"मैं मन ही मन अपनी शादी के असफल होने को लेकर तैयार थी, लेकिन मेरे पति ने अगड़ी-पिछड़ी जाति का फ़र्क ही मिटा दिया"

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एक स्त्री होने के नाते हमारे जीवन में कोई बात कितनी व्यक्तिगत है और कितनी पॉलिटिकल यह हमारे द्वारा यानि खुद के दवारा लिए गए निर्णयों से ही पता चलता है। यदि मैं इसे अपने-आप से जोडकर कहूं तो मेरे कहने का मतलब यह होगा कि मेरे अपने जीवन में लिए गए मेरे फैसले ही मेरे जीवन की पॉलिटिक्स को स्पष्ट करते है। यह निर्णय हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण होते है क्योंकि एक ओर इन्हीं फैसलों से हमारे अपने जीवन की बुनियाद तय होती है तो दूसरी ओर हमारे जैसे लोग जो सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन जीते हुए समाज बदलाव का कार्य करना चाहते है उनके फैसले अपने साथ-साथ बाकी समाज को भी कही ना कही गहराई से प्रभावित और प्रेरित करते है। कई बार हम अपने द्वारा लिए गए गलत निर्णयों पर पछताते हुए, किसी को दोष देते हुए या फिर उसे सामाजिक और पारिवारिक जामा पहनाते हुए अक्सर यह कहते फिरते है कि वो हमारा फलां गलत फैसला जो हमने मजबूरी या फिर किसी दबाब या भावुकता में लिया गया था उस समय उसको लेने में मेरा कोई हाथ नही था । अक्सर लोगों को जीवन में ली गई बडी भूल अपने जीवन साथी के सही चुनाव ना होने के कारण मन ना मिलने की नजर आती है, कई बार सही समय पर सही नौकरी या सही करियर ना चुनने पाने के कारण भी जीवन भर दुखी रहते है।


हम दलित समुदाय से थे। माँ और पिता दोनों पाँचवीं कक्षा पास थे। पिताजी जब माँ को देखने उनके गाँव गए तब माँ ने पिताजी के साथ शादी की पहली शर्त यही रखी कि मैं अपने बच्चों को खूब पढ़ाऊंगी। तब पिताजी ने उनकी शर्त सहर्ष स्वीकार करते हुए कहा कि कमाना मेरा काम रहेगा और बच्चों को पढ़ाना तुम्हारा काम रहेगा। अर्धशिक्षित मां –पिता दोनों हमारी बेहतर शिक्षा के लिए हमेशा संघर्षशील रहे। माँ कई बार बताती थी कि जब हमारे बच्चे नहीं हुए थे तो तुम्हारे पिताजी गली-मुहल्ले के बच्चों को पढ़ाने बैठ जाते थे। एक बार रात में पढ़ाते-पढ़ाते जलता हुआ लालटेन लुढ़क गया और उसके नीचे बिछी मेरी माँ की हाथ की बनी चटाई में आग लग गई थी।

पिताजी बहुत मेहनती थे और माँ बहुत ही हुनरमंद । खाली समय में पास-पड़ोस में जाकर बैठने के बजाय वे घर में रहकर ही काम करना अधिक पसंद करती थी। क्रोशिए से सफेद धागे से बने तकिए के कवर, पलंगपोश , टेबलकवर आदि वे बड़ी लगन और मेहनत से बनाती थी। सर्दियों में स्वेटर, मोजे आदि बनाया करती थी। हम तीन बहनों में से किसी में भी माँ के हुनर का एक अंश भी नही आया। पिताजी पहले एक साधारण टेलर थे. उन्होंने कई बार अपने पैसे जोडकर और कई बार मेरी माँ गहने बेच कर गारमेंट की फैक्ट्री खोलनी चाही पर वे कभी सफल नही हो सके। पिताजी के हर बार असफल होने पर माँ के ऊपर परिवार की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती। माँ ने हम सब बच्चों के साथ मिलकर लिफाफे बनाना शुरु कर दिया। माँ घंटों लगातार बैठकर लिफाफे बनाती थी। कभी- कभी तो रात में भी नहीं सोती थी। उनके साथ हम सब भाई-बहन लिफाफे बनाते थे। लिफाफे बनाने का एक फायदा मेरे जीवन में यह हुआ की मुझे बचपन से ही पढने की आदत पड़ गई। पढ़ाई तो मैं सामान्य ही थी। पर मुझे कहानियां वगैरहा अच्छी तरह से समझ में आ जाती थी। जब मैं केवल तीसरी कक्षा में ही थी तब मेरी माँ अचानक मानसिक रुप से अस्वस्थ हो गई। इस बीमारी का कारण शायद उनपर रात-दिन की शारीरिक मेहनत के साथ-साथ मानसिक दबाब का लगातार बने रहना ही रहा होगा। अपनी बीमारी के कारण अक्सर उनको दिल्ली के शाहदरा के मानसिक चिकित्सालय मे रहना पड़ता या जब वे अस्पताल में नही होती तो भी बार-बार अस्पताल ले जाकर उनको बिजली के झटके लगवाने पड़ते थे। अपनी मानसिक बीमारी के कारण लगातार कुछ ना कुछ कल्पना करके वे अपने से बतियाती रहती। वे कई बार वे हमें कहती कि देखो चिडियां मुझसे बात कर रही है। देखो चिडिया मुझे कह रही है “जाबो उठ सुबह हो गई”। जब उन्हें किसी बात पर गुस्सा आ जाता तो जोर-जोर से बोलने लगती। मैंने अपने होश में अपने पिता को बीमार माँ पर कभी चिल्लाते हुए नही देखा। मेरे पिता अक्सर हम सब भाई-बहनों से कहा करते थे कि यह बीमारी के कारण ऐसी हो गई है नही तो दूर-दूर तक तुम्हारी माँ जैसी सुघड-सुंदर और समझदार औरत मिलना बहुत मुश्किल था। बच्चों अपनी माँ के साथ कभी बुरा बर्ताव नही करना। एक तो माँ की बीमारी पर खर्च, दूसरे सात-सात बच्चों की पढाई का भारी बोझ। जिसके चलते पिताजी माया एक्सपोर्ट नाम की एक फैक्ट्री में रहकर रात-दिन काम करने लगे। वे हफ्ते के आखिर में केवल एक दिन के लिए घर आते थे। उस छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता के बेहद ईमानदार, मेहनत मशक्कत और संघर्षपूर्ण जीवन और उनके जीवट वाले व्यक्तित्व ने मेरे अंदर हमेशा के लिए ईमानदार, जुझारु और सच्चाई से जीने की अदम्य हठ पैदा कर दी।


घर पर बढते आर्थिक बोझ और इन्हीं संघर्षों को झेलते हुए मेरे बडे भाई मनोहर की पढाई लगभग छूट ही गई, पर उसने हिम्मत नही हारी और वह भी किसी की फैक्ट्री काम करते हुए भी तरह-तरह की साहित्यिक पुस्तकें पढ़ते और हमें भी पढने के लिए प्रेरित करते। मुझे अभी तक याद है उस समय शायद मैं आठवीं या नौवीं कक्षा में होउंगी जब उन्होनें हम बच्चों को अपने सामने बैठाकर मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘सदगति’ सुनाई थी। बडे भाई मनोहर के ही प्रयासों से घर के अन्य सदस्यों का सामाजिक जीवन से जुड़ाव होने लगा था। घर में लगातार दलित- गैरदलित कार्यकर्ताओं का आना-जाना होने लगा था। उनके दोस्त व सहेलियां अक्सर घर आते-जाते रहते थे। हम चार छोटे भाई-बहनों का उनको नमस्ते करने व चाय-पानी पिलाने वाली भूमिका से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था। उनके बीच होने वाली गरमा- गरम बहस को सुनने का मौका मिलना। हालांकि उस समय उनके दोस्त हमको छोटे बच्चों की नजर से ही देखा करते थे। पर फिर भी सामाजिक मुद्दों पर उनकी होने वाली बहसों से अनायास ही हम सबकी बाल-बुद्धि पर गहरा असर पड़ने लगा। घर में आने वाले भाई-बहन के तरह-तरह के दोस्त हमारे आकर्षण का बिन्दू थे। इसलिए उन्हें देखकर मुझे भी अपना जीवन सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में जीने की इच्छा बचपन में ही जाग गई थी।

अब सवाल है कि अगर आप एक तरह का सामाजिक जीवन जीना चाहते है और समाज के लिए काम करना चाहते है तो आपके द्वारा मजबूती से लिए गए निर्णय, आपके जीवन और विचारधारा को मजबूती प्रदान करने का कार्य करेंगे। मैं यह बात अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह रही हूँ। अक्सर हम ऐसा सोचकर या कहकर हल्के से ले लेते हैं कि हर बात को जीवन में एक बार ही तो होनी है। कई बार हम रिश्तों के में ब्लैकमेल हो जाते है। कई बार समाज के सामने हम अपने घुटने टेक देते है। शायद यही कारण है कि समाज में कुरीतियां, कुपरंपराए घटने के बजाय रात-दिन पैर पसार कर आगे बढ़ रही हैं। हम अपने जीवन में व्यक्तिगत और सावर्जनिक जीवन में स्पष्ट रुप में इनका विरोध नही कर पा रहे। दान- दहेज का विरोध , साधारण- सरल तरीके से शादी, फेरे-मंगलसूत्र-मांग व कन्यादान जैसी स्त्री-को गुलाम बनाने वाली परंपराए टूटने की बजाय जीवन में बस एक बार के नाम पर मजबूत होती जा रही है। मेरे एक मित्र की अपनी मर्जी से चुनी लडकी से शादी तय हो गई। मैने उससे पूछा कि शादी कैसे हो रही है? क्या तुम घोड़े पर चढ़कर शादी करोगे? तो उसने मुझे जबाब दिया कि मैं घोड़े पर नही रथ वाली बग्गी पर बैठकर जाउंगा. मैने उससे जब दलित आंदोलन से जुड़े होने के बारे में सवाल-जवाब किए तो उसका एक ही जवाब था, शादी तो जीवन में एक ही बार होती है। मैं तो अपने पूरे अरमान निकालूंगा। और इसी तरह लडकियां भी खूब पढी-लिखी होने के बाबजूद पूरे ठाठ-बाट से कीमती कपड़ों, जवाहरातों में लदी-फदी स्त्री-विरोधी परंपराओं पर पूर्ण समर्पित होने के लिए शादी के नाम पर सब कुछ सहने- करने को तैयार हो जाती है। हमेशा से ही यहाँ एक बार अरमान निकालने, परंपरा निबाहने, फर्ज अदा करने के नाम पर क्या कुछ नही हो रहा। हालत यहां तक पहुँच गई है कि अब तो गाहे-बगाहे ही, परंपरा तोडने या बदलने के लिए क्रांतिकारी या वैकल्पिक तरीके से की गई शादियों के दर्शन हो पाते है। हमारे सामाजिक कार्यकर्ता भी इस तरह की शादियों के लिए ज्यादा रुचि नही दिखा रहे हैं। क्या इसका एकमात्र कारण हमारे मन व समाज में बैठी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता है? अगर हाँ है तो क्यों वह हमारे अंदर इतनी गहरे जा कर बैठ गई है कि हम उससे बाहर निकलने की बजाय उसके षडयंत्र में और गहरे धंसते जा रहे है ?

आज के आधुनिक दौर में भी बेशक हम अपने आप को कितने परिवर्तनकामी सिद्ध करने में लगे हों, पर हमारे दिल और दिमाग पर परंपरागत पति-पत्नि की तस्वीर बुरी तरह अड्डा जमाएं बैठी है, किसी भी तरीके से वह हमसे दूर नही हो पा रही है। शायद यही कारण है कि प्रेमविवाह करने के बाबजूद हमारे सामाजिक राजनैतिक जीवन से जुड़े या जुड़कर काम कर रहे कई साथी कार्यकर्ताओं की परिणति तलाक, संबंध-विच्छेद या फिर गृह- कलह रहते-सहते हुए जीवन बिताने पर खत्म होती है। अपने जीवन में हम जब तक विवाह की राजनीति नहीं समझेगें तब तक विवाह को लेकर हो रही तमाम तरह की राजनीति भी नही समझ पाएंगे। जब दो बालिग सामाजिक कार्यकर्ता आपस में शादी कर रहे हो,तब उन दोनों के मिलकर एक साथ पूरे जीवन बिताने के बीच में क्या चीज सबसे महत्वपूर्ण रहने वाली है या रहेगी ,यह शादी से पहले उन्हें एक बार जरुर सोच लेनी चाहिए। ऐसे में क्या दो लोगों के बीच पैसा, पद, जाति व सामाजिक आर्थिक प्रतिष्ठा विवाह के आधार होने चाहिए? अगर यह सवाल मैं अपने आप से करु तो मेरा उत्तर हमेशा ना में ही होगा। पर हो यह रहा है कि शादी का निर्णय लेने से पहले अपने सुखी-सम्पन्न भविष्य को कैलकुलेट करते हुए हमारी कई महिला साथी अपने साथी मित्र की नौकरी, परिवार का बैंकग्राउंड और उसके रहन-सहन का उच्च प्रभावशाली सलीका तथा उसका मजबूत आर्थिक आधार का ध्यान रखती है। साथ काम करने वाले सीधे-सरल,केयरिंग मित्र जो कि शायद अच्छे जीवन साथी भी बन सकते हो और बराबरी के दर्जे की भी उनसे उम्मीद की जा सकती है, वे उनकी तरफ ध्यान नहीं देती। जबकि दूसरी तरफ पुरुष मित्र अपने जीवन साथी के रुप में प्रेजेंबल पत्नी की कामना रखते है। उनको शादी के लिए ऐसी लडकियां चाहिए होती है जिसकी पहले किसी से दोस्ती ना रही हो। होने वाली पत्नी घर का अनुशासन और रीति रिवाज मानने वाली हो, माँ-बाप की सेवा करने वाली हो, खाना बनाने से लेकर साथ सोने तक के सारे काम खुशी से करने वाली हो। यह सारे गुण माँ-बाप द्वारा तलाशी गई लडकी में आराम से मिल जाने की अधिक संभावना के चलते हमारे सामाजिक, राजनैतिक पुरुष कार्यकर्ता अपने आस-पास की और अपने समूह की चेतना-सम्पन्न लडकियों को छोडकर माँ-बाप की मर्जी से शादी करना ज्यादा बेहतर समझते है. पर बाद में मन और विचार ना मिलने पर पछताते हुए यह कहते हुए फिरते है कि हमारी मर्जी जाने बिना ही हमारे माँ-बाप ने हमारी शादी तय कर दी थी।


हर परिवार की अपनी राजनीति होती है। परिवार में मुखियां के रुप में पुरुष के काम निश्चित होते है और औरत के अलग । पति का काम कमा कर लाना और बड़े होते बेटों के भविष्य की चिंता करना, पत्नी का काम घर संभालना और परिवार की लड़कियों को तमीज शहूर से रहना सीखाना। यहां अप्रत्यक्ष रूप से अपने आप पितृसत्ता पीढी-दर-पीढी अपना काम करती चलती है। पति के काम में मीनमेख निकालने की और उसके द्वारा लिए गए किसी निर्णय पर प्रश्न उठाने की किसी को इजाजत नहीं होती जबकि पत्नी के काम में इन सब बातों का पालन आराम से किया जा सकता है। परिवार का मुख्य काम लड़कों को मर्द के रूप में तैयार करना और लड़कियों को औरत के रूप में तैयार करना होता है। परिवार में लड़कियां हमेशा पितृसत्ता की राजनीति की शिकार होती है। बचपन से ही पहनाने, खिलाने पिलाने पढ़ाने से लेकर अन्य बातों की उसे इस प्रकार ट्रेनिंग दी जाती है जिससे वह परिवार व्यवस्था का मजबूत स्तम्भ बनकर काम करें। आमतौर पर देखा जाता है कि लड़के बाहर से घूमफिर के अपने गंदे कपड़े धोने के लिए फेंक जाते है और बहनें उनके कपड़े धोती है। कई बार तो युवावस्था की दहलीज में पहुंचे भाई दिन में अपने बनाव सिंगार में और गली की लड़कियों को रिझाने के लिए कई-कई जोड़े कपड़े बदलकर कहीं फर्श, पलंग, बाथरूम कहीं भी पटक देते है, बहनें उनके कपड़े लड़कर बटोरती हुई मां बाप से शिकायत करने की कोशिश करती है तो मां बाप कई बार हंसकर कई बार डांटकर लड़कियों को सिखा देते है कि आखिर वे मर्द है, वे ऐसे ही होते है, घर तो आखिर लड़कियों को संभालना पड़ता है। इस प्रकार घर में ही लड़कों को सारे अधिकार अनायास और बेरोक टोक विरासत में मिल जाते है जबकि लड़कियों को खाना पकाना, घर साफ करना, सबकी सेवा करना उसे जन्मघुट्टी में पिलाकर उसके सामान्य अधिकारों में भी कटौती कर दी जाती है। ‘हमारे परिवार की लड़कियां सिर उठाकर नही चलती, ‘ऊंचा नहीं बोलती’ आदि जुमलों से लड़कियों की पैदावार को खालिस ब्राह्मणवादी पवित्र व्यवस्था की पोषक के रुप में लडकियों को स्थापित करने के लिए अमूमन परिवार साजिश रचने में कामयाब होने की कोशिश करते हुए देखे जा सकते है। और अगर परिवार की लड़कियां ब्राह्मणवादी पितृसत्ता द्वारा निर्धारित मानदण्ड से अलग चलती है या चलना चाहती है तो उसे ‘हाथ से निकलना’ कहा जाता है। अक्सर हाथ से निकलने का मतलब कि स्वतंत्र रुप से सोच-विचार कर अपने निर्णय ले रही लडकी को सजा के तौर पर उसके परिवार द्वारा उसकी किसी भी प्रकार के लड़के से चाहे वह पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, सदाचारी हो या दुराचारी लायक हो अथवा नालायक कुछ भी बिना देखे- भाले आनन-फानन में उसकी शादी कर अपना बोझ उतार लिया जाता है। सवाल यह नही कि लड़कियों के खिलाफ या विरोध में क्या कुछ घट रहा है सवाल है किस तरह यह सब, एक स्वतंत्र होती स्त्री के लिए तय की गई सजा एक परिवार की पूरी तरह व्यक्तिगत राय मानकर एक पूरी ब्राह्मणवादी व्यवस्था की राजनीति के तहत हो रहा है। और इस पर सब कोई प्रतिरोध नजर नही आ रहा है। मेरी एक सहेली की शादी बारहवीं पास करते ही हो गई थी। कारण यह था कि उसके माता-पिता को लगता था बडी होती लडकी के साथ कुछ ऊंच नीच हो गई तो वे समाज में अपना कौन सा मुँह दिखाएगे ? या फिर लडकी अपनी मर्जी से लडका चुन ले या किसी के साथ भाग जाएं तो परिवार की इज्जत में हमेशा के लिए बट्टा नही लग जायेगा ? मात्र सत्रह साल की उम्र में शादी कर देना वह भी अपने परिवार की नीजि परंपरा बताने और चलाने के नाम पर ही हो रहा है।

मैं समाज में औरतों के साथ घट रही अंसगतियों को बड़े होते होते अपनी आँखो से साफ-साफ देख पा रही थी. आस-पड़ोस में रहने वाली भाभियों का जीवन, स्कूल की सहेलियां की उनके जीवन के प्रति हसरतें और उपन्यास –कहानियों आदि के स्त्री पात्रों के माध्यम से यह सब औरतों के साथ ही क्यों, आदि पर विचार करने की मुझमें क्षमता विकसित हो रही थी। उन दिनों मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में दलित छात्र संगठन मुक्ति में जुडकर काम कर रही थी इसलिए वहाँ मैं तरह-तरह की विचारधाराओं के लोगों के सम्पर्क में आ रही थी। सबके साथ काम करते हुए मैने पाया कि लडकियां इन छात्र संगठनों में अपने अस्तित्व के होने के अहसास की एक मृग मरीचिका में जी रही होती है, छात्र संगठनों में लड़कियों को जोड़ा जरुर जाता है पर उन्हें बराबरी का स्थान नही दिया जाता। इन संगठनों में महिलाओं की हिस्सेदारी दिखाने मात्र के लिए इस्तेमाल होती है, ताकि ग्रुप में जेंडर बैलेंस दिखे या फिर कई बार लड़कों के आकर्षण के रुप में भी लडकियों को जोड़ा जाता है। वृहद रुप में उनके मुद्दों और समस्याओं पर सार्थक बहस नही छेड़ी जाती। नही तो क्या कारण है हर साल नयी-नयी लडकियों जो तरह-तरह के छात्र- संगठनों में जुड़ने के बाबजूद भी बाद में उनकी किसी भी तरह के आंदोलनों में चाहे वे महिला आंदोलन हो, अथवा जनआंदोलन या फिर सामाजिक व दलित आंदोलन, इन सबमें उनकी संख्या के हिसाब से हिस्सेदारी नही दिखती। पढाई पूरी हो जाने के बाद ये लडकियां अपने घर बैठ जाती है या विवाह बंधन में बंधकर घरेलू जीवन में चली जाति है। इसलिए तमाम तरह के संगठनों में महिला कार्यकर्ताओं की घोर कमी दिखाई पडती है। सवाल यह उठता है कि आखिर क्यूं यह महिला कार्यकर्ता सामाजिक जीवन में ना जुडकर पढाई खत्म होने के बाद या एक उम्र बीतने के बाद घरों में हाऊस वाईफ या फिर संगठन में ही किसी साथी से शादी करके उसकी घर-गृहस्थी में पूरी तरह डूबकर या डुबाने पर मजबूर होकर अपना जीवन निष्क्रिय होकर बिता देती है? यह सारे सवाल मुझे अक्सर मथते रहते थे। जब मैं छात्र-संगठन में काम कर रही थी तब मेरे साथ करीब दस-पन्द्रह साथी कार्यकर्ता थी, पर अब उन सब महिला साथियों से कोई भी सामाजिक जीवन में एक्टिव नही है। सब की सब घरों में खप चुकी है. हाँ उनमें से एक-दो जरुर नौकरी कर रही है। पर क्या उनके लिए इतना काफी है?

धीरे-धीरे समय, सोच और मेरे साथियों ने मुझे एक सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। मैं सामाजिक जीवन में रहते हुए लगातार दलित और स्त्रियों के मुद्दों पर काम करना चाहती थी इसलिए मैं सोचती थी जिससे मेरी शादी हो, चाहे माँ-बाप की मर्जी से हो अथवा अपनी मर्जी से, उस व्यक्ति में एक सामाजिक कार्यकर्ता के गुण जरुर होने चाहिए। मैं एक आम घरेलू औरत का जीवन नही जीना चाहती थी, मैं स्वतंत्रता से नौकरी करते हुए, बाकी समय समाज के लिए समर्पित करना चाहती थी, जिस समय मैं यह सब सोच-विचार रही थी उस समय मैं अपनी पढाई पूरी कर एक नाट्य ग्रुप अल्लारिपु में काम कर रही थी। मेरी तनखा उस समय दो हजार थी. दलित समाज में खासकर दलित छात्र-छात्राओं के साथ जुडकर दिल्ली विश्वविद्यालय में काम करने के दौरान मेरी सामाजिक काम करने की धारणा में और पक्का रंग चढ चुका था। शायद अब मैं अपने माँ-बाप द्वारा चुने गए लडके से शादी नही कर सकती थी। इसलिए मैंने तेजी से महसूस करना ही नहीं बल्कि मैने मन ही मन सोच भी लिया था कि मैं किसी सामान्य घरेलू व्यक्ति से शादी ना कर किसी सामाजिक कार्यकर्ता से ही शादी करुंगी। मेरे साथ किसी व्यक्ति के साथ दोस्ती का पहला आधार उसकी सरलता, सहजता, ईमानदारी और प्रतिबद्धता होती है। मैं कभी भी किसी व्यक्ति की हैसियत उसके पैसे, पद और उसके सामाजिक रुतबे से नही आंकती और ना ही कभी भविष्य में आकूंगी। जीवन साथी के रुप में चुनने के लिए मेरी अपनी शर्त यह थी कि सबसे पहले तो वह एक सामाजिक कार्यकर्ता हो दूसरे वह मेरे विचार और भावनाओं की कद्र करने वाला हो, तीसरे वह एक ईमानदार और पुरुष अहम् से मुक्त हो तथा उसे मेरे सामाजिक कार्यों से परहेज ना हो।


मेरे द्वारा अंतरजातीय विवाह करने का फैसला लेने पर मेरे पिताजी को दुख हुआ यह तो मैं नही कह सकती पर हाँ वो इस फैसले से थोडे चितिंत जरुर हो गए। चूंकि मेरे दादाजी और उनके परिवार के लोगों को गांव के ऊंची जाति के खासकर जिस जाति के व्यक्ति से मैं शादी करने जा रही थी उस जाति के लोगों ने हमारे समाज के लोगों को प्रताडित कर गाँव से पलायन करने को मजबूर कर दिया था। ऐसे में मेरे पिताजी का चिंतित होना स्वाभाविक था। मेरे पिताजी को लगा कि मैं जिस परिवार में शादी करने की बात कर रही हूँ वहाँ अगर मुझे जाति के नाम पर गालियां या ताने मिलेंगे तो क्या मैं उन गालियों और तानों को बर्दास्त कर पाउंगी ? उनके अनुसार समाज अभी इतना नही बदला था। मेरी जाति के कारण मेरे पति राजीव के पिता जो कि सरकारी नौकरी में एक ऊंचे ओहदे पर थे, इस शादी का घोर विरोध कर रहे थे। इसलिए उनका डर बिल्कुल वाजिब था। पता नही क्यों उस समय मेरे मन में यह धारणा बैठ गई कि शादी के बाद अगर सब कुछ ठीक-ठीक चला तो ठीक है और अगर नही चला तो कोई बात नही। यानि मैं मन ही मन अपनी शादी के असफल होने के परिणाम को लेकर भी मानसिक रुप से तैयार थी। लेकिन मुझे राजीव के साथ रहते- रहते पता चला कि वह एक वाकई सच्चा सामाजिक कार्यकर्ता है। वह हर मौके पर मेरे लिए अपनी मजबूत सपोर्ट के साथ खडा रहा। राजीव के मजबूत सपोर्ट का फायदा यह हुआ कि धीरे-धीरे परिवार अन्य लोगों में हम लोगों की एक इज्जतदार जगह बन गई। इतने सालों में उसने कभी मुझे घर के किसी भी काम के लिए फोर्स नही किया। ना ही कभी अपना पर्सनल काम करने का दबाब डाला। ना ही उसने कभी ऐसी छवि पेश की कि वह मेरा पति है। वरना हम अपने मित्रों के घर बराबर देखते आ रहे है कि लोग सामाजिक कार्यकर्ता होते हुए भी अपनी-अपनी परंपरागत छवियों में बंध कर जी रहे है। मुझे राजीव की तरफ से कभी यह महसूस नही हुआ कि मैं एक दलित परिवार से आई हूं और मेरी अस्मिता केवल एक दलित स्त्री की है। हम दोनों ने साथ रहकर एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखा और शेयर किया।

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अनिता भारती चर्चित कहानीकार आलोचक व कवयित्री। सामाजिक कार्यकर्ता, दलित स्त्री के प्रश्नों पर निरंतर लेखन। युद्धरत आम आदमी के विशेषांक स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण की अतिथि संपादक। अपेक्षा पत्रिका की कुछ समय तक उपसंपादक। समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध( आलोचना पुस्तक) एक थी कोटेवाली (कहानी-संग्रह) यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कहानियां ( संयुक्त संपादन) यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कविताएं (संयुक्त संपादन), यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री जीवन से जुडी आलोचना( संयुक्त संपादन) स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद विशेषांक की अतिथि संपादक । "रूखसाना का घर" तथा "एक कदम मेरा भी" (कविता संग्रह) सावित्रीबाई फुले की कविताएँ( संपादन), कदम पत्रिका के डॉ.तेजसिंह विशेषांक की अतिथि संपादक।