एक भारतीय बच्चे ने दिया दुनिया को "गुरु-मन्त्र", बड़े-बड़े विद्वानों को किया प्रभावित

भारत का छात्र बना "दुनिया का सबसे छोटा हेड मास्टर"...दृढ़-संकल्प और मेहनत के बल पर बनाया और चलाया स्कूल...बाबर अली ने गरीब बच्चों को शिक्षित कर कायम की मिसाल...स्वामी विवेकानंद के विचारों से मिली उसे प्रेरणा, नहीं मानी कभी हार...

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पश्चिम बंगाल के बहुत ही पिछड़े इलाके में एक बच्चे ने एक ऐसा प्रयोग शुरू किया , जिसकी वजह से वो आज दुनिया-भर में मशहूर है । वैसे वो अब बच्चा नहीं रहा, बड़ा हो गया है , लेकिन उसके कामयाब प्रयोग की चर्चा हर तरफ है। इस मुश्किल और क्रांतिकारी प्रयोग की शुरुआत उसने बचपन में ही की थी। उसके एक क्रांतिकारी विचार की वजह से दुनिया के कई मशहूर विद्वान, अर्थ-शास्त्री , शिक्षाविद और नीति-निर्धारक उसके प्रशंसक बन गए । उसने जो काम बचपन में किया वो काम लोग ताउम्र नहीं कर पाते। पढ़-लिख तो सभी जाते हैं , लेकिन दूसरों को पढ़ाने-लिखाने का विचार हर एक को नहीं आता। इस शख्स की कोशिश और कामयाबी ने दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया है। हम जिस शख्स की बात कर रहे हैं उसका नाम बाबर अली है। बाबर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले का रहने वाला है। आज उसकी उम्र 22 साल है और वो पढ़ाई कर रहा है। लेकिन, 9 साल की छोटी से उम्र में उनसे जिस विचार को अपना जीवन-लक्ष्य बनाया उसकी विचार को साकार करने के दृढ-संकल्प ने उसे दुनिया-भर में शोहरत दिलाई। देश-विदेश में कई लोग उसके विचारों से प्रभावित और प्रेरित होकर आगे बढ़ने लगे हैं।

बाबर के प्रयोग की कहानी 2002 में शुरू हुई जब वो 9 साल का था। साल 2002 में बाबर को स्कूल जाने के लिए 10 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता। उसके गाँव भाब्ता उत्तर पारा में कोई स्कूल नहीं था। बाबर खूब पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनना चाहता था। पिता मोहम्मद नसीरुद्दीन ने अपने बेटे बाबर को निराश होने नहीं दिया। कृषि उत्पादों का छोटा-मोटा कारोबार करने वाले उनसीरुद्दीन ने शुरू से ही बाबर की हौसलाअफ़ज़ाही की। पढ़ने-लिखने के लिए बाबर जो कुछ भी चाहिए था वो मुहैया कराया। बाबर भी खूब मन लगाकर पढ़ता।

लेकिन, एक दिन बाबर ने देखा कि उसके गाँव के दूसरे बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। गरीबी की वजह से उनके माँ-बाप इन बच्चों को दूर दूसरे गाँव और शहर में स्कूल नहीं भेज पा रहे थे । ये बच्चे दिन-भर, या तो घर-बाहर के काम करते हैं या फिर खेलते रहते । कुछ बच्चे तो गाय-भैंस चराते थे और कुछ खेत में काम करते थे। बाबर को एहसास हुआ कि उसकी खुद की बहन भी स्कूल नहीं जा पा रही है। उसकी बहन की तरह ही कई बच्चे स्कूल से वंचित थे । बाबर के मन में एक ख़याल आया। उसने सोचा क्यों न वो उन बच्चों को पढ़ाये जो स्कूल नहीं जा पाते हैं। 9 साल के बाबर ने फैसला किया कि वो जो भी अपने स्कूल में सीखता है , उसे अपने गाँव के बच्चों को भी सिखयेगा। फिर क्या था, बाबर अपने गाँव के बच्चों का टीचर बन गया।

बाबर ने अपने मकान के पीछे आँगन में जाम के एक पेड़ ने नीचे अपनी कक्षा शुरू की। उसकी बहन और कुछ बच्चे बाबर की इस कक्षा के पहले छात्र बने। जो कुछ भी को वो स्कूल में पढ़कर-लिखकर आता , वो ही दूसरे बच्चों को सिखाता। जैसे उसके टीचर उससे करने को कहते , वो भी वही चीज़ें अपने गाँव के बच्चों से करने को कहता। गाँव के बच्चों को पढ़ाई में मज़ा आने लगा। नन्हे बाबर को भी मास्टरी में करने में ख़ुशी मिलने लगी।

धीरे-धीरे छोटे-मास्टर बाबर की क्लास की खबर गाँव-भर में फ़ैल गयी। और भी दूसरे बच्चे अब क्लास में आने लगे।

अपने क्लास के बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उसी उम्र में बाबर को बहुत मेहनत करनी पड़ी । किसी तरह उसने ब्लैक बोर्ड का इंतज़ाम किया।

वो अपने स्कूल से इस्तेमाल किये हुए चॉकपीस के टुकड़े लाता और अपनी क्लास में बच्चों को पढ़ने के लिए उन्हीं का इस्तेमाल करता। अखबार और उनके पन्नों के ज़रिये बाबर ने अपनी क्लास के बच्चों को पढ़ना सिखाया। काम आसान नहीं था, लेकिन बाबर ने पूरी मेहनत की थी।

जब बाबर के लिए बच्चों को लिखवाने की ज़रुरत पड़ी , तब भी उसने अपना तेज़ दिमाग चलाया और नयी योजना बनाई। बाबर रद्दीवाले की दूकान पर जाता और किताबों के खाली पन्ने निकालकर ला लेता। वो इन्हीं पन्नों पर बच्चों को लिखवाता।

अब बाबर के क्लास में सब कुछ था - ब्लैक बोर्ड , पढ़ने के लिए अखबार-किताबें , लिखने के लिए कागज़।

बच्चे भी खूब मन लगाकर पढ़ने लगे थे। बच्चों की दिलचस्पी इतनी ज्यादा बढ़ गयी थी कि वो सभी बेसब्री से बाबर का स्कूल से लौटने का इंतज़ार करते। बाबर भी स्कूल से आते ही बच्चों की क्लास में चला जाता और मास्टर बनकर उन्हें पढ़ाता - लिखाता।

लेकिन , एक दिन जब बाबर के पिता ने देखा कि बाबर का ध्यान अब मास्टरी पर ज्यादा हो चला तो उन्होंने क्लास बंद करने और अपने स्कूल की पढ़ाई-लिखाई पर पूरा ध्यान देने की सलाह दी। लेकिन, बाबर ने अपने पिता को भरोसा दिलाया कि उसकी मास्टरी का उसकी पढ़ाई पर कोई असर पड़ने नहीं देगा। बाबर के निर्णय और दृढ संकल्प को देखकर पिता भी बहुत प्रभावित हुए।

बाबर के मास्टरी की चर्चा अब गाँव-गाँव होने लगी थी। जब बाबर के टीचरों को उसकी क्लास और मास्टरी का पता चला तो उन्होंने भी उसकी पीठ थपथपाई। दिलचस्प बात तो ये थी कि कई गांववाले अब अपने बच्चों को बाबर की क्लास में भेजने लगे थे। साल-दर साल बाबर के क्लास में बच्चों की संख्या बढ़ती ही चली गयी। बाबर ने अपनी क्लास और बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नए-नए तरीक़े अपनाये। बाबर ने क्लास चलने के मसकद से बच्चों के माँ-बाप के चावल लिए और उन्हें बेचकर पढ़ाने-लिखवाने के लिए बच्चों की किताबें खरीदी। चूँकि गांववाले और किसान रुपये दे नहीं सकते थे , बाबर ने सोचा कि किसान चावल दे सकते हैं और उसे बेच कर ही वो रुपयों का इंतज़ाम कर लेगा। ये तरकीब भी खूब चली।

थोड़े-ही समय में छोटे-से ही सही पर असरदार मास्टर बाबर की एक छोटी-सी क्लास ने इस स्कूल का रूप इख्तियार कर लिया था।

बाबर ने इस सायंकालीन स्कूल की औपचारिक शुरुआत करने चाही। गांववालों और उसके पिता ने इसमें उसकी खूब मदद की। जब बाबर छठी कक्षा में था तब गाँव के प्रधान ने बाबर के क्लास की मदद के लिए ब्लॉक डेवलपमेंट आफिसर ने किताबें दिलवाने की सिफारिश की थी।

धीरे-धीरे बाबर को प्रधान की तरह ही दूसरे मददगार मिलते गए। गाँव की एक महिला, जिस बच्चे तुलु मासी बुलाते थे , ने खुद आगे आकर स्कूल के लिए घंटी बजाने लगी।

पिता नसीरुद्दीन से स्कूल की औपचारिक शुरुआत और उद्धघाटन के लिए छह सौ रुपये दिए।

उद्धघाटन के लिए माइक किराये पर लिया गया। स्कूल को सजाया गया। सजाने में माँ की साड़ी भी काम आयी। रिब्बन भी कट किया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। गीत गाये गए , नृत्य भी हुआ। स्कूल का नाम " आनंद शिक्षा निकेतन" रखा गया।

यानी बाबर अब सिर्फ एक मास्टर , या टीचर ही नहीं था , वो एक स्कूल का हेड मास्टर बन गया।

जब अखबारों में बाबर के स्कूल की खबर छपी तो उसे पढ़कर विश्वविख्यात अर्थशास्त्री और नोबल पुरस्कार से सम्मानित अमृत्य सेन से बाबर को 'शान्ति-निकेतन' बुलवाया। बाबर ने 'शांति-निकेतन' में पश्चिम बंगाल के पूर्व वित्त मंत्रियों , जाने-माने अर्थशास्त्रियों और दूसरे विद्वानों के सामने एक घंटे तक अपना भाषण दिया। वहां मौजूद हर कोई बाबर के विचारों से बहुत प्रभावित हुआ। उस समय बाबर सिर्फ आठवीं का छात्र था।

बाबर और उसके स्कूल की चर्चा अब राज्य की राजधानी कोलकाता में भी होने लगी। बाबर कोलकाता भी जाता और आईएएस , आईपीएस और दूसरे अधिकारियों से मिलता और अपने स्कूल के लिए अनुदान मांगता।

2008 में जब बाबर दसवीं कक्षा में आया , जब उसे बहुत मेहनत करनी पड़ी। वो सुबह जल्दी उठ जाता और पढ़ाई करता। फिर स्कूल जाता, वहां भी मन लगाकर पढता-लिखता। फिर घर आता और अपने स्कूल में बच्चों को पढ़ाता-लिखाता। दिन-रात एक करने की वजह से ही 2008 में बाबर ने प्रथम श्रेणी में दसवीं की परीक्षा पास कर ली।

जिस तरह ने बाबर में पूरी मेहनत और लगन से स्कूल को चलाया और आगे बढ़ाया , गाँव के बच्चों को शिक्षित किया उसे देखकर दुनिया-भर में भी कई लोग और संस्थाएं प्रभावित हुईं।

दुनिया भर में मशहूर समाचार एजेंसी - बीबीसी ने बाबर को "दुनिया-भर का छोटा हेड मास्टर" घोषित किया। बाबर की कहानी को दुनिया-भर में प्रसारित किया। भारत के अंग्रेजी समाचार चैनल सीएनएन-आईबीइन ने " रीयल हीरो " के खिताब से बाबर को नवाज़ा। दूसरे लोगों , दूसरी संस्थाओं ने भी बाबर का सम्मान किया।

लेकिन, ऐसा भी नहीं है कि बाबर को बस सम्मान ही सम्मान मिला और हर किसी ने उसकी मदद की। बाबर के मुताबिक, कई लोगों ने उसके प्रयास पर पानी फेरने की कोशिश की । बाबर की माने तो कई लोग उसकी तरक्की और कामयाबी से जलते थे, उसकी शोहरत से परेशान थे। इन लोगों का नाम न बताने की अपनी ज़िद पर कायम रहते हुए बाबर ने कुछ पत्रकारों को बताया है कि उसे बदनाम करने की भी कोशिशें हुई हैं। कुछ लोगों ने जान बूझकर उसके बारे में अफवाहें फैलाई हैं। कुछ असामाक्जिक ताकतों ने जान से मारने की भी धमकी दी है।

लेकिन, बाबर का कहना है कि वो किसी से डरने वाला नहीं हैं , उसका सफर , उनकी कोशिशें जारी रहेंगी।

बाबर का कहना है कि उसे स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रेरणा मिलती हैं। जब कभी वो किसी समस्या से घिरता है या फिर कोई चुनौती उसके सामने आती है वो स्वामी विवेकानंद के विचारों और उनकी बताई बातों को याद करता है और उन्हीं से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ता है ।

स्वामी विवेकानंद की ये बात कि " एक विचार लो , उस विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो , उस विचार को जियो। अपने मस्तिष्क , मांसपेशियों , नसों , शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो , और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो . यही सफल होने का तरीका है। " को बाबर ने अपने में आत्मसात किया है और कामयाबी हासिल की।

महत्वपूर्ण बात ये है कि बाबर की पढ़ाई जारी है और वो आईएएस अफसर बनना चाहता है। बाबर का स्कूल अब बहुत बड़ा हो गया है और उसके ५०० से ज्यादा बच्चों के दाखिला लिया है। २२ साल का बाबर अब चाहता है कि भारत के दूसरे गाँवों में पढ़े-लिखे लोग खासकर बच्चे दूसरों को पढ़ाये-लिखाये ताकि सभी साक्षर बने और देश खूब तरक्की करे।

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