ग्लोबल कम्युनिटी के साथ अब भारत में स्टार्टअप ईको-सिस्टम को बेहतर कर रहा को-वर्किंग स्पेस

भारत के विस्तृत वर्कफ़ोर्स के लिए ये शख़्स तैयार कर रहा है एक सटीक बिज़नेस मॉडल...

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करन, केन्ट यूनिवर्सिटी के अलुमनाई हैं और एक सीरियल ऑन्त्रप्रन्योर हैं। हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में वह सैंशेज़ और सिंगकॉन्ग नाम से दो फ़ूड वेंचर्स लॉन्च कर चुके हैं और साथ ही, एंट्री नाम से एक फ़ूड डिलिवरी ऐप भी शुरू कर चुके हैं। 'वी वर्क इंडिया' के माध्यम से उनका उद्देश्य है कि भारत के विस्तृत वर्कफ़ोर्स के लिए एक सटीक बिज़नेस मॉडल तैयार किया जाए।

'वी वर्क इंडिया' के जनरल मैनेजर, करण विरवानी
'वी वर्क इंडिया' के जनरल मैनेजर, करण विरवानी
आजकल यूरोप का एक बेहद प्रचलित कॉन्सेप्ट, भारत में भी तेज़ी से आ रहा है। इस कॉन्सेप्ट के तहत लोग फ़ुल टाइम जॉब्स की जगह ऐसे कामों से जुड़ना पसंद कर रहे हैं, जिनके माध्यम से उनकी ज़रूरतें पूरी हो जाएं। इसके अंतर्गत ही, वीकेंड वर्किंग जैसे मॉडल्स लोकप्रिय हो रहे हैं।

वी वर्क, एक ग्लोबल को-वर्किंस स्पेल प्रोवाइडर है, जिसने 2017 में भारत में अपने ऑपरेशन्स शुरू किए। करण विरवानी, 'वी वर्क इंडिया' में जनरल मैनेजर हैं। करन, केन्ट यूनिवर्सिटी के अलुमनाई हैं और एक सीरियल ऑन्त्रप्रन्योर हैं। हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में वह सैंशेज़ और सिंगकॉन्ग नाम से दो फ़ूड वेंचर्स लॉन्च कर चुके हैं और साथ ही, एंट्री नाम से एक फ़ूड डिलिवरी ऐप भी शुरू कर चुके हैं। 'वी वर्क इंडिया' के माध्यम से उनका उद्देश्य है कि भारत के विस्तृत वर्कफ़ोर्स के लिए एक सटीक बिज़नेस मॉडल तैयार किया जाए।

करन मानते हैं कि भारतीय परिदृश्य में 'डू वॉट यू लव' के कॉन्सेप्ट को शुरू करने की ज़रूरत है। करन ने योर स्टोरी को दिए इंटरव्यू में स्टार्टअप और कॉर्पोरेट सेक्टर में कम्युनिटी मॉडल्स, डिज़ाइन पार्टनरशिप्स, टेक्नॉलिजी इंटीग्रेशन और ऑन्त्रप्रन्योर्स के लिए नेटवर्क इनोवेशन आदि महत्वपूर्ण विषयों पर बात की। करन ने 'वी वर्क इंडिया' के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह एक को-वर्किंग स्पेस और यह किस तरह से काम करता है।

योर स्टोरीः को-वर्किंग स्पेस के तौर पर भारत में 'वी वर्क' की शुरूआत करने के पीछे आपका क्या उद्देश्य और नज़रिया था?
करण: 'वी वर्क' का मिशन है कि एक ऐसा ईको-सिस्टम तैयार किया जा सके, जहां पर लोग सिर्फ़ आजीविका के लिए नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी को सही मतलब देने के लिए काम करें। हम अपने सदस्यों को हाई-क्वॉलिटी और वर्ल्ड क्लास स्पेस मुहैया कराते हैं। पूरा तकनीकी सहयोग देते हैं, ताकि बेहतर से बेहतर काम हो सके। इसके साथ-साथ, हम एक जैसी सोच और पैशन रखने वाले लोगों को साथ मिलकर काम करने का मौका देते हैं।

योर स्टोरीः अपने ग्लोबल प्लान्स में आप भारत की स्थिति को किस तरह से देखते हैं?
करण: आईएमएफ़ के डेटा के अनुमान के मुताबिक़, 2019 तक भारत की आर्थिक विकास दर 7.4 प्रतिशत के आंकड़े तक पहुंच जाएगी और भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन जाएगा। 2017 में जब हम भारत आए, भारत पिछले साल सातों की अपेक्षा सर्वाधिक विकास दर पर था। हमने नई जेनरेशन को इनोवेशन और तकनीक आदि से जुड़ी सभी ज़रूरी सुविधाएं मुहैया कराईं। केंद्र सरकार के मेक इन इंडिया प्रोग्राम की मदद से भी कई बिज़नेस और ऑन्त्रप्रन्योर्स आगे बढ़े हैं।

हम अपने ग्लोबल मॉडल में भारत को एक तेज़ी से बढ़ते बाज़ार के रूप में देखते हैं और हम अपने को-वर्किंग स्पेस को पूरी तरह से डेमोक्रैटिक बनाना चाहते हैं। हमारी उपस्थिति, देश के तीन बड़े शहरों (बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली-एनसीआर) में है और हम मुख्य रूप से 6 तरह की सुविधाएं दे रहे हैं। फ़िलहाल 10 हज़ार सदस्य हमसे जुड़े हुए हैं। कंपनी अगले महीने तक मुंबई में वी वर्क विखरोली और बेंगलुरु में वी वर्क हेबल, नाम से दो नई सुविधाएं शुरू करने जा रही है। कंपनी की योजना है कि अगले साल तक पुणे, चेन्नई और हैदराबाद में भी नए मार्केट शुरू किए जाएं।

योर स्टोरी: स्टार्टअप्स के लिए आपका वैल्यू प्रपोज़ीशन क्या है?
करण:
हमारी कम्युनिटी में अलग-अलग तरह के स्टार्टअप्स शामिल हैं। वर्ल्ड-क्लास स्पेस और बड़े स्तर की बिज़नेस सर्विसों के साथ-साथ, हमारा सबसे बड़ा वैल्यू प्रपोज़ीशन है कि हम एक कम्युनिटी के तौर पर काम कर रहे हैं। दुनियाभर में हमारी कम्युनिटी से 210,000 सदस्य जुड़े हुए हैं और इनमें कई बड़े वेंचर कैपिटलिस्ट्स और बड़े एंटरप्राइज़ भी शामिल हैं। इनकी मदद से स्टार्टअप्स को आसानी से निवेश मिल जाता है और साथ ही, बिज़नेस को बढ़ाने के लिए सही रणनीति तैयार करने में भी मदद मिलती है।

योर स्टोरी: कॉर्पोरेट इकाईयों के लिए आपके पास क्या ख़ास है?
करण:
वी वर्क कम्युनिटी में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली कैटेगरी है, बड़े एंटरप्राइज़ेज की। इस कैटेगरी में हमारी कम्युनिटी से करीब 45 सदस्य जुड़े हुए हैं। हम उन्हें एक अच्छा वर्किंग स्पेस देकर, उनकी रियल स्टेट संबंधी ज़रूरतों को अच्छी तरह से पूरा करते हैं। इसमें भी एक ख़ास बात यह है कि वी वर्क, स्टार्टअप्स को बाक़ी रियल एस्टेट सॉल्यूशन्स की अपेक्षा एक अधिक किफ़ायती विकल्प मुहैया कराता है।

योर स्टोरी: आपके को-वर्किस स्पेस के मैनेजर्स का प्रोफ़ाइल क्या है?
करण:
हमारे बोर्ड में ऑन्त्रप्रन्योर्स से लेकर आर्किटेक्ट्स और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री के प्रोफ़ेशनल्स से लेकर क्रिएटिव सेक्टर के लोगों तक, सभी शामिल हैं।

योर स्टोरी: भारतीय ऑन्त्रप्रन्योर्स के लिए आपके पास क्या मौके और संभावनाएं हैं?
करण:
अपने ब्रैंड शुरू करने और उन्हें वैश्विक स्तर तक बड़ा करने की अपार संभावनाएं हैं। युवाओं के अंदर सामर्थ्य है कि वे अपने स्टार्टअप्स को एक कल्चर या मिशन की तरह आगे बढ़ाएं। भारतीय युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है और वे स्टार्टअप इंडस्ट्री से जुड़ना भी चाह रहे हैं और साथ ही, उनके लिए देश में निवेश की भी पर्याप्त संभावनाएं हैं।

योर स्टोरी: भारतीय स्टार्टअप्स के सामने मुख्य रूप से कौन सी चुनौतियां आती रहती हैं और आप उनके लिए क्या कदम उठा रहे हैं?
करण: भारतीय स्टार्टअप्स के सामने बेसिक इन्फ़्रास्ट्रक्चर की कमी, अच्छी ग्रोथ के लिए पर्याप्त संसाधनों की कमी और मेंटरशिप का अभाव और साथ ही अन्य भी कई चुनौतियां आती रहती हैं। हमारी को-वर्कि स्पेस सभी को साथ मिलकर बढ़ने का प्रोत्साहन देती है। हमारे कम्युनिटी मैनेजर्स, कंपनी की ज़रूरतों को समझते हैं और उसके लिए उपयुक्त उपाय खोजे जाते हैं।

हमने अपने मेंबर्स को साथ लाने के लिए एक ऐप भी तैयार किया है, जिसकी मदद से वे आपस में बेहतर ढंग से तालमेल बिठा पाते हैं। इस ऐप पर स्टार्टअप्स के लिए तरह-तरह के पिचिंग इवेंट्स आदि का जानकारी होती है और वे इसका लाभ उठा सकते हैं।

योर स्टोरीः आपके को-वर्किंग स्पेस में स्टार्टअप्स को किस तरह की सर्विस और ट्रेनिंग मिलती हैं?
करण: वी वर्क अपने सदस्यों को प्रेरित करता है कि वे उसी काम को आगे बढ़ाने, जिसमें उनका भरोसा है और जो उनके पैशन से जुड़ा है। हम अपने सदस्यों को हेल्थ इंश्योरेन्स, इंटर्न सोशल नेटवर्क, वीकली इवेंट्स और वर्कशॉप्स और अन्य बिज़नेस संबंधी सुविधाएं मुहैया कराते हैं।

योर स्टोरी: क्या आप स्टार्टअप्स में निवेश (इनवेस्ट) भी करते हैं?
करण:
हम उन स्टार्टअप्स पर इनवेस्ट करते हैं, जो हमारे ब्रैंड के ओवरऑल बिज़नेस को फ़ायदा पहुंचा सकते हों। हमने अपने बोर्ड में फ़्लैटिरॉन स्कूल और मीटअप जैसी कंपनियों को भी शामिल कर लिया है, ताकि स्टार्टअप्स को संसाधनों और विकल्पों की कमी न हो।

योर स्टोरी: भारत में मौजूद अन्य को-वर्किंग स्पेसेज़, से आप 'वी वर्क' को किस तरह अलग समझते हैं?
करण: हमने अपने आपको सिर्फ़ एक को-वर्किंग स्पेस या को-वर्किंग अकाउंट्स तक ही सीमित नहीं रखा है। हम भारत के वर्क फ़्यूचर के लिए काम कर रहे हैं और ट्रेडिशनल रियल एस्टेट सॉल्यूशन्स की जगह बेहतर विकल्प दे रहे हैं। हमने नई सोच रखने वाले ऑन्त्रप्रन्योर्स और छोटे-बड़े एंटरप्राइजे़ज़ की एक कम्युनिटी तैयार की है। हम तकनीक और स्पेस के माध्यम से लोगों को करीब ला रहे हैं।

योर स्टोरी: आप अपने को-वर्किंग स्पेस को सफल कब मानेंगे?
करण:
2017 में भारत में लॉन्च के बाद से ही, हमें एशिया-पसिफ़िक क्षेत्र से मिड साइज़ और बड़ी कंपनियों का साथ मिला है। हमारे सभी सदस्य, हमारी सुविधाओं से पूरी तरह संतुष्ट हैं और इस क्षेत्र में एक नए और प्रभावी ईको-सिस्टम की नींव रख रहे हैं। थोड़े और विकास के बाद हम मल्टीनैशनल कंपनियों को भारत में विस्तार करने की सुविधाएं भी मुहैया कराएं, जिसकी मदद से स्थानीय परिदृश्य को बड़े बदलाव का मौका मिल सकेगा। दुनियाभर में हमारी कम्युनिटी 200 से भी ज़्यादा लोकेशन्स पर मौजूद है और इसलिए भारतीय स्टार्टअप्स के पास विदेश में अपने विस्तार का सुनहरा मौका भी रहता है।

योर स्टोरी: भारत के को-वर्किंग स्पेसेज़ की यूएस और चीन जैसे देशों में स्थित स्पेसेज़ से तुलना करते हुए बताइए कि दोनों में क्या बड़े फ़र्क हैं?
करण:
पश्चिम में को-वर्किंग का कॉन्सेप्ट अपने आधुनिक चरण पर है। भारतीय समुदाय में यह धीरे-धीरे प्रचलित हो रहा है। भारत के इकनॉमिक ईको-सिस्टम में एक ओपन, कम्युनिकेटिव और बैरियर-लेस ऑफ़िस कल्चर की संभावनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।

योर स्टोरी: आने वाले 3-5 सालों के लिए नए स्टार्टअप्स के संदर्भ में आपने क्या योजनाएं तैयार की हैं?
करण:
हमारी टीम में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ बतौर मेंबर शामिल हैं। इनकी मदद से स्टार्टअप्स को रियर-टाइम फ़ीडबैक मिलता है। हम अपने स्टार्टअप्स को 2 लाख से भी अधिक सदस्यों वाली मेंबर कम्युनिटी से फ़िजिकल और डिजिटल कनेक्ट बनाने का मौका देते हैं। हमारी सबसे बड़ी ताकत है, हमारी कम्युनिटी, जो मेंबर्स को बेहतर से बेहतर विकल्प मुहैया कराने की कोशिश में जुटी रहती है।

योर स्टोरी: को-वर्किंग स्पेसेज़, इंडस्ट्री और यूनिवर्सिटीज़ के बीच एक बेहतर सहयोग कैसे स्थापित किया जा सकता है?
करण:
हमने नैसकॉम (NASSCOM)और फ़ेसबुक के साथ, वी वर्क के कोरामंगला सेंटर पर डिज़ाइन फ़ॉर इंडिया स्टूडियो स्थापित करने के लिए पार्टनरशिप की है। इसका उद्देश्य है कि स्टार्टअप्स को ठीक ढंग से मेंटर किया जा सके। हम इंडस्ट्री, यूनिवर्सिटी और सरकार के साथ पार्टनरशिप्स के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। वैश्विक स्तर पर हमने कोलंबिया बिज़नेस स्कूल के साथ करार किया हुआ है। हाल ही में, वी वर्क ने मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के कैंपस में भी पहला को-वर्किंग स्पेस शुरू किया है।

योर स्टोरी: भारत में स्टार्टअप्स, को-वर्किंग स्पेसज़ और निवेशकों के लिए बिज़नेस को आसान बनाने के लिए आप भारत सरकार से क्या अपील करना चाहेंगे?
करण: भारत का आर्थिक परिदृश्य लगातार तेज़ी से बढ़ रहा है। सरकार ने पहले ही से मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे कैंपेन शुरू कर रखे हैं।

योर स्टोरी: भविष्य में आप वर्क-कल्चर में किस तरह के बड़े बदलाव देखते हैं?
करण: यह सवाल सुनते ही मेरे ज़हन में चार्ल्स केटरिंग की कही हुई एक बात आती है, "दुनिया बदलाव को पसंद नहीं करती, जबकि सिर्फ़ इसी वजह से दुनिया की तरक्की हुई है।" मैं भी चाहता हूं कि पूरी दुनिया आपस में कल्चर और आइडियाज़ साझा करे।

वर्कस्पेस में बदलाव: भारत में लगातार सिर्फ़ पूरी तरह से फ़ंक्शनल वर्कस्पेसेज़ के बजाय ज़्यादा प्रोडक्टिव और एक्सपीरिएंशल वर्कस्पेस का ट्रेंड बढ़ रहा है।

पर्सनल टच: आजकल लोग सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक की साधारण ढर्रे वाली नौकरी नहीं पसंद करते, बल्कि वह एक ऐसा वर्कस्पेस चाहते हैं, जहां पर उनकी क्रिएटिविटी बढ़ सके और काम के माहौल में लचीलापन हो।

लिक्विड वर्कफ़ोर्स: आजकल यूरोप एक बेहद प्रचलित कॉन्सेप्ट, भारत में भी तेज़ी से आ रहा है। इस कॉन्सेप्ट के तहत लोग फ़ुल टाइम जॉब्स की जगह ऐसे कामों से जुड़ना पसंद कर रहे हैं, जिनके माध्यम से उनकी ज़रूरतें पूरी हो जाएं। इसके अंतर्गत ही, वीकेंड वर्किंग जैसे मॉडल्स लोकप्रिय हो रहे हैं।

योर स्टोरी: हमारी ऑडियंस में शामिल स्टार्टअप्स और ऑन्त्रप्रन्योर्स को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
करण: हमारे संस्थापक, ऐडम न्यूमन मानते हैं कि सभी कंपनियों को सफल होने के लिए पूरे पैशन और उद्देश्य के साथ काम करना होगा और साथ ही, मुनाफ़े की जगह लोगों और उत्पाद की गुणवत्ता को प्राथमिकता देनी होगी। ऐसा करने से मुनाफ़ा ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगा।

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