ग्रामीण परिवेष से आये संतोष ने लिखा कामयाबी का नया मंत्र

किसानों की दिक्कतों को दूर करने के लिये बनाए नए यंत्रनित नई खोजों से हो चुके हैं खासे मशहूरबिना किसी आर्थिक सहायता के हुए सफलरतन टाटा भी कर चुके हैं सम्मानित

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अगर किसी के अंदर कुछ करने की सच्ची ललक है तो वह अपने रास्ते में आने वाली तमाम मुश्किलों को पार पाकर अपनी मंजिल को छूकर रहता है। कर्नाटक के बेलगाम के द्वितीय वर्ष के छात्र संतोष कावेरी ने बीते कुछ समय में कई पुरानी रूढि़यों को तोड़ा है और सफलता के बारे में लोगों की मानसिकता को बदला है।

जो लोग यह मानते हैं कि बिना आर्थिक सहायता के आप जीवन के कुछ बड़ा नहीं कर सकते या बिना पैसे के सफलता को नहीं पाया जा सकता उन लोगों के लिये संतोष एक बहुत बड़ा अपवाद हैं। बेलगाम के समिति काॅलेज आॅफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के छात्र संतोष ने दुनिया को दिखाया है कि किस तरह बिना किसी आर्थिक सहायता के सफलता की सीढि़यां चढ़ी जा सकती हैं।

जीवन में आने वाली रुकावटों को अपने लिये अवसर कैसे बनाया जा सकता है यह जानने के लिये संतोष की जिंदगी के फ्लैशबैक में जाना पड़ेगा। रास्ते में आने वाली रुकावटों को पार पाने का जज्बा संतोष ने अपनी पढ़ाई के प्रारंभिक दिनों में ही सीख लिया था। उन दिनों स्कूल जाने के लिये संतोष को रोजाना 10 किलोमीटर का सफल पैदल तय करना पड़ता था। लेकिन बचपन से ही धुन के पक्के संतोष ने दिक्कतों से हार नहीं मानी और परिवार की देखभाल के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी।

बचपन से युवावस्था तक संतोष ने जीवन में रोजाना कई तरह की परेशानियों को पार पाया और दृढ़निश्चय किया की मौका मिलने पर वे समाज के लिये कुछ ऐसा करेंगे जिससे दूसरों की परेशानियों को कुछ कम किया जा सके। रास्ते में आने वाली अड़चनों को पार पाते समय ही संतोष ने जीवन में कुछ बड़ा करने की ठानी और उन्हें साथ मिला देशपांडे फाउंडेशन के लीडर्स एक्सीलरेटिंग डेवलपमेंट (LEAD) कार्यक्रम का।

संतोष का सारा जीवन ग्रामीण परिवेश में बीता था जिसमें खेती करना लोगों का मुख्य व्यवसाय था। इसी वजह से उन्हें इस काम में किसानों के सामने आने वाली दिक्कतों और परेशानियों के बारे में वास्तविकता और जड़ से जानकारी थी। इसी दौरान उन्होंने अपने इलाके के किसानों की एक बहुत बड़ी परेशानी का ध्यान आया जो उनके खेतों में उगने वाली गाजर की सफाई से संबंधित था।

लेकिन गाजर की सफाई ही क्यों? किसानों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह आती थी उन लोगों को स्थानीय बाजार में बेचने से पहले गाजर को अच्छे से धोना पड़ता था। चूंकि गाजर जमीन के नीचे उगती है इसलिये पहले-पहल वह देखने में बहुत गंदी लगती है और उसे बेचने के लिये पहले साफ करना जरूरी होता है। संतोष को पता था कि गाजर की सफाई करना बहुत मेहनत का काम है और किसानों की बहुत समय इस काम में ही बीत जाता है। 100 किलो गाजर की सफाई में लगभग एक दर्जन लोगों को काफी समय बेकार होता था जिसे देखकर संतोष को काफी दुख होता था।

किसानों की इस समस्या को लेकर उहापोह में लगे संतोष के दिमाग में आखिरकार एक दिन वाॅशिंग मशीन को देखकर एक विचार आया और वे गाजर की आसानी से सफाई करने वाली एक मशीन के निर्माण में दिलोजान से जुट गए। करीब एक दर्जन बार असफलता की धूल चखने के बाद संतोष ने गाजर की सफाई करने वाली एक मशीन बनाने में सफलता हासिल की।

कई दिनों की मेहनत के बाद बनाई गई इस गाजर की सफाई वाली मशीन को तैयार करने के बाद संतोष उसे लेकर अपने गांव के किसानों के पास गए तो उन लोगों ने संतोष को अपनी सर आँखों पर बिठा लिया। पहले 100 किलो गाजर की सफाई में एक दर्जन लोगों को कई घंटों मेहनत करनी पड़ती थी वहीं अब इस मशीन के द्वारा इस काम को केवल दो व्यक्ति मात्र 15 मिनट में ही अंजाम दे देते हैं। आज संतोष द्वारा इजाद की गई इस मशीन की सहायता से आस-पास के कई गांवों के किसान गाजर की सफाई करके अपना समय और परिश्रम बचा रहे हैं।

संतोष की इस खोज की व्यापारिक अहमियत और अनोखेपन को मद्देनजर देशपांडे फाउंडेशन के 2013 के युवा सम्मेलन में खुद रतन टाटा ने उन्हें पुरस्कृत किया और संतोष का हौसला बढ़ाया।

कुछ नया कर दिखाने और दूसरों की सहायता करने का जज्बा संतोष को आराम से नहीं बैठने देता और वे लगातार कुछ न कुछ नया करने में लगे रहते हैं। संतोष ने हाल-फिलहाल में एक ऐसा यंत्र बनाया है जिसमें गैस पर खाने के लिये पानी गर्म करने के साथ-साथ ही नहाने के लिये भी गर्म पानी इक्ट्ठा हो जाता है। इस संयत्र को उन्होंने ईको वाॅटर काॅयल का नाम दिया है। संतोश कहते हैं कि हमारे देश में गैस बहुत महंगी है और कोई भी उसके संरक्षण के प्रयास में नहीं लगा।

उनके द्वारा बनाये गए इस संयत्र से एक तरफ जहां गैस की बचत होती है वहीं दूसरी तरफ दो कामों के लिये पानी गर्म होने से समय की भी बचत होती है।

एक तरफ तो हमारे देश के शहरी इलाके दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे देश का एक बड़ा तबका जो अब भी ग्रामीण इलाकों में रह रहा है तरक्की की बाट जोह रहा है। संतोष इस बात के एक जीवंत उदाहरण हैं कि अगर किसी के अदर कुछ करने की सच्ची लगन तो वह बिना आर्थिक सहायता के भी बहुत कर सकता है और समाज की भलाई के लिये अपना योगदान दे सकता है।

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