सोशल मीडिया से फैलाई जाने वाली अफवाहों से जा रही है लोगों की जानें

मीडिया पर भारी सोशल मीडिया बना जान की आफत...

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कोई अच्छा सिस्टम भी किस तरह खतरनाक हो जाता है, इससे जानना है तो आज सोशल मीडिया प्लेटफार्म इसका ताजा उदाहरण है। सोशल मीडिया से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या तो सायबर अपराध है। सोशल मीडिया पर बच्चा चोरी की अफवाहों ने 20 मई से अब तक करीब 14 लोगों की जान ले ली है। केंद्र सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आगाह कर रही है कि वे मॉब लिंचिंग रोकने के लिए तत्काल गंभीर कदम उठाएं। सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र को इस दिशा में आगाह कर चुका है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
हमारे देश में वैसे भी अफवाहें आदिकाल से समाज पर असर डालती रही हैं। कथित पत्रकार के रूप में नारद मुनि तक इसके लिए पौराणिक आख्यानों में विख्यात रहे हैं। इस समय सबसे बड़ी चुनौती सोशल मीडिया पर तेजी से रोजाना फैलाई जा रहीं अफवाहों को रोकना है।

शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो, जो सोशल मीडिया में सक्रिय न हो। फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर पर ऐसे अकाउंट धारक दिन-रात सक्रिय होते हैं। एक सर्वे के मुताबिक एक दिन में ऐसा हर व्यक्ति औसत तीन घंटे का समय सोशल मीडिया पर बिता रहा है। लोकप्रियता के प्रसार में सोशल मीडिया एक बेहतरीन प्लेटफॉर्म है, जहां व्यक्ति स्वयं को अथवा अपने किसी उत्पाद को ज्यादा लोकप्रिय बना सकता है। आज फिल्मों के ट्रेलर, टीवी प्रोग्राम का प्रसारण भी सोशल मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है। वीडियो तथा ऑडियो चैट भी सोशल मीडिया के माध्यम से सुगम हो पाई है जिनमें फेसबुक, व्हॉट्सऐप, इंस्टाग्राम कुछ प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं। इस सोशल प्लेटफार्म के फायदे हैं तो कई बड़े सामाजिक नुकसान भी। आज सोशल मीडिया पर महेंद्र सिंह धौनी के संन्‍यास की अफवाहें वायरल होने से भूचाल आया हुआ है।

सोशल मीडिया से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या तो सायबर अपराध है। यहां से प्रसारित हो रहीं बहुत सारी जानकारियां भ्रामक सिद्ध हो रही हैं। ज्यादातर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। उकसाने वाले तत्वों ने कई बड़ी घटनाओं को जन्म दिया है। उनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता है। मनोविश्लेषकों एवं समाज विज्ञानियों का मानना है कि ऐसे हालात की जड़ें सामाजिक ताने-बाने और दशकों से समाज में कायम कुसंस्कारों में छिपी हैं। हाल के दिनों में ऐसी घटनाओं में वृद्धि से ये भी पता चलता है कि न्याय व्यवस्था से लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है। साथ ही, अब इस हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए एक कड़ा कानून जरूरी हो गया है। उनका मानना है कि महज सोशल मीडिया पर निगरानी से खास फायदा नहीं होगा। जागरुकता अभियान चलाना ज्यादा जरूरी हो गया है। सोशल मीडिया पर लगातार फेक न्यूज प्रसारित हो रही हैं। इस पर अंकुश के लिए सोशल मीडिया साइट्स सक्रिय हैं। भारत में 20 करोड़ लोग व्हाट्सऐप इस्तेमाल करते हैं जिसमें तमाम मैसेज, फोटो या वीडियो फर्जी होते हैं जो देखते ही देखते वायरल हो जाते हैं।

ऐसी हरकतें करने वालों का मूल स्रोत नदारद होने से प्राइवेसी खत्म होने का हर वक्त खतरा रहता है। फोटो या वीडियो की एडिटिंग कर भ्रम फैलाए जा रहे हैं। इससे कई एक दंगे हो चुके हैं। ऐसे हालात की कई वजहें हैं। मसलन, यहां किसी प्रकार से कोई भी व्यक्ति किसी भी कंटेंट का मालिक नहीं होता है। फोटो, वीडियो, सूचना, डॉक्यूमेंटस आदि को आसानी से शेयर किया जा सकता है। हमारे देश में वैसे भी अफवाहें आदिकाल से समाज पर असर डालती रही हैं। कथित पत्रकार के रूप में नारद मुनि तक इसके लिए पौराणिक आख्यानों में विख्यात रहे हैं। इस समय सबसे बड़ी चुनौती सोशल मीडिया पर तेजी से रोजाना फैलाई जा रहीं अफवाहों को रोकना है। सरकारों को भी इसका कोई काट नहीं सूझ रहा है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के टेक्नोक्रेट भी इसके आगे हथियार डाल चुके हैं।

सोशल मीडिया पर बच्चा चोरी की अफवाहों ने 20 मई से अब तक करीब 14 लोगों की जान ले ली है। इन अफवाहों पर लोगों ने विश्वास करके भीड़ के रूप में पीड़ित लोगों को हमला किया और उन्हें पीट-पीटकर मार डाला। पिछले कुछ समय में मॉब लिंचिंग की घटनाएं पश्चिम बंगाल, असम, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और ओडिशा से सामने आई हैं। भीड़ द्वारा किसी को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार देने को 'मॉब लिंचिंग' कहा जाता है। मॉब लिंचिंग की कई घटनाएं हाल ही में त्रिपुरा में हो चुकी हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सुकांता की जिस तरह से हत्या की गई, उससे महसूस किया जा सकता है कि दूर दराज में बसे लोगों को अफवाहों के प्रति जागरूक करना प्रशासन के लिए कितना मुश्किल हो चुका है।

केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मॉब लिंचिंग रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाने को कहा है। सोशल मीडिया पर बच्चा चोरी की अफवाहों के बाद ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। अब विभिन्न सामाजिक संगठन पूरे देश में भीड़ द्वारा पिटाई की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कड़ा कानून बनाने की मांग उठाने लगे हैं। गौरतलब है कि सीरिया के कुछ बच्चों का एक वीडियो फैलाकर हमारे देश में कई लोगों को भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया गया। हाल ही में मेघालय में एक मामूली विवाद सोशल मीडिया पर फैली अफवाह के चलते बड़े विवाद में बदल गया। एक सप्ताह तक राजधानी शिलांग अशांत रहा। सरकार ने 12 दिनों तक इंटरनेट सेवाओं पर भी पाबंदी लगा दी थी।

मध्य प्रदेश के बालाघाट, सिवनी और छिंदवाड़ा जिलों में एक व्हाट्सऐप वीडियो सर्कुलेट हुआ जिसमें दिखाया गया कि दो लोग किसी जिंदा आदमी के शरीर से अंग निकाल रहे हैं। इस अफवाह के बाद 50-60 गांवों के लोगों ने दोनों व्यक्तियों को घेर लिया और पीट-पीटकर घायल कर दिया। बेंगलुरु में अफवाह फैला दी गई कि शहर में 400 बच्चा चोर घूम रहे हैं। इसका खामियाजा एक 26 वर्षीय प्रवासी मजदूर को भुगतना पड़ा क्योंकि भीड़ ने उसे ही अपहरणकर्ता समझ लिया और जमकर पीटा।

गृहमंत्रालय ने राज्यों को आगाह किया है कि ऐसी घटनाओं को पकड़ने के लिए सक्रियता बढ़ाएं और उन्हें रोकने के लिए उचित कदम उठाएं। फेसबुक ने भी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये अफवाहों और फर्जी न्यूज को फैलने से रोकने के लिए कमर कस ली है। इन दिनों फेसबुक ने अपने न्यूज फीड को अपने वेब प्लेटफॉर्म के साथ ही एप से भी हटा लिया है। इसके बाद से फेसबुक यूजर्स व्हाट्सएप और फेसबुक मैसेंजर के जरिये अन्य यूजर्स को डायरेक्ट कन्टेंट शेयर सकते हैं। फेसबुक नए फीचर्स की टेस्टिंग कर रहा है। व्हाट्सऐप ने कई अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन देकर लोगों को साथ आने का आह्वान किया। साथ ही फेक न्यूज पहचानने के टिप्स जारी किए।

इसी तरह गूगल की वीडियो शेयरिंग साइट यू-ट्यूब फेक न्यूज पर लगाम लगाने और मीडिया संस्थाओं की मदद के लिए कई कदम उठाने जा रही है। कंपनी इसके लिए 2.5 करोड़ डॉलर का निवेश भी करेगी। यूट्यूब का कहना है कि वह समाचार स्रोतों को और विश्वसनीय बनाना चाहती है। खासतौर से ब्रेकिंग न्यूज के मामले में एहतियात बरतेगी, जहां गलत सूचनाएं आसानी से फैला दी जा रही हैं। यूट्यूब की कोशिश है कि वीडियो सर्च करते वक्त वीडियो और उससे जुड़ी खबर का एक छोटा सा ब्योरा यूजर्स को दिखे। कंपनी यू-ट्यूब कर्मचारियों की ट्रेनिंग और वीडियो प्रोडक्शन सुविधाओं में सुधार के लिए भी प्रयासरत है। कंपनी विकिपीडिया और एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका जैसे सामान्य विश्वसनीय सूत्रों के साथ विवादित वीडियो से निपटने के तरीकों का भी परीक्षण कर रही है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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