धीमी-धीमी आंच पर पकी जां निसार अख़्तर की शायरी

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फिल्मी गीतकार, शायर जावेद अख्तर उनके ही पुत्र हैं। जां निसार अख़्तर की शायरी में रोमांस ही उसका सबसे अहम पहलू माना जाता है। 

फोटो साभार: रेख्ता
फोटो साभार: रेख्ता
 उनकी नायाब रचनाओं को निदा फ़ाज़ली साहब ने अपनी किताब 'जांनिसार अख्तर एक जवान मौत' में सम्पादित किया है। कहा तो यहां तक जाता है कि दरअसल रोमांस ही जांनिसार अख़्तर का ओढ़ना बिछौना था।

जांनिसार अख्तर के पिता ’मुज़्तर खैराबादी’ भी एक प्रसिद्ध शायर थे। जांनिसार ने 1930 में विक्टोरिया कालेज, ग्वालियर से मैट्रिक करने के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से बीए (आनर्स) तथा एमए की डिग्री हासिल की।

तरक्कीपसंद शायरी के अगुवा होने के बावजूद बुनियादी तौर पर रूमानी लहजे के शायर जांनिसार अख़्तर की आज (19 अगस्त) पुण्यतिथि है। जमाना जानता है कि बोहेमियन शायर होते हुए भी उनकी जिंदगी का आखिरी वक्त बड़े संघर्षपूर्ण रहा था। फिल्मी गीतकार, शायर जावेद अख्तर उनके ही पुत्र हैं। जांनिसार अख़्तर की शायरी में रोमांस ही उसका सबसे अहम पहलू माना जाता है। उनकी नायाब रचनाओं को निदा फ़ाज़ली साहब ने अपनी किताब 'जांनिसार अख्तर एक जवान मौत' में सम्पादित किया है। कहा तो यहां तक जाता है कि दरअसल रोमांस ही जांनिसार अख़्तर का ओढ़ना बिछौना था।

'मैं सो भी जाऊं तो क्या, मेरी बंद आंखों में तमाम रात कोई झांकता लगे है मुझे। मैं जब भी उसके ख्यालों में खो सा जाता हूं वो खुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे।'

ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में 8 फ़रवरी, 1914 को जन्मे जांनिसार अख्तर का ताल्लुक शायरों के परिवार से था। उनके परदादा ’फ़ज़्ले हक़ खैराबादी’ ने मिर्ज़ा गालिब के कहने पर उनके दीवान का संपादन किया था। बाद में 1857 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ ज़िहाद का फ़तवा ज़ारी करने के कारण उन्हें ’कालापानी’ की सजा दी गई। जांनिसार अख्तर के पिता ’मुज़्तर खैराबादी’ भी एक प्रसिद्ध शायर थे। जांनिसार ने 1930 में विक्टोरिया कालेज, ग्वालियर से मैट्रिक करने के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से बीए (आनर्स) तथा एमए की डिग्री प्राप्त की। कुछ घरेलू कारणों से उन्हें अपनी डाक्टरेट की पढ़ाई अधूरी छोड़ ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में उर्दू व्याख्याता के तौर पर काम शुरू करना पड़ा।

जां निसार साहब की शुरूआती ज़िन्दगी हैरानियों, परेशानियों भरी रही। उन्होंने ज़िन्दगी रहते इतने नाक़ीज़ हालात और तल्ख़ लम्हात को जिया है कि कोई और होता तो खुद-ख़ुशी कर लेता या फिर पागलखाने की रौनक बढ़ा रहा होता। बहुत से माज़ी के नागवार लम्हे उनके आज को खुरचते जा रहे थे। जिस्म और दिमाग तक की बात रहती तो ग़म न था, लेकिन अंजुम से अपने पहले-पहले नकामयाब इश्क ने जां निसार के दिल पर गहरी चोट की। उस चोट का असर इतना था कि अब जां निसार इश्क तो एक तरफ, शादी से भी परहेज़ करने लगे।

मां और बहन की लाख कोशिशें भी बेकार साबित हो रही थीं। जैसे-तैसे घर वालों की सख्ती के चलते एक रोज़ अपने को चारों तरफ से घिरा पाया तो 'साफिया' से निकाह करने को राज़ी हो गए लेकिन इस से पहले कि बात दोनों तरफ से पक्की होती, वह एक बार फिर भाग खड़े हुए। बहुत मुश्किलों से जब काबू में आये तो घर वालों ने 25 दिसम्बर 1943 को प्रसिद्ध शायर ’मज़ाज लखनवी’ की बहन सफ़िया से उनका निकाह करवा ही दिया। शादी के बाद दोनों एक दूसरे के इश्क में गिरफ्तार हो गए। इस कामयाब इश्क और शादी के पीछे जां निसार साहब की चचेरी बहन 'फ़ातेमा' का बहुत बड़ा हाथ था। फ़ातेमा, जां निसार का बहुत ख्याल रखती थीं।

जां निसार को अपने नाज़ उठावाना खूब आता था। रात को निसार को जब भी प्यास लगती, वो कभी खुद पानी पीने नहीं जाते थे, बल्कि सफ़िया को सोते से जगा कर कहते 'ज़रा पानी पिला दो'। 1945 व 1946 में उनके बेटों जावेद अख़्तर और सलमान अख्तर का जन्म हुआ। आज़ादी के बाद हुए दंगों के दौरान जांनिसार ने भोपाल आ कर ’हमीदिया कालेज’ में बतौर उर्दू और फारसी विभागाध्यक्ष काम करना शुरू कर दिया। सफ़िया ने भी बाद में इसी कालेज में पढ़ाना शुरू कर दिया। इसी दौरान वह ’प्रगतिशील लेखक संघ’ के अध्यक्ष बन गए।

जांनिसार अख्तर 1949 में फिल्मों में काम पाने के मकसद से बम्बई (मुंबई) पहुंच गये। वहां वे कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई और मुल्कराज आनंद जैसे लेखकों के संपर्क में आये। उनके संघर्ष के दिनों में सफ़िया भोपाल से उन्हें बराबर मदद करती रहीं। 1953 में कैंसर से सफ़िया की मौत हो गई। 1956 में उन्होंने ’ख़दीजा तलत’ से शादी कर ली। 1955 में आई फिल्म ’यासमीन’ से जांनिसार के फिल्मी करियर ने गति पकड़ी तो फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। फिल्मों के लिए लिखे गये, उनके कुछ प्रसिद्ध गीत है- 'आंखों ही आंखों में इशारा हो गया', 'ग़रीब जान के हमको न तुम दगा देना', 'ये दिल और उनकी निगाहों के साये', 'आप यूं फासलों से गुज़रते रहे', 'आ जा रे ओ नूरी' आदि। कमाल अमरोही की फिल्म 'रज़िया सुल्तान' के लिए लिखा गया गीत 'ऐ दिले नादां' उनका आखिरी गीत था।

पहचान में कुछ ऐसे थे जांनिसार अख़्तर, बिखरे-बिखरे खिचड़ी बाल, उनको सुलझातीं उंगलियां, होठों के बीच सिगरेट, चौड़े पांएचे का पाजामा और मोटे कपड़े की जवाहर जैकेट। उसी टोली का एक बड़ा नाम, जब उन्नीस सौ तीन के दशक में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में एक साथ जांनिसार अख़्तर, सफ़िया मजाज़, अली सरदार जाफ़री, ख़्वाजा अहमद अब्बास और इस्मत चुग़ताई जैसे दिग्गज पढ़ रहे थे। कृष्ण चंदर लिखते हैं, 'जांनिसार वो अलबेला शायर है, जिसको अपनी शायरी में चीख़ते रंग पसंद नहीं हैं बल्कि उसकी शायरी घर में सालन की तरह धीमी-धीमी आंच पर पकती है।' संगीतकार ख़य्याम कहते हैं कि जांनिसार अख़्तर में अल्फ़ाज़ और इल्म का खज़ाना था।

फ़िल्म रज़िया सुल्तान में जांनिसार ने ऐ दिले नादां गीत के छह-छह मिसरों के लिए कम से कम कुछ नहीं तो सौ अंतरे लिखे। एक-एक गीत के लिए कई मुखड़े लिख कर लाते थे वो और ज़्यादा वक्त भी नहीं लगता था उनको गीत लिखने में। वो बहुत ही माइल्ड टोन में गुफ़्तगू करते थे और अपने शेर भी माइल्ड टोन में पढ़ा करते थे। 

जांनिसार के जानने वाले कहते हैं कि वो मुशायरे के शायर नहीं थे। उनका तरन्नुम भी अच्छा नहीं था। उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के सबसे हसीन साल साहिर लुधियानवी की दोस्ती में गर्क किए। वो साहिर के साए में ही रहे और साहिर ने उन्हें उभरने का मौका नहीं दिया लेकिन जैसे वो ही साहिर की दोस्ती से आज़ाद हुए उनमें और उनकी शायरी में लाजवाब परिवर्तन हुआ। उसके बाद उन्होंने जो लिखा, उस से उर्दू शायरी का हुस्न निखर उठा-

'जब शाख कोई हाथ लगाते ही चमन में, शर्माए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो, ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर, नद्दी कोई बलखाये तो लगता है कि तुम हो'

जां निसार ने अपने ख़त में लिखा है 'आदमी जिस्म से नहीं दिलो दिमाग से बूढ़ा होता है।' वह वास्तव में आखिरी दिनों तक जवान रहे। नौजवानों की तरह रात में देर तक चलने वाली महफ़िलों और बाहर के मुशायरों में अपने आपको लुटाते, हंसाते रहे।

'और क्या इस से ज्यादा कोई नर्मी बरतूं, दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह। और तो मुझको मिला क्या मेरी महनत का सिला, चन्द सिक्के हैं मेरे हाथ में छालों की तरह।'

साफिया की असमय कैंसर से मृत्यु पर उनकी कालजयी नज़्म 'खाके दिल' में बिलकुल अलग लहजे में उन्होंने कमाल की रुबाइयां लिखीं-

आहट मेरे क़दमों की सुन पाई है, इक बिजली सी तनबन में लहराई है, दौड़ी है हरेक बात की सुध बिसरा के रोटी जलती तवे पर छोड़ आई है, डाली की तरह चाल लचक उठती है,  खुशबू हर इक सांस छलक उठती है, जूड़े में जो वो फूल लगा देते हैं

अन्दर से मेरी रूह महक उठती है, हर एक घडी शाक (कठिन) गुज़रती होगी, सौ तरह के वहम करके मरती होगी, घर जाने की जल्दी तो नहीं मुझको मगर...वो चाय पर इंतज़ार करती होगी

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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