IIT-IIM ग्रैजुएट्स मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ बदल रहे धान की खेती का तरीका

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हाइब्रिड प्रजाति के धान उपज को अधिक देते हैं, लेकिन देशी प्रजाति के धान कई तरह से हमारी सेहत और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं। ऐसे बीजों को संरक्षित करने का जिम्मा उठाया है दो युवा इंजीनियर ईशान पसरिजा और दर्शन दोरस्वाममी ने।

ईशान और दर्शन सृजन एनजीओ के तहत चलने वाले बुद्धा फेलो प्रोग्राम के द्वारा दी जाने वाली फेलोशिप पर काम कर रहे हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के दूर दराज इलाकों में किसानों को देशी प्रजाति के धान की खेती करने को प्रोत्साहित कर रहे हैं। 

भारत में 100,000 से भी ज्यादा प्रजाति के धान उगाए जाते हैं। एक वक्त ऐसा भी था जब भारत को चावल की खेती के लिए भी जाना जाता था। इससे 60 प्रतिशत आबादी का पेट भरता था। बदलते वक्त के साथ परंपरागत धान की प्रजाति की जगह हाइब्रिड बीजों का चलन बढ़ गया और देशी बीज विलुप्त होते गए। हाइब्रिड प्रजाति के धान उपज को अधिक देते हैं, लेकिन देशी प्रजाति के धान कई तरह से हमारी सेहत और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं। ऐसे बीजों को संरक्षित करने का जिम्मा उठाया है दो युवा इंजीनियर ईशान पसरिजा और दर्शन दोरस्वाममी ने।

इंडियाटाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ईशान और दर्शन सृजन एनजीओ के तहत चलने वाले बुद्धा फेलो प्रोग्राम के द्वारा दी जाने वाली फेलोशिप पर काम कर रहे हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के दूर दराज इलाकों में किसानों को देशी प्रजाति के धान की खेती करने को प्रोत्साहित कर रहे हैं। आईआईटी दिल्ली से पढ़े ईशान कहते हैं, 'दरअसल हम धान की उन किस्मों को पुनर्जीवित करने का काम कर रहे हैं जिन्हें लगभग दो दशक से भुला दिया गया है। हाइब्रिड प्रजाति के धान की पैदावार अधिक होती है और इस वजह से किसानों को देशी प्रजाति के धान की खेती के लिए मनाना थोड़ा मुश्किल होता है।'

देशज किस्म की जरूरत क्यों?

देशज किस्म के धान की पैदावर भले कम होती है, लेकिन जो स्वाद और गुणवत्ता इस धान की प्रजाति में होती है वह किसी अन्य हाइब्रिड बीजों में नहीं मिल सकती। ईशान कहते हैं, 'बेशक हाइब्रिड धान को उगाना बेहद सरल है लेकिन जो बात देशज किस्म वाले धान में है वह किसी और में नहीं मिल सकती। इसे खाने वालों की सेहत तो सुधरती ही है साथ ही किसानों को भी लाभ मिलता है। हमारा मकसद उपभोक्ता और किसान दोनों की हालत सुधारना है।'

किसानों को समझाना मुश्किल

ईशान और दर्शन दोनों आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान से निकलने के बाद अच्छी खासी नौकरी कर रहे थे, लेकिन उनके भीतर किसानों की जिंदगी बदलने का जुनून था यही वजह थी जो उन्हें खींचकर मध्य प्रदेश लाई। आईआईएम काशीपुर से पढ़कर निकलने वाले दर्शन कहते हैं, 'अब कोई भी किसान नहीं चाहता कि उसका बेटा खेती करे। जिनके पास कम जमीन है उनकी हालत तो और भी दयनीय है। हमने बीते महीने किसानों से जाकर बात की और उन्हें दशज किस्म के धान की खेती करने का सुझाव दिया। किसानों ने हमारी बात तो सुनी, लेकिन उन्हें समझाना थोड़ा मुश्किल है।'

ईशान ने बताया कि धान की कई देशज प्रजातियां ऐसी हैं जो कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों में भी फायदेमंद होती हैं। इसे लेकर कई शोध भी हो चुके हैं। वे बताते हैं कि अभी तक 200 किसानों से बात हो चुकी है और उनमें से अधिकतर ने इस धान की खेती में रुचि दिखाई है।

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