हथकरघे की दुनिया को एक नया आयाम देता 'परम'

अपने फेसबुक पेज ‘परम’ के द्वारा कपड़े और साहित्य के अनूठे संगम को ला रही हैं दुनिया के सामनेदेश की जानी-मानी कानूनी फर्म में वकील की नौकरी के बाद बचे समय में पूरा करती हैं कला का शौकतीन साल की छोटी सी उम्र में सीखनी शुरू कर दी थी चित्रकारीअपनी बचत के पैसों का प्रयोग निवेश के रूप में कर शुरू किया था उद्यम

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एक दिन फेसबुक पर सर्फिंग करते हुए अचानक ही मेरी नजर ‘परम’ के शानदार पेज पर पड़ी जिसे उसके निर्माता ने प्यार से ‘कपड़े पर कहानियां’ के रूप में वर्णित किया हुआ था और इा कहानियों को देखकर मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं। वास्तव में वे क्या खूब कहानियां थीं। कला, सिनेमा और साहित्य का हथकरघे की बुनाई, आधुनिक सौंदर्यशास्त्र और परंपरा के साथ यह एक ऐसा अनूठा समागम था जिसने मुझे निःशब्द कर दिया था। हर साड़ी, स्टोल या डिजाइन को एक प्रेम से चयनित कविता या छंद के साथ शानदार रूप से प्रस्तुत किया गया था। इस पूरी प्रस्तुति को देखकर आपको दूसरी दुनिया में होने का आभास होता था जिसमें कुछ भी बेचने के लिये बाजार के लिये नहीं लगता था।

इस फेसबुक पेज को कई बार पूरी तरह छानने के बाद भी मुझे इसके निर्माता के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिल सकी। वे यदा-कदा अपने उपभोक्ताओं का शुक्रिया अदा करने के लिये इस पेज पर आतीं और अपनी नौकरी के साथ-साथ इस पेज ‘परम’ को बनाए रखने में आने वाली मुश्किलों के बारे में टिप्पणियां करने के अलावा उन सब विचारों के बारे में (किताबें, संगीत, चित्र स्थान और सबसे ऊपर लोग) जानकारी देती हैं जो उन्हें इसके लिये प्रेरित करते हैं। हालांकि ‘परम’ एक व्यक्ति-विषयक शीर्षक है लेकिन शायद इस पेज का निर्माता अपनी पहचान का सिर्फ यही एक संकेत देना चाहता है। इस पेज को देखने के बाद मुझे महसूस हुआ कि इसके निर्माता का काम भी जरूर रचनात्मकता से भरपूर होगा।

फेसबुक पर और अधिक जानकारी जुटाने के क्रम में जब मुझे जानकारी हुई कि इस पेज की निर्माता परम घोष देश की सबसे पुरानी कानूनी फर्मों में से एक में वकील हैं जो दिनभर विलय और अधिग्रहण के मुद्दों से जूझने के बाद रात को मिलने वाले खाली समय में हथकरघे के इस जादू को सामने लाती हैं तो यह मेरे लिये एक आश्चर्य से कम नहीं था। ‘परम’ (उनके अपने नाम के साथ उनके ब्रांड का नाम) का मतलब बताते हुए वे कहती हैं कि, ‘‘यह मुझे ब्रेकफास्ट एट टिफनीज़ की मेरी कुद पसंदीदा पंक्तियों की याद दिलवाता है, ‘मैं तबतक कुछ भी चीज को अपनाना नहीं चाहती जबतक मुझे ऐसी जगह नहीं मिल जाती जहां की चीजें मेरे जैसी हों। मैं अब भी उस जगह की खोज में हूँ लेकिन मुझे पता हे कि वो जगह कैसी है।’’

‘परम’ एक ऐसा स्थान हे जहां मैं और मेरी चीजें एक दूसरे से सम्मिहित हो जाती हैं। वह मेरी हमनाम है, मेरे पागलपन को साझा करती है, कपड़े और शब्दों के प्रति मेरा प्रेम, उपेक्षित और अपूर्ण के प्रति मेरा स्नेह, दम तोड़ती रंगने की कला के प्रति मेरी लालसा और पुरानी यादों का पिटारा।

वस्तुतः इसका शाब्दिक अर्थ सर्वोच्च है। मेरी माँ उक्सर मुझे नाम बदलने की धमकी देती थी क्योंकि मैं इस नाम के बिल्कुल उलट थी। किसी ने मुझे बताया था कि ‘परम’ का एक प्यार भरा मतलब ‘खुशी’ भी होता है और मैं इसके इस मतलब को अधिक पसंद करती हूँ।

इस छोटे से स्टार्ट-अप उद्यम में परम अपनी अंतरात्मा को उभार देना चाहती हैं। ‘‘परम’ में मेरे जीवन के लगभग सभी और विभिन्न पहलू सम्मिहित हैं और यह मेरे ही व्यक्तित्व का एक विस्तार है। मैं ‘परम’ का उल्लेख ‘वह’ के रूप में इसलिये नहीं करती क्योंकि मैं उसे भी अपनी तरह एक मानव मानती हूँ, मेरी ही तरह उसमें भी कुछ कमियां हैं और मेरी ही तरह ‘परम’ भी अपूर्ण है। फिर भी ‘परम’ एक असली होने के साथ-साथ एक मुक्त आत्मा है जैसा कि मैं खुद को महसूस करना चाहती हूँ।’’

एक छोटी बच्ची के रूप में परम एक सामान्य बच्चों के स्कूल में नहीं गईं। ‘‘क्योंकि मेरे रोने से घर की छत गिर जाती,’’ वे हंसते हुए कहती हैं। बल्कि, तीन साल की छोटी सी उम्र में उनके माता-पिता ने उन्हें चित्रकला की कक्षाओं में भेज दिया और वे गर्व से कहती हैं कि, ‘‘और मैंने उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।’’ वे आगे जोड़ती हैं कि, ‘‘मेरे जीवन को रंगों से अधिक किसी भी चीज ने प्रीाावित नहीं किया है। इंद्रधनुष, कांच की चूडि़यां, मेरे मोम के रंगों का डिब्बा, कांच के डब्बे में भरी हुई जेली की टाॅफियां, तितलियां, कहानियों की किताबें, और वे अनंत चीजें जिनमें रंग थे, मेरी आत्मा उनमें बसती थी। चित्रकारी से मुझे जीने की शक्ति मिलती थी और अब भी मिलती है। तस्वीरें और कहानियां मुण्े किसी अन्य वस्तु के मुकाबले अधिक प्रभावित करती थीं।’’

वह मानती हैं कि एक पहले से ही व्यस्त जीवन के बावजूद व्यवसाय में उतरने का निर्णय, भले ही वह पार्ट-टाइम था, सोचे-समझे फैसले की जगह एक तात्कालिक निर्णय था। ‘‘इस काम की इच्छा कहीं भीतर से थी। सभी बंधनों को तोड़ने की तीव्र इच्छा, एक कानूनी फर्म में बंधन की नौरी के बीच ताजी हवा में सांस लेने की इच्छा।’’

यह पड़ोस में रहने वाले स्वनिल आंखों वाले प्यारे लड़को को घूरने की तरह था। यह जानते हुए कि आप शादीशुदा हैं फिर भी उसके सामने आते ही आपको हवा में स्वरलहरियां महसूस होने लगती हैं। दिन की नौकरी उस अमीर पति की तरह है जो आपके कार, फ्लैट, जूतों और अन्य जरूरतों को पूरा करता है। यह परियोजना उस एक असहाय रूमानी प्रेमी की तरह है जो कविता पढ़ता है, जो अपना दिल निकालकर आपके गाल के गड्ढे पर निसार कर दे, जो आपकी आँखों में हजारों सितारों को अनुभव करे या उनमें पूरी कायनात देखे।

वे चहकते हुए कहती हैं कि, ‘‘अपनी रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी के छोटे बीच एक लंबे समय से देखा हुआ एक ऐसा सपना था जो काफी समय से एक छोटे से कोने में बाहर आने के लिये आतुर था।’’

परम की नजरों में उनका स्टार्ट-अप एक ऐसी जगह है जहां कपड़े का शब्दों के साथ संगम होता है। ‘‘यहां करघा कहानियों से प्यार करता है। यह उस स्क्रैपबुक या स्मृति पत्रिका की तरह है जिसका प्रयोग हम स्कूल में दोस्तों के बीच करते थे। हम उस किताब पर सुनहरी यादों की तस्वीरों को चस्पा करते थे और उनके इर्द-गिर्द रंग-बिरंगे स्कैचपैन की मदद से संस्मरण और कहानियां लिखते थे। मैंने इसके परवरिश सिर्फ इसी दर्शन को आधार बनाकर की है और यह शब्दों और कपड़े का एक ऐसा मेल है जिसमें हर उत्पाद की अपनी एक काल्पनिक कहानी है। मेरे इस फेसबुक पेज पर आने वाला हर व्यक्ति सबकुछ नहीं खरीद सकता लेकिन मेरा प्रयास रहता है कि उसे घर जैसा महसूस होना चाहिये। एक ऐसा सपनों का घर जहां व्यक्ति मखमली मसंद से सुसज्जित एक कमाल की कुर्सी, पढ़ने के लिये कुछ रोचक किताबें और शांति के कुछ पल बिता सके। यहां पर कपड़ा एक ठंडी दोपहर में रजाई के समान होगा और शब्द एक ऐसी कहानी रचेंगे जिसे आप पढ़ने के लिये उत्सुक होते हैं।’’

परम मानती हैं कि उनकी जिंदगी काफी हद तक इन कहानियों पर निर्भर करती है और वे इस बात पर भी अटल रहती हैं कि लोगों की पता है कि ये सुंदर शब्द सिर्फ उनके उत्पादों को बेचने के लिये नहीं हैं। ‘‘मेरा हर उत्पाद अपने साथ एक कहानी लेकर आता है और वे कहानियां बनाई हुई नहीं होती हैं। वे बाजारू और विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल होने वाले रंगीन शब्दों से ओत-प्रोत न होकर वास्तविक जीवन की घटनाओं, कहानियों, कविताओं या तस्वीरों से प्रेरित होती हैं। मैंने अबतक सिर्फ उपभोक्ताओं को ही नहीं पाया और जीता है बल्कि इस प्रक्रिया के दौरान मैंने जीवन में कई अच्छे पाठकों और मित्रों को जीतने में सफलता प्राप्त की है।’’

परम अपने इस सपने को एक धीमि गति से स्थिरता के साथ आगे बढ़ा रही हैं। उन्होंने प्रारंभिक निवेश अपनी छोटी सी बचत से किया था और अब होने वाला मामूली सा लाभ भी वापस उसी बचत का साथ देने चला जाता है और ऐसे ही उन्होंने अपने स्टार्टअप के ‘नवजात’ समय को बिताया था। ‘‘हालांकि अभी भी उत्पादन बहुत छोटे पैमाने पर है लेकिन जैसे-जैसे मेरे उत्पादों ने उपभोक्ताओं के दिलों को जीतना शुरू किया वैसे-वैसे मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा और मैंने अपनी बचत का कुछ और पैसा इस काम में लगाना शुरू कर दिया। समय के साथ जैसे ही मेरा मुनाफा बढ़ेगा मैं उसका एक भाग व्यापार को बढ़ाने में इस्तेमाल करूंगी और कुछ हिस्से का प्रयोग अपने घूमने और यात्राओं के शौक को पूरा करने में लगाऊँगी। मैं दुनिया घूमना चाहती हूँ, वो भी पूरी।’’

अपने काम को जीवंत बनाने के लिये उनके पास कुशल कारीगरों की एक छोटी सी टीम है। ‘‘असली काम तो ये लोग कर रहे हैं, मैं तो सिर्फ एक सहयोगी स्टाफ की भूमिका निभा रही हूँ,’’ मुस्कुराते हुए परम कहती हैं। आज के ई-काॅमर्स के जमाने में जब दुनिया बड़े-बड़े आॅनलाइन माध्यमों का प्रयोग कर व्यापार कर रही है, ऐसे में सिर्फ एक फेसबुक पेज से काम चलाना उनकी मनोदशा और अनुभवी सोच को दर्शाता है। ‘‘वर्तमान में मैं एक ऐसे झूले की सवारी कर रही हूँ जिसके दोनों तरफ मेरी नौकरी और व्यापार दोनों संतुलित रूप से संचालित हो रहे हैं, तो मेरे लिये अधिक बड़ा करनासंीाव ही नहीं है। एक फेसबुक पेज सबसे अच्छा विकल्प है क्योंकि इसपर उत्पादों को प्रदर्शित करना बहुत सुलभ है। इसपर व्यक्तिगत बातचीत करने की पर्याप्त गुंजाइश है जो मेरे ख्याल से इस व्यापार की सबसे बड़ी जरूरत है। ‘परम’ जैसे छोटे स्तर के उत्पादक के लिये एक फेसबुक पेज सबसे अच्छा विकल्प है। एक पूर्ण विकसित वेबसाइट या ई-काॅमर्स का प्रयोग करने के लिये मुझे अच्छाखासा निवेश भी करना होगा जिसके लिये मैं वित्तीय तौर पर तैयार नहीं हूँ।’’

कला, संस्कृति और लोग, सभी के अपने-अपने विशेष स्थान होते है, लेकिन परम के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्त्रोत उनका शहर कोलकाता है। ‘‘कोलकाता मेरी प्रेरणा का सबसे बड़ा स्त्रोत रहा है। यह एक अभिभावक, एक शिक्षक, परम मित्र, एक प्रेमी होने के साथ ही मेरे लिये सबकुछ है। कॉलेज स्ट्रीट ‘बोई पैरा’, पीली टैक्सियां हाथ रिक्शा, अनंत बातचीत, पुरानी इमारतें, मूर्तियां और स्मारकके अलावा सड़क के किनारे मिलने वाली चाय सब मेरी रचनाओं में मेरे साथ होते हैं।’’

इस शहर की अपूर्णता मुझे सबसे अधिक मंत्रमुग्ध करती है। यह एक ऐसी माँ की तरह है जिसकी साड़ी हल्दी और मछली की खुशबू और रंग से भरी हुई है, जिसके बाल एक लापरवाही से गुंथे हुए जूड़े में गुंथे हुए हैं, जिसके पास प्रसाधन केे नाम पर सिर्फ बोरोलीन है और जो अपने बच्चों को घर से जाते हुए देखकर बिना रुके सिर्फ ‘डुग्गा डुग्गा’ बुदबुदाती रहती है और जो दुनियावी मोहमाया से बहुत दूर है। उसका अंग्रेजी ज्ञान आपको मुंह छिपाने पर मजबूर कर देगा। वह ऊँचे स्वर वाली होने के अलावा भद्दी भी लग सकती है लेकिन फिर भी वह हर तरह से प्यारी और मनमोहक है।

मेरे लिये कोलकाता शांति का दूसरा पर्याय है। यह एक ऐसा शहर है जो मुझे पालकी, एक बड़ा बंगला या मोटा बैंक बैंलेंस देने का वायदा नहीं करता है लेकिन मुझे एक चीज देता है और वह हैं शांति। यह शहर मुझे जीवन में एक ऐसा आरामदायक कोना उपलब्ध करवाता है मैं सुकून से बैठकर चाय पी सकती हूँ और खुली आंखों से सपने देख सकती हूँ। यह मुझे एक विशाल खुले हुए मैदान में इकलौती बेंच प्रदान करता है जहां मैं तसल्ली से बैठकर अपनी स्कैचबुक लेकर उसमें अपनी मनपसंद तस्वीर तैयार कर उसमें रंग भर सकती हूँ। यह मुझे चलती हुई ट्राम में खिड़की वाली एक ऐसी सीट पर बैठने की अनुमति देता है जहां मैं घंटों तक बैठकर अपनी मनपसंद किताब पढ़ सकने के अलावा कुछ पंक्तियां भी लिख सकती हूँं।

अपना हर उत्पाद तैयार करते समय परम उपभोक्ता की खरीदने की क्षमता और उत्पाद की विशिष्टा के बीच एक मुश्किल संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती हैं। ‘‘मैं सबको यह बताती हूँ कि हमारा प्रत्येक उत्पाद सिर्फ और सिर्फ हस्तनिर्मित है जिस वजह से प्रत्येक उत्पाद तैयार करने में बहुत कौशल, समय और धैर्य की आवश्यकता होती है। चूंकि हम इनका निर्माण बड़े स्तर पर नहीं कर रहे हैं इसलिये इनके दाम भी उस स्तर के नहीं लिये जा सकते। जब आप एक हस्तनिर्मित उत्पाद खरीदते हैं तो आप न सिर्फ उस कलाकार का विचार ही हासिल कर रहे हैं बल्कि आप उसका समय, उसकी आत्मा का एक हिस्सा और उसकी कला पर भी अपना स्वामित्व जमा रहे होते हैं और यह सब उस उत्पाद की कीमतों को भी प्रतिबिंबित करेगा।’’

जब उनसे अपने जीवन की मांगों की जिम्मेदारियों के बोझ को संभालने के बारे में पूछा गया तो बड़े उदास से स्वर में उन्होंने बताया कि इस दौरान अगर कुछ छूटा है तो वह है उनकी नींद। ‘‘एक अंशकालिक उद्यमी, एक पूर्णकालिक नौकरी और हां एक घर भी, वास्तव में किसी भी महिला के लिये इतनी जिम्मेदारियों की चुनौती ही काफी है। मैंने यहां घर का जिक्र विशेष रूप से इसलिये किया क्योंकि इस शहर में मेरे सुसराल वालों के अलावा मेरे माता-पिता भी रहते हैं। अपने काम के साथ-साथ मुझे बहुत सी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करना पड़ता है।’’

यह सब मुझे कांच के मर्तबान और प्रोफेसर की कहानी की याद दिलाता है। इस कहानी में प्रोफेसर कांच के मर्तबान में पहले बड़े पत्थर भर देता है। जब उसके छात्रों को लगता है कि अब मर्तबान पूरा भर चुका है तब वह उसे थोड़ा हिलाता है और उसमें कुछ छोटे कंकर डाल देता है जो पत्थरों के बीच में बने छोटे स्थानों में अपनी जगह ले लेते हैं। इसके बाद वह इसमें रेत भर देता है जो ऐसे ही अपनी जगह ले लेता है और उसके बाद पानी रिसकर बचे हुए स्थान में अपनी जगह बना लेता है। यह कहानी हम सबमें से अधिकतर की कहानी से मेल खाती है बस जरूरत है पहले बड़े पत्थरों को पहचानकर उन्हें उचित स्थान पर लगाने की। इसके बाद अन्य चीजें तो धीरे-धीरे अपना स्थान बना ही लेती हैं।

फिलहाल उनके लिये बड़े पैमाने पर व्यापार करना संभव नहीं है। परम धीमी गति से चल रही अपनी जिंदगी की गाड़ी से बहुत खुश हैं और दोनों क्षेत्रों का भरपूर आनंद ले रही हैं। एक उद्यमी के रूप में काम करना उन्हें अच्छा लगता है। ‘‘यह मुझे कुछ-कुछ ऐसी खुशी का अहसास देता है जैसा फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ में श्रीदेवी को पहली बार ‘उद्यमी’ शब्द को बुदबुदाने में होता दिखाई दिया था। यह मुझे पिघले हुए चाॅकलेट की तरह गुनगुना और बर्फीलेे नींबूपानी की तरह ठंडा लगता है!’’ और वे बड़ी बेताबी से उस क्षण का इंतजार कर रही हैं जब वे अपना पूरा समय और सारी रचनात्मक ऊर्जा इस काम में लगा सकती हैं। ‘‘किसी दिन जरूर’’, वे उत्साह से आह भरते हुए कहती हैं।