गांव वालों की प्यास बुझाने के लिए 70 साल के व्यक्ति ने अकेले खोदा 33 फीट कुआं

मिलें मध्य प्रदेश के दशरथ मांझी से...

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बुंदेलखंड इलाके में आने वाला छतरपुर जिला सूखा प्रभावित जिला माना जाता है। यहां के लोग पानी की कमी की वजह से ही पलायन कर जाते हैं। जिले के प्रतापपुर ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले हदुआ गांव के रहने वाले सीताराम ने 2015 में कुआं खोदने का काम शुरू किया था और 2017 में उन्होंने इस काम को पूरा भी कर लिया। 

सीताराम लोधी
सीताराम लोधी
सीताराम की कहानी बड़ी दिलचस्प है। उन्होंने शादी नहीं की और आजीवन अविवाहित रहने का फैसला किया। वह अपने छोटे भाई के साथ एक संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके भाई हलके लोधी की उम्र 60 साल है और उनके पास 20 एकड़ की खेती भी है। 

इंसान अगर चाह ले तो क्या नहीं कर सकता। बिहार के दशरथ मांझी का नाम तो आपने सुना ही होगा, जिन्होंने अपनी जिंदगी के 22 साल मेहनत में खपाकर पहाड़ को काट 55 किलोमीटर के रास्ते को सिर्फ 15 किलोमीटर का कर दिया था। दशरथ मांझी की कहानी कुछ ऐसी थी कि लंबे रास्ते की वजह से उनकी पत्नी की मौत हो गई थी और वे चाहते थे कि गांव के लोगों को इस पहाड़ की वजह से लंबा रास्ता न तय करना पड़े। उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती, लेकिन वैसी ही लगन और मेहनत का परिचय दिखाते हुए मध्य प्रदेश के 70 वर्षीय सीताराम ने 33 फीट कुआं खोद दिया, ताकि गांव वालों को पीने के पानी के लिए दूर न जाना पड़े।

बुंदेलखंड इलाके में आने वाला छतरपुर जिला सूखा प्रभावित जिला माना जाता है। यहां के लोग पानी की कमी की वजह से ही पलायन कर जाते हैं। जिले के प्रतापपुर ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले हदुआ गांव के रहने वाले सीताराम ने 2015 में कुआं खोदने का काम शुरू किया था और 2017 में उन्होंने इस काम को पूरा भी कर लिया। लेकिन किसी की मदद न मिल पाने के कारण उसे पक्का नहीं किया जा सका और मॉनसून में वह भरभरा गया। सरकार ने भी उनकी कोई मदद नहीं की।

सीताराम की कहानी बड़ी दिलचस्प है। उन्होंने शादी नहीं की और आजीवन अविवाहित रहने का फैसला किया। वह अपने छोटे भाई के साथ एक संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके भाई हलके लोधी की उम्र 60 साल है औप उनके पास 20 एकड़ की खेती भी है। सीताराम ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए कहा, 'सूखे के मौसम में पीने के लिए पानी का कोई साधन नहीं था। हमारे पास पैसे भी नहीं थे कि कुएं या नल का इंतजाम कर सकें। इसलिए मैंने अकेले ही कुआं खोदने का फैसला किया।' हालांकि परिवार वालों ने उन्हें इस काम से मना किया क्योंकि ये बहुत मुश्किल काम था, लेकिन सीताराम कुआं खोदने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थे।

सीताराम हर रोज सुबह यह काम शुरू करते और दोपहर की धूप में काम बंद कर आराम करते। इसके बाद धूप कम होते ही वे फिर से काम पर लगते और सूरज ढलने तक फावड़ा और कुदाल चलाते रहते। इस काम को उन्होंने लगातार 18 महीनों तक नियमित तौर पर किया। सीताराम के भाई हलके बताते हैं, 'हम कुआं खोदने के खिलाफ नहीं थे, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि कुआं खोदने पर पानी मिलेगा भी या नहीं। एक वक्त हम सबने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने।' सीताराम की मेहनत रंग लाई और उन्हें 33 फीट की गहराई पर पानी मिल ही गया। लेकिन यह खुशी कुछ ही दिनों में गुम हो गई।

बारिश के मौसम में पानी का स्तर बढ़ा और कुआं ढह गया। सीताराम कहते हैं कि अगर उन्हें सरकार की तरफ से मदद मिलती तो वे कुएं को पक्का करवा देते। मध्य प्रदेश सरकार किसानों को कुआं खोदने के लिए कपिल धारा योजना के तहत आर्थिक मदद देती है। जिला पंचायत सीईओ लवकुश नागर ने बताया कि उन्हें नहीं पता कि सीताराम ने कपिल धारा योजना के तहत मदद के लिए आवेदन किया है या नहीं। इस योजना के तहत सरकार की ओर से 1 लाख रुपये की मदद की जाती है।

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