एजुकेशन सिस्टम में और भी कई पेंच, बेड़ा गर्क

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की डांवाडोल स्थितियों पर बारीकी से नज़र डालती रिपोर्ट...

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एक ओर एजुकेशन सेक्टर में लगातार फर्जीवाड़े और घोटाले, दूसरी तरफ पाठ्यक्रमों में फेर-बदल, कहीं वैदिक शिक्षा की वकालत तो कहीं सेक्स एजुकेशन की अनिवार्यता पर जोर। मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम देश के छात्रों में एक साथ कई तरह के अंदेशे पैदा कर रहा है। तरह-तरह के जालसाज शिक्षा व्यवस्था पर पंजे मार रहे हैं। इस बीच निजी क्षेत्र में स्वतंत्र संस्थाएं नित नए-नए प्रयोगों का ऐलान कर स्थितियां और भी डांवाडोल करती जा रही हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
इसी बीच दिल्ली सरकार ने फर्जी एजुकेशन बोर्ड को लेकर आगाह किया है। एजुकेशन डिपार्टमेंट ने अपने एक आदेश में कहा है कि दिल्ली में प्रदेश सरकार का कोई राज्य बोर्ड नहीं है। दिल्ली में शिक्षा निदेशालय के दायरे में सरकारी, निजी, सहायता प्राप्त और गैर सहायताप्राप्त स्कूल आते हैं। 

मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम देश के छात्रों में एक साथ कई तरह के अंदेशे पैदा कर रहा है। एजुकेशन सेक्टर में फर्जीवाड़े और घोटाले तो लगातार हो ही रहे हैं, सामान्यतः भी शिक्षा की स्थितियां कुछ ठीक नहीं दिख रही हैं। उज्जैन में अंतरराष्ट्रीय गुरुकुल सम्मेलन के दौरान केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने नई एजुकेशन पॉलिसी बनाने का जो संकेत दिया है, उससे तो असमंजस और बढ़ जाता है। जावडेकर कह रहे हैं कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था क्राइम रेट कम करने में फेल हुई है। देशभक्ति की भावना जगाने के लिए वैदिक शिक्षा बेहतर है। तीन महीने के भीतर उनका मंत्रालय एजुकेशन सिस्टम में बदलाव के लिए मौजूदा पाठ्यक्रम से बोझिल विषयों को हटाकर बच्चों के वैल्यू एजुकेशन विचार कर रहा है। एक महीने में ड्राफ्ट तैयार हो जाएगा।

सरकार 11वीं और 12वीं कक्षा के लिए प्राचीन भारत के एस्ट्रोनॉमी, विज्ञान और एरोनॉटिक्स आदि में योगदान पर केंद्रित एक नया विषय शुरू करने वाली है। ये तो रही जावडेकर की बात। इसी बीच दिल्ली सरकार ने फर्जी एजुकेशन बोर्ड को लेकर आगाह किया है। एजुकेशन डिपार्टमेंट ने अपने एक आदेश में कहा है कि दिल्ली में प्रदेश सरकार का कोई राज्य बोर्ड नहीं है। दिल्ली में शिक्षा निदेशालय के दायरे में सरकारी, निजी, सहायता प्राप्त और गैर सहायताप्राप्त स्कूल आते हैं। निदेशालय किसी बोर्ड को मान्यता नहीं देता है। जहां तक दिल्ली का सवाल है, यहां तीन बोर्ड हैं। इनमें केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई), काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (आईसीएसई) और नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनआईओएस) शामिल हैं।

देश के अलग- अलग हिस्सों से सर्टिफिकेट वेरिफिकेशन की जो रिक्वेस्ट आती है, उसके आधार पर बताया जाता है कि ये सर्टिफिकेट ठीक है या नहीं। पिछले कुछ दिनों में ऐसे कई बोर्ड के सर्टिफिकेट की वेरिफिकेशन की गई है, जो दिल्ली में नहीं है और वे फर्जी बोर्ड के पाए गए हैं। अभी तक उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश से एजुकेशन सेक्टर में घपले-घोटालों की खबरें आती रही हैं, अब हैदराबाद उच्च न्यायालय में कंट्रोल ऑफ ऑडिट जनरल (कैग) की रिपोर्ट के आधार पर आंध्रप्रदेश एजुकेशन सोसाइटी घोटालों की सीबीआई से जांच कराने की याचिका दाखिल हो गई है।

कोर्ट को बताया गया है कि कैग ने आंध्रप्रदेश एजुकेशन सोसाइटी में 2.11 करोड़ रुपये का घोटाला होने का पता लगाया है। सोसाइटी ने फॉर्मेसी और इंजीनियरिंग महाविद्यालयों का बिना निर्माण कराए ही निर्माण हो जाने की गलत रिपोर्ट पेश की है। लाइब्रेरी छात्रों के जमा 30 लाख रुपये नहीं लौटा रही है। बिना पाठ्यक्रम के ही प्राध्यापकों की भर्ती दिखाकर लाखों रुपये का गबन किया गया है। याचिका का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने एपी एजुकेशन सोसाइटी के करस्पोंडेंट, सचिव, तेलंगाना उच्च शिक्षा अधिकारी, उच्च शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव और प्रिंसिपल एकाउंट जनरल को नोटिस जारी कर दिया है।

इस तरह की सूचनाएं हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था का कैसा चेहरा पेश करती हैं। कमोबेश रोजाना ही ऐसी सूचनाएं सुर्खियां बन रही हैं। इस बीच निजी क्षेत्र में स्वतंत्र संस्थाएं नित नए-नए प्रयोगों का ऐलान कर रही हैं। एक संस्था है एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी सर्विसेज लिमिटेड (आईईटीएस), गूगल की साझेदारी से उसने 12वीं तक के बच्चों के लिए अपना एक प्लेटफॉर्म तैयार किया है। गूगल फॉर एजुकेशन के कंट्री हेड बानी पी धवन और आईईटीएस के एमडी और सीईओ आरसीएम रेड्डी का कहना है कि पिछले 20 साल से आईईटीएस इनोवेटिव एजुकेशन टेक्नीक डिजाइन करने पर काम कर रही है ताकि छात्रों को बेहतर एजुकेशन मुहैया कराया जा सके।

दरअसल, है क्या कि एजुकेशन सेक्टर अरबों-खरबों का बिजनेस हब बन चुका है। कोई नई तकनीक को आधार बनाकर, तो कोई वैदिक शिक्षा के बहाने राजनीतिक उद्देश्यों से भी इस सेक्टर पर अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने के रास्ते बना रहा है। यह कितना चिंताजनक है कि हमारे देश की राजधानी में ही बड़े-बड़े करतब दिखाने वाले घातमारी कर रहे हैं। अभी तीन-चार महीने पहले ही दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे फर्जी एजुकेशन बोर्ड का पर्दाफाश किया था, जो देश के कई राज्यों में स्कूलों को फर्जी मान्यता प्रमाण-पत्र, डिग्रियां और मार्कशीट दे रहा है। उसके फर्जी मान्यता प्रमाण पत्रों के माध्यम से यूपी, बिहार, झारखंड, पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात में बाकायदा स्कूल चल रहे हैं।

बड़ी संख्या में फर्जी मार्कशीट और डिग्रियां बांटी जा रही हैं। इसी तरह इसी साल फरवरी में उत्तर प्रदेश में एक फर्जी शिक्षा बोर्ड का पर्दाफाश हुआ। प्रदेश की स्पेशल टास्क फोर्स ने एक ऐसे गिरोह पता लगाया, जो उत्तर प्रदेश राज्य मुक्त विद्यालय परिषद नाम से फर्जी बोर्ड बनाकर लोगों से ठगी करता रहा है। अकेले उत्तर प्रदेश में ही 62 शैक्षणिक संस्थान इससे जुड़े हुए हैं। परिषद ने बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, दिल्ली सहित कई राज्यों में स्टडी सेंटर बनाकर बड़ी संख्या में फर्जी सर्टिफिकेट जारी किए हैं। हाल ही में दिल्ली सरकार देश की राजधानी में चल रहे 12 फर्जी बोर्डों के नाम घोषित कर ही चुकी है।

एक ओर तरह-तरह के जालसाज शिक्षा व्यवस्था पर पंजे मार रहे हैं, तो वैदिक शिक्षा की वकालत करते हुए सेक्स एजुकेशन को भी हरी झंडी दे दी जा रही है। अब स्कूलों के पाठ्यक्रम में सेक्स एजूकेशन 'रोल प्ले और एक्टिविटी बेस्ड' मॉड्यूल के रूप में लागू किया जाएगा। इसके लिए स्पेशलाइज्ड टीचर और एजुकेटर की मदद ली जाएगी। इस मॉड्यूल में विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखकर बच्चों को शिक्षित किया जाएगा। इसमें बच्चों को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के साथ शारीरिक शोषण, गुड टच बैड टच, पोषण, मेंटल हेल्थ के साथ साथ यौन संचारित रोगों ,गैर संचारी रोग, चोट और हिंसा के बारे में भी पढ़ाया जाएगा।

केंद्र सरकार को उम्मीद है कि इससे देश के 26 करोड़ किशोरों को लाभ मिलेगा। स्कूलों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि सप्ताह में कम से कम एक पीरियड सेक्स एजुकेशन का हो। पहले चरण में नौवीं से बारहवीं तक की कक्षाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा और बाद में इसमें छोटी क्लासेज के बच्चों को भी शामिल किया जाएगा। इसके लिए हर स्कूल के दो शिक्षकों का चयन कर उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा। इस बीच ऐसा भी नहीं कि कुछ अच्छा नहीं हो रहा है। कई सुर्खियां कमजोर परिवारों के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की राह आसान करने वाली भी सामने आ रही हैं लेकिन उनमें भी गजब का खेल।

मसलन, पैसों के अभाव में पेरेंट्स अपने बच्‍चों को मनचाहे कॉलेज या कोर्स में दाखिला नहीं करा पाते हैं। उनको एजुकेशन लोन या पर्सनल लोन लेने पड़ते हैं। उनके लिए सुविधाजनक रास्ता बताया तो जा रहा है लेकिन उसमें भी एक पेंच है। अभिभावक को सात साल में बीस लाख रुपए का फंड बनाने के लिए सिस्‍टमैटिक इन्‍वेस्‍टमेंट प्‍लान यानी एसआईपी में हर माह अठारह हजार रुपए निवेश करना होगा। दस साल तक इस तरह के निवेश पर तेरह प्रतिशत रिटर्न मिलेगा। समझाया जा रहा है कि सात साल बाद कुल फंड 25 लाख रुपए हो जाएगा। इस पैसे से बच्चे की उच्च शिक्षा की इच्छा पूरी हो जाएगी। अब कौन समझाए कि जिसके पास हर माह अठारह हजार रुपए निवेश करने का बूता होगा, वह तो वैसे ही अपने बच्चे को काम भर पढ़ा-लिखा लेगा। यानी यहां भी बिजनेस घुसा हुआ है। कोई रास्ता आसान नहीं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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