है जो प्रामाणिक एवं संग्रहणीय होते हैं। यह भारत की अकेली ऐसी कंपनी है जो मानक क्वालिटी सेवाएं देती है। अमृतसर की यह नई कंपनी दीवारों, पत्थरों और लकड़ी के पैनलों तथा विभिन्न तरह के खुरदरे सतहों पर भित्तिचित्र उकेरने का काम करती है।

अमृतसर जैसी जगह से बिल्कुल अनजाने कला रूप- भित्तिचित्र को बाजार में बेचना बहुत मुश्किल है। गौरव इसे यों पेश करते हैं, "अमृतसर में रहकर कला के जरिए पैसा कमाने के बारे में सोचना ठीक वैसा ही है जैसे लास एंजेल्स में गोलगप्पे बेचकर पैसा कमाना। .... इस शहर में कोई उद्यमशीलता संस्कृति नही है और न ही संसाधन उतने बेहतर हैं। प्रोजेक्ट के अंतर्गत सेवाओं के विस्तार की दृष्टि से हमारी क्षमता भी सीमित है।"

पिकस्केप ने छोटी अवधि में वास्तुशिल्प के अनेक काम किए हैं, सात प्रोजेक्ट पूरे किए और कुछ कतार में हैं। श्रद्धा कहती हैं, "जनवरी में हमने पहला प्रोजेक्ट पूरा किया, इससे करीब तीन लाख रुपए अर्जित किए। अभी हम तीन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं तथा कुछ और प्रोजेक्ट्स पर बातचीत चल रही है।"

यहां सवाल उठता है कि पिकस्केप के भित्तिचित्र अजंता-एलोरा की गुफाओं के भित्तिचित्रों से कैसे अलग हैं? श्रद्धा इसे स्पष्ट करती हैं, "अजंता-एलोरा की गुफाओं की दीवारों पर पेंटिग हैं और हम भी दीवारों पर पेंटिग ही बनाते हैं- मुख्य फर्क है आधुनिक व त्वरित तकनीक एवं सामग्रियों के इस्तेमाल का।"

पिकस्केप की मुख्य विशेषता उसकी योजनाबद्ध कला दृष्टि है। श्रद्धा जोर देती हैं, "हम हरेक प्रोजेक्ट के लिए शोध करते हैं, कलाकृतियों के लिए प्लान और डिजाइन बनाते हैं और तब जाकर इसे निष्पादित करते हैं।"

कंपनी का उद्देश्य है- प्रौद्योगिकी और विज्ञान की मदद से परंपरा को पुनर्जीवित करना और इस डिजीटल दुनिया में पिछड़ रहे स्थानीय पेंटरों को रोजगाार उपलब्ध कराना।

भित्तिचित्रों में इस्तेमाल किए जानेवाले तमाम रंग घरेलू उपयोग हेतु सुरक्षित और साथ ही इको फ्रेन्डली हैं। कंपनी दीवारों पर भित्तिचित्र बनाने में 4-7 दिनों का समय लेती है। बड़े प्रोजेक्ट और सीलिंग के मामले में ज्यादा समय लगता है। आमतौर से पेंटिंग, इस्लामी आर्ट, इतालवी और इंगलिश साज-सज्जा, नक्काशी और प्रचलित कंसेप्ट आर्ट पर काम होती है।

पिकस्केप के अनूठे कला रूपों को घर, होटल, कैसिनो, रेस्तरां, मस्जिद, चर्च, मंदिर के अलावा दूसरे स्थलों पर उकेरा जा सकता है। कंपनी प्रति वर्ग इंच के लिए सात रुपए, सीधे दीवारों पर कलाकारी और पत्थर एवं संगमरमर पर भित्तिचित्रों के लिएः प्रति वर्ग इंच क्रमशः 10 एवं 14 रुपए वसूलती है।

दंपति का लक्ष्य है कि पिकस्केप का पूरे भारत में फैलाव हो। साथ ही उनकी इच्छा है कि वो वास्तुकारों तथा इंटेरियर डिजानरों के साथ काम करें। गौरव कहते हैं, "हमारी योजना है- भित्तिचित्रों के लिए वास्तुकारों को पेशेवर कलात्मक सेवाएं मुहैया कराना और इस प्रक्रिया में स्थानीय कलाकारों को रोजगाार उपलब्ध कराना। साथ ही आधुनिक तकनीक, विज्ञान एवं विचार का पारंपरिक कला के साथ समन्वय का एक उदाहरण प्रस्तुत करना।"

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