कहानी 'नेलकटर'

"नेलकटर" समासामयिक परिस्थितियों, संवेदनाओं तथा सामाजिक दायित्वबोध से पैदा हुई एक अनोखी कहानी है, जिसमें लेखक के मन के भाव और अनुभव एक साथ उजागर होते हैं। आप भी पढ़ें प्रसिद्ध कहानीकार 'उदय प्रकाश' की कहानी 'नेलकटर'...

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"क्योंकि चीजें कभी खोती नहीं हैं, वे तो रहती ही हैं। अपने पूरे अस्तित्व और वजन के साथ। सिर्फ हम उनकी वह जगह भूल जाते हैं।"

'उयद प्रकाश' की कहानी "नेलकटर"

सावन में घास और वनस्पतियों के हरे रंग में हल्का अँधेरा-सा घुला होता है। हवा भारी होती है और तरल। वर्षा के रवे पर्तों में तैरते हैं।

मैं नौ साल का था। 

इसी महीने राखी बँधती है। कजलैयाँ होती है। नागपंचमी में गोबर की सात बहनें बनाई जाती हैं। धान की लाई और दूध दोने में भर कर हम साँपों की बाँबियाँ खोजते फिरते हैं। हरियरी अमावस भी इसी महीने होती है। मैं बाँस की खूब ऊँची जेंड़ी बना कर उस पर चढ़ कर दौड़ता था। मेरी ऊँचाई कम से कम बारह फुट की हो जाती होगी।

माँ दक्षिण की ओर के कमरे में रहती थीं। बंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल से उन्हें ले आया गया था। सिर्फ अनार का रस पीती थीं। वे बोलने के लिए अपने गले में डॉक्टरों द्वारा बनाई गई छेद में उँगली रख लेती थीं। वहाँ एक ट्यूब लगी थी। उसी ट्यूब से वे साँस लेती थीं। बहुत बारीक, ठंडी और कमजोर आवाज होती थी वह। कुछ-कुछ यंत्रों जैसी आवाज। जैसे बहुत धीमे वाल्यूम में कोई रेडियो तब बोलता है जब बाहर खूब जोरों की बारिश हो रही हो और बिजलियाँ पैदा हो रही हों, या तब जब सुई किन्हीं बहुत दूर के दो स्टेशनों के बीच कहीं अटक गई हो।

माँ को बोलने में दर्द बहुत होता होगा। इसलिए कम ही बोलती थीं। उस यंत्र जैसी आवाज में हम माँ की पुरानी अपनी आवाज खोजने की कोशिश करते। कभी-कभी उस असली और माँ जैसी आवाज का कोई एक अंश हमें सुनाई पड़ जाता। तब माँ हमें मिलती, जो हमारी छोटी-सी समृति में होती थी।

लेकिन माँ सुनना सब कुछ चाहती थीं। सब कुछ। हम बोलते, लड़ते, चिल्लाते या किसी को पुकारते तो व्याकुलता से वे सुनतीं। हमारे शब्द उन्हें राहत देते होंगे।

उनकी सिर्फ आँखें बची थीं, जिन्हें देख कर मुझे उम्मीद बँधती थी कि माँ कहीं जाएँगी नहीं - मेरे पूरे जीवन भर रही आएँगी। मैं हमेशा के लिए उनकी उपस्थिति चाहता था। चाहे वे चित्र की तरह या मूर्ति की तरह ही रही आएँ। और न बोलें।

लेकिन उनके जीवित होने का विश्वास भी रहा आए, जैसा कि चित्रों के साथ नहीं होता।

मैं कभी-कभी बहुत डर जाता था और रोता था। अपने जीवन में अचानक मुझे कोई एक बहुत खाली - बिल्कुल खाली जगह दिख जाती थी। यह बहुत डरावना होता था। उस दिन माँ ने मुझे बुलाया। बाहर मैदान में घास का रंग गहरा हरा था। बादल बहुत थे और हवा में भार था। वह भीगी हुई थी।

माँ ने अपनी हथेली मेरे सामने फैला दी। दाएँ हाथ की सबसे छोटी उँगली की बगलवाली ऊँगली का नाखून एक जगह से उखड़ गया था। उससे उन्हें बेचैनी होती रही होगी।

इस उँगली को सूर्य की उँगली कहते हैं।

मैं समझ गया और नेलकटर ला कर माँ की पलंग के नीचे फर्श पर बैठ गया। नेलकटर में लगी रेती से मुझे उनकी उँगली का नाखून घिस कर बराबर करना था। माँ यही चाहती थीं। वह नेलकटर पिताजी इलाहाबाद से लाए थे, कुंभ के मेले से लौटने पर, दो साल पहले। नेलकटर में नीले काँच का एक सितार बना था।

माँ की उँगलियाँ बहुत पतली हो गई थीं। उनमें रक्त नहीं था। पीली-सी त्वचा। पतंगी कागज जैसी। पीली भी नहीं, जर्द। और बेहद ठंडी। ऐसा ठंडापन दूसरी, बेजान चीजों में होता है। कुर्सियों, मेजों, किवाड़ों या साइकिल के हैंडिल जैसा ठंडापन।

और हाथ उनका इतना हल्का कैसे हो गया था? कहाँ चला गया सारा वजन? वह भार शायद जीवन होता है, जिसे पृथ्वी अपने चुंबक से अपनी ओर खींचा करती है। जो अब माँ के पास बहुत कम बचा था। उन्हें पृथ्वी खींचना छोड़ रही थी।

मैंने उसकी हथेली थाम रखी थी। और नाखून को रेती से धीरे-धीरे घिस रहा था। मैं उनके नाखून को बहुत सुंदर, ताजा और चिकना बना डालना चाहता था।

मैं एक बार हँसा। फिर मुस्कराता ही रहा। माँ को ढाँढ़स बँधाने और उन्हें खुश करने का यह मेरा तरीका था। मैंने देखा, माँ को नाखून का हल्का-हल्का रेती से घिसा जाना बहुत अच्छा लग रहा है। उसके चेहरे पर एक सुख था, जो एक जगह नहीं बल्कि पूरे शरीर की शांति में फैला हुआ था, उन्होंने आँखें मूँद रखी थीं।

एक घंटा लगा। मैंने उनकी एक उँगली ही नहीं, सारी उँगलियों के नाखून खूब अच्छे कर दिए। माँ ने अपनी उँगलियाँ देखीं। यह कितना कमजोर और हार का क्षण होता है, जब नाखून जीवन का विश्वास देते हैं। कितने सुदंर और चिकने नाखून हो गए थे।

माँ ने मेरे बालों को छुआ। वे कुछ बोलना चाहती थीं। लेकिन मैंने रोक दिया। वे बोलतीं तो पूछतीं कि मैं सिर से क्यों नहीं नहाता? बालों में साबुन क्यों नहीं लगाता? इतनी धूल क्यों है? और कंघी क्यों नहीं कर रखी है?

रात में ठंड थी। बाहर पानी जोरों से गिर रहा था। सावन में रात की बारिश की अपनी एक गंभीर आवाज होती है। कुछ-कुछ उस तरह जैसे दुनिया की सारी हवाएँ किसी बड़े से घड़े के अंदर घूमने लग गई हों। हर तरफ से बंद।

सुबह पाँच बजे आँगन में पाँच औरतें रो रही थीं। यह रोना नहीं था, विलाप था, पता चला माँ रात में नींद में ही खत्म हो गईं।

माँ खत्म हो गईं।

मैंने फिर कभी उनके घिसे हुए नाखून नहीं देखे। मैंने उस रात सोने से पहले अपने तकिए के नीचे वह नेलकटर रख दिया था। उसे मैंने बहुत खोजा। बल्कि आज तक। कई वर्षों बाद भी। लेकिन वह आज भी नहीं मिला। वह पता नहीं कहाँ खो गया था।

हो सकता है वह किसी बहुत ही आसान-सी जगह पर रखा हुआ हो और सिर्फ मेरे भूल जाने के कारण वह मिल नहीं पा रहा हो। मैं अक्सर उसे खोजने लगता हूँ।

क्योंकि चीजें कभी खोती नहीं हैं, वे तो रहती ही हैं। अपने पूरे अस्तित्व और वजन के साथ। सिर्फ हम उनकी वह जगह भूल जाते हैं।