लाखों लड़कियों की सच्ची सखी है अदिति

मासिक धर्म पर करवाई चर्चा, तोड़े कई भरमबंद करवाईं गलत आदतें, शुरू करवाया उत्तम तरीकाक्या औरत, क्या मर्द - सभी ने काम को सराहाजागरूकता अभियान ने दिलाई पहचान और लोकप्रियता

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भले ही हर प्रौढ़ लड़की और औरत के लिए मासिक धर्म आम बात हो ।

बात मासिक धर्म की हो तो, ये जानना भी ज़रूरी है कि ये प्राकृतिक और नियमित भी है। मासिक धर्म महीने में एक बार होता है, सामान्यतः 28 से 32 दिनों में एक बार। हालांकि अधिकतर मासिक धर्म का समय तीन से पांच दिन रहता है परन्तु दो से सात दिन तक की अवधि को सामान्य माना जाता है।लेकिन, समस्या ये है कि मासिक धर्म के समय प्रौढ़ लड़कियों और औरतों को कई तरह की तकलीफ होती है। शरीर के कई हिस्सों में दर्द की शिकायत अमूमन हर महिला करती है। शुरूआती महीनों में लड़कियों को सबसे ज़्यादा तकलीफ होती है। कई लडकियां शारीरिक और मानसिक समस्याओं से परेशान रहती हैं। भारत में एक बड़ी समस्या ये रही है कि लडकियां अक्सर शर्म और झिझक के कारण अपनी तकलीफ किसी को भी नहीं बतातीं। कई लड़कियों को सही जानकारी न होने की वजह से वो ज्यादातर समय उलझन में ही रहती हैं।

कई लडकियां और महिलायें मासिक धर्म में होने वाले दर्द को सहन कर लेती हैं , लेकिन कुछ के लिए इस दर्द को सहना काफी मुश्किल होता है।

जानकारों के मुताबिक , आमतौर पर मासिक धर्म में निचले उदर में ऐंठनभरी पीड़ा होती है। कई औरतों को तेज दर्द होता है, तो कईयों को हल्का-सा या फिर चुभने वाला दर्द होता है। कईयों को पीठ में दर्द होता है । दर्द कई दिन पहले भी शुरू हो सकता है और मासिक धर्म के एकदम पहले भी । मासिक धर्म के समय होने वाले रक्त स्राव से भी कई औरतें परेशान रहती हैं। ज्यादा या लगातार रक्त स्राव होने से समस्या बढ़ जाती है।

इस बात में दो राय नहीं कि भारत के गाँवों और छोटे शहरों में आज भी लड़कियों में मासिक धर्म के प्रति जागरूकता नहीं है। कई लडकियां और औरतें आज भी कई सारी गलत जानकारियों , गलतफहमियाँ ,अज्ञानता , और पुरानी परम्पराओं का शिकार हैं।

जानकारों का ये भी कहना है कि मासिक धर्म के समय स्वास्थ सम्बन्धी सावधानियां न बरतने की वजह से कई सारी लडकियां और औरतें कई सारी तकलीफें झेलती हैं। अगर सही कदम उठाये जाएँ , सारी सावधानियां बरती जाएँ तो तकलीफें काम हो जाती हैं। तों, खासकर लड़कियों, में मासिक धर्म के बारे में जागरूकता लाने के लिए एक भारतीय युवती के अनोखे अंदाज़ में एक अभियान की शुरुआत की ।

इस अभियान के ज़रिये ये युवती ज्यादा से ज्यादा लड़कियों और औरतों के बीच पहुँच कर मासिक धर्म को लेकर उनकी शर्म, झिझक , अज्ञानता को दूर करने में जी-जान लगाकर जुटी है।

जिस युवती की हम बात कर रहे हैं , उसका नाम अदिति गुप्ता है।

अदिति का ये अभियान सिर्फ सराहनीय ही नहीं बल्कि प्रेरणा देने वाला भी है।

एक पिछड़े हुए राज्य के छोटे से शहर से अपनी शुरुआत करने वाली इस युवती ने एक लम्बा सफर तय किया है।

कम समय में अपनी प्रतिभा और सकारात्मक विचारों से इस महिला ने कई लड़कियों और औरतों के जीवन में दर्द को कमकर खुशियाँ बढ़ायी हैं।

उम्र भले ही कम हो, यह युवती कईयों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है।

बड़े ही रोचक, अनोखे और लुभावने अंदाज़ में अदिति गुप्ता लड़कियों और औरतों में मासिक धर्म के प्रति जागरूकता ला रही हैं।

ये कहना गलत न होगा कि मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं का निदान करते हुए अदिति देशभर में कईयों लड़कियों और औरतों की सच्ची-अच्छी और पक्की सखी-सहेली बन गयी हैं।

एक सामान्य लड़की से सबकी "सखी-सहेली" बनने की अदिति की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है।

अदिति का जन्म झारखण्ड के एक छोटे से गांव गढवा में हुआ। परिवार मध्यम वर्गीय और रूढ़िवादी था।

अदिति बचपन में ही मासिक धर्म से जुड़े वर्जित कार्यों को जान गयी थी।

१२ साल की उम्र में अदिति को पहले मासिक धर्म का अनुभव हुआ।

अदिति ने तुरंत अपने मासिक धर्म की शुरआत के बारे में माँ को बताया।

माँ रूढ़िवादी थीं और पुराने रीति-रिवाज को मानते आ रही थीं। सो, उन्होंने ढाई लोटा पानी से अदिति का स्नान कार्य ये समझकर किया कि मासिक धर्म सिर्फ ढाई दिन ही रहेगा।

यहीं से अंध-विश्वास को जानने समझने की शुरआत हुई थी अदिति के लिए।

पहला अनुभव ही बहुत कुछ सिखाने वाला था।

माँ ने अदिति को मासिक धर्म के समय दूसरों के पलंग के पास तक जाने नहीं दिया। अदिति को पूजा - स्थल से दूर रखा गया। उसे अपने कपड़े खुद साफ़ करने के लिए कहा गया। अचार छूने से रोक गया क्योंकि घर वाले मानते थे कि मासिक धर्म में अचार छूने से वो खराब हो जाता है।

मासिक धर्म ख़त्म होने के बाद भी बहुत कुछ होता था। अदिति को अपने पलंग की चादर को साफ़ करना पड़ता। सातवें दिन तक अदिति 'अपवित्र' समझी जाती। सातवें दिन पूर्ण स्नान के बाद ही अदिति को सामान्य और फिर से पवित्र माना जाता।

हर महीने होने वाली इन सारी घटनाओं का अदिति के दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ा।

यही असर आगे चल कर अदिति के लिए कुछ बड़ा, सकारात्मक और क्रांतिकारी करने के लिए प्रेरक बना।

हैरत में डालने वाली बात तो ये थी कि अदिति के परिवार वाले अदिति के लिए सेनेटरी पैड खरीद सकते थे , लेकिन पुरानी रूढ़िवादी परम्पराओं को जैसे का वैसा निभाने के लिए परिवार वालों ने वैसा नहीं किया। अदिति को कपड़े से काम चलना पड़ा। परिवारवालों को लगता था की दूकान जाकर पैड खरीदने से परिवार की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचेगा।

अदिति ने पहली बार सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल उस समय किया जब उसका दाखिला बोर्डिंग स्कूल में कराया गया था। बोर्डिंग स्कूल में साथी छात्राओं ने अदिति को बताया था कि किसी भी मेडिकल शॉप में सेनेटरी नैपकिन मिल जाती है। अदिति तुरंत दूकान गयी और नैपकिन खरीद लाई।

१५ साल की उम्र में पहली बार अदिति ने नैपकिन का इस्तेमाल किया था और वो बहुत खुश हुई थी।

अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान अदिति की मुलाकात तुहिन से हुई। दोनों एक दूसरे को समझने लगे थे। कुछ ही समय में दोनों अच्छे दोस्त भी बन गए। विचार मेल खाते थे , इस लिए करीब आने में जयादा समय नहीं लगा। दोस्ती इतनी पक्की हुई कि दोनों ने शादी कर ली।

तुहिर को मासिक धर्म के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उसने अदिति के हाव-भाव और काम-काज देखकर मासिक धर्म के बारे में जानना चाहा

और इंटरनेट और किताबों से जानकारी हासिल की। यही जानकारी तुहिर ने अदिति को बताई। अदिति को कई बातें तो बिलकुल नयी और बहुत ही दिलचस्प लगी। उसने ये बातें पहले नहीं सुनी या पढ़ी थीं। तभी अदिति को ये ख़याल आया कि देश भर में कई लडकियां और महिलाएं उसी की तरह हैं, जिनके पास सही जानकारी नहीं है और वे भी पुरानी और गलत रीति-रिवाजों को निभा रही हैं। और उसी दिन से अदिति ने तुहिर के साथ मिलकर मासिक धर्म के बारे में जानकारियां हासिल करना शुरू किया। और, इसी से शुरुआत हुई शोध और अनुसंधान की, खोज की।

जितनी सारी वैज्ञानिक जानकारियां दोनों से हासिल कीं, उसे लोगों के साथ बांटने का फैसला किया।

एक साल के शोध में जो जानकारियां मिलीं उसी को आधार बनाकर लोगों में जागरूकता लाने लिए एक वेबसाइट शुरू की गयी।

यही वेबसाइट एक क्रांतिकारी कदम साबित हुई। साइट का नाम रखा गया "मेंसट्रूपीडिया"।

इस वेबसाइट के ज़रिये लड़कियों और महिलाओं को मासिक धर्म के बारे में सही और वैज्ञानिक जानकारियां दी गयी। लोगों की गलतफहमियों को दूर किया गया। गलत , अवैज्ञानिक और हानिकारिक परम्पराओं पर रोक लगाने की कोशिश हुई।

धीरे-धीरे वेबसाइट की लोकप्रियता बढ़ती गयी। ये वेबसाइट लोगों को आपस में बात करने का एक जरिया भी बनी। लडकियां और औरतें में जागरूकता आयी और वे भी अब खुलकर मासिक धर्म के बारे में बात करने लगीं।

अदिति की पहल की वजह से ही लड़के और मर्द भी मासिक धर्म के बारे में सही जानकारी लेने लगे। वरना भारतीय परिवारों में लडकियां और महिलाएं मासिक धर्म के बारे में सब कुछ लड़कों और मर्दों से छिपा कर रखती थीं।

लोगों ने जिस तरह से "मेंसट्रूपीडिया" को सराहा और उससे जुड़े, अदिति का उत्साह और भी बढ़ता गया , वो अपने जागरूकता अभियान को और भी आगे ले जाने लगी।

आप भी शायद ये बात जानकार हैरान होंगे कि अदिति के वेबसाइट को हर महीने एक लाख से ज्यादा लोग देखते और पढ़ते हैं।

इतना ही नहीं अदिति ने "कॉमिक" के ज़रिये लड़कियों में मासिक धर्म के बारे में जागरूकता लाने की अनोखी पहल की।

कॉमिक बुक्स की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए अदिति ने मासिक धर्म की सही जानकारियां इन बुक्स के ज़रिये उपलब्ध कराई।

ये बुक्स इतनी मशहूर हुई कि लोग अपनी बेटियों को देने के लिए इन्हें बेहिचक खरीदने लगे।

इन कॉमिक बुक्स की चर्चा अब दुनिया भर में है। दक्षिण अमेरिका और फिलीपींस के लोगों ने अपनी लड़कियों और महिलाओं में जागरूकता लाने के लिए इन कॉमिक बुक्स को भारत से मंगाया है।

ये अदिति की पहल और कोशिश का ही नतीजा है कि अब स्कूलों में भी लड़कियों को मासिक धर्म के बारे में पढ़ाया जाने लगा है। पहले ये पढ़ाई नवीं या दसवीं कक्षा में शुरू होती थी , लेकिन अब सही समय पर होने लगी है।

अदिति ने न सिर्फ भारतीय समाज में मौजूद कई गलत आदतों को बंद करवाया है, बल्कि सही और उत्तम तरीके अपनाने के लिए लोगों को मजबूर किया है। स्वास्थ की रक्षा करने का मन्त्र बताकर अदिति भारत में कई लड़कियों और महिलाओं की सखी-सहेली बनी है।