इंस्पेक्टर मां के हौसलों ने भरी उड़ान तो बेटी ने भी कमाया पूरी दुनिया में नाम

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यह दास्तान दो ऐसी कामयाब मां-बेटी की है, जिनके सामने जिंदगी की तमाम मुश्किल चुनौतियों ने सिर झुका लिया, उन्होंने जहां भी दस्तक दी, कामयाबियों ने उनके कदम चूमे। सही कहा है - 'मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पंख से कुछ नहीं होता है, हौसलों से उड़ान होती है।'

बेटी अंकिता के साथ सत्या सिंह
बेटी अंकिता के साथ सत्या सिंह
सत्या सिंह बताती हैं कि जब बचपन में पापा उन्हें स्कूल छोड़ने जाते थे तो राह चलते उन अभिभावकों के कसैले फिकरे सुनने को मिलते थे, जिन्हें अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने से परहेज था।

बेटी अंकिता आज बेंगलुरु में अपने पति के साथ बेहतर जिंदगी ही नहीं गुज़ार रही, दुनिया में अपना नाम भी रोशन कर रही है। वह आज विश्व के सौ प्रभावशाली एचआर प्रोफेशनल्स में एक हैं।

उन मां-बेटी की हौसलों ने कुछ ऐसी उड़ान भरी कि उनके अपने तो अपने, पराए भी दंग रह गए। आजमगढ़ (उ.प्र.) की रहने वाली अवकाशप्राप्त पुलिस इंस्पेक्टर सत्या सिंह और उनकी बिटिया अंकिता के कामयाबियों भरे जीवन की उड़ान कुछ ऐसा ही संदेश देती है। डेढ़ साल की उम्र में मां का दुनिया छोड़कर चले जाना, पढ़ाई-लिखाई अधर में लटकी, घर में ही पढ़ने लगी, कुछ वक्त के लिए... तो टीचर पापा द्वारा सीधे छठवीं क्लास में एडमिशन करा देना, और बारहवीं क्लास में पहुंचते ही पापा का भी दुनिया छोड़कर चले जाना, फिर भी हिम्मत न हारना, ये है सत्या सिंह के संघर्षों की शुरुआत की कहानी और बेटी अंकिता सिंह भी आज शोहरत में उनसे कुछ कम नहीं।

सत्या सिंह बताती हैं कि जब बचपन में पापा उन्हें स्कूल छोड़ने जाते थे तो राह चलते उन अभिभावकों के कसैले फिकरे सुनने को मिलते थे, जिन्हें अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने से परहेज था। पापा तो उन्हें स्कूल की मास्टरनी बनाना चाहते थे लेकिन उन्होंने कुछ और लक्ष्य तय कर रखा था। जब जीवन संघर्षों से गुजरता है, उसमें कई ऐसी भी यादगार कड़ियां जुड़ जाती हैं, जो कभी भुलाए नहीं भूलती। सत्या सिंह उसी तरह उस अज्ञात महिला संतोषी की याद करती हैं, जब एक एक कर सारे भरोसे थमने लगे थे, स्कॉलरशिप लेकर पढ़ाई जारी रखने की उसकी सीख काम आ गई। इतना ही नहीं, पढ़ाई के दौरान टूर पर जाने के लिए जब उनके पास कपड़े नहीं थी, संतोषी उनके लिए कई जोड़े कपड़े ले आई।

सत्या सिंह
सत्या सिंह

फिर तो पढ़ते-पढ़ते वह बीएचयू परिसर तक पहुंच गईं और वहां स्नातक शिक्षा पूरी करने के दौरान जिंदगी के आगे सफर की खिड़कियां खुलने लगीं। साथ रह रही उनकी सहपाठी का भाई जब अपने लिए पुलिस में भर्ती होने का फॉर्म ले आया, उन्होंने भी लगे हाथ भर दिया। बाकी तो रह गए, वह सेलेक्ट हो गईं। और 1984 का वह दिन भी उनकी जिंदगी में आया, जब वह इंस्पेक्टर बन गईं। और समय देखिए कि कैसा अजीब खेल खेलता है, जब सत्या सिंह की लखनऊ में तैनाती हुई, गाढ़े दिन की मददगार उनकी संतोषी बहन भी शादीशुदा होकर लखनऊ पहुंच चुकी थीं। सत्या सिंह आज भी उनके किए का एहसान नहीं भूल पाती हैं।

सत्या सिंह कहती हैं- 'पुलिस की नौकरी भले संयोग वश मिली हो, संघर्षों के जूझने का माद्दा उन्होंने अपने अंदर कभी कम नहीं होने दिया। वह मॉर्शल आर्ट में भी कुशल हैं। समय-समय पर लड़कियों को आत्मरक्षा के दांव-पेंच सिखाती रहती हैं। उनको हमेशा चुस्त-दुरुस्त देख लोग उन्हें टॉम बॉय कहा करते।' जीवन में हमेशा ईमानदार बने रहने के जज्बे के साथ वह किरण बेदी को अपना आदर्श मानती हैं। नौकरी के दौरान वह ढीट और इंसाफपसंद ढर्रे पर कड़ाई से अड़ी-खड़ी रहीं।

उनकी जिंदगी में मुश्किलों का दूसरा कठिन दौर तब आया, जब पति ने साथ नहीं निभाना चाहा। उन्हें फिर अपनी स्वतंत्र राह चुननी पड़ी। दाम्पत्य टूट गया। तब तक अंकिता जीवन के साथ हो चुकी थीं। फिर उन्होंने तय किया कि अब उन्हें आगे जो कुछ करना है, लोगों को इंसाफ दिलाने के साथ बेटी का भविष्य संवारने के लिए करना है। आज यही वजह है कि उनकी मेहनत से इंसाफ पाने वाली तमाम बेटियां उन्हें राखी बांधती हैं। सत्या सिंह कहती हैं कि मैं तो पहले से ही कमजोर लोगों का जी जान से साथ देती रही थी, जब वर्दी ओढ़ ली, बेइंतहा ताकत मिल गई, यह सोचते हुए कि.....

जिगर में हौसला सीने में जान बाकी है, अभी छूने के लिए आसमान बाकी है।
हारकर बीच में मंज़िल के बैठने वालों, अभी तो और सख़्त इम्तहान बाकी है।

कमजोरों को इंसाफ दिलाने की कड़ी में वह एक ऐसे केस का जिक्र करती हैं, जिसकी कामयाबी पर उन्हें आज भी फक्र होता है। जब वह लखनऊ में 'क्राइम अगेंस्ट वुमन सेल' की इंचार्ज थीं, उनके सामने एक महिला से रेप का मामला आया। आरोपी ने घर में घुसकर उसके साथ दुराचार किया था। घटना के बाद रात में ही रोती-बिलखती पीड़िता ने बंथरा थाने पहुंचकर आपबीती सुनाई। एफआर दर्ज हो गया। मामला अदालत पहुंच गया। वह बताती हैं, जांच उनके जिम्मे आ गई। आखिर तक पैरवी पर डटे रहते हुए उन्होंने बलात्कारी को दस कैद की सजा दिला दी।

वह कहती हैं कि मैंने दूसरों की बेटियों को इंसाफ दिलाया, उनकी जिंदगियों की राह आसान की तो उसका ही मेरे भी घरेलू जीवन को अच्छा फल मिला। बेटी अंकिता आज बेंगलुरु में अपने पति के साथ बेहतर जिंदगी ही नहीं गुज़ार रही, दुनिया में अपना नाम भी रोशन कर रही है। वह आज विश्व के सौ प्रभावशाली एचआर प्रोफेशनल्स में एक हैं। इंटर पास करने के बाद अंकिता का इंजीनियरिंग में सेलेक्शन हो गया लेकिन वह मैनेजमेंट की पढ़ाई करना चाहती थीं तो लखनऊ से बीबीए में यूपी टॉप और पुणे से एमबीए टॉप किया। राज्यपाल ने अवार्ड मिला। दुनिया के ढाई सौ देशों वाले वर्ल्ड एचआरडी फोरम की कॉन्टेस्ट में शिरकत की और विश्व के सौ प्रभावशाली एचआर प्रोफेशनल्स में वह सेलेक्ट कर ली गईं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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