मां के घोल में दुख, सुख और आँसुओं का मिश्रण: लक्ष्मीनारायण पयोधि

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कवि-कथाकार लक्ष्मीनारायण पयोधि हमारे समय में मझोली पीढ़ी के उन गंभीर सर्जकों में से एक हैं, जिन्होंने विभिन्न विधाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। पयोधि की रचना-प्रक्रिया में हर चीज़ समग्रता में आती है।

लक्ष्मीनारायण पयोधि के कविता संग्रह 'अंत में बची कविता' की चर्चा में आलोचक डा. धनंजय वर्मा लिखते हैं - 'कविता मनुष्य को सृजित करने के क्रम में बुनियादी रूप से बदलना चाहती है। यह महज संयोग नहीं है कि इस संग्रह की कविताओं में ऋषि, मंत्र, आरण्यक आदि शब्द आते हैं। कोई भी शब्द अपने आप में संपूर्ण नहीं होता है। उसके पीछे एक चेतना विद्यमान होती है।

'शब्द को कामधेनु' बना कर उसके थनों से इच्छित अर्थ-ध्वनियाँ दुह लेने की कामना भी संयोग मात्र नहीं, बल्कि यह एक साधक की सृजन-सामर्थ्य है।' डा. कुसुमलता केडिया लिखती हैं - लक्ष्मीनारायण पयोधि का काव्य इस वीभत्स के साधना-समय में मंत्र-सृष्टा का नादवीर्य है। उनकी प्रतिभा उम्र की सीमाओं से परे है। 

कवि-कथाकार लक्ष्मीनारायण पयोधि हमारे समय में मझोली पीढ़ी के उन गंभीर सर्जकों में से एक हैं, जिन्होंने विभिन्न विधाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। पयोधि की रचना-प्रक्रिया में हर चीज़ समग्रता में आती है। आलोचक डा. धनंजय वर्मा के अनुसार पयोधि का काव्य यक़सानियत के इस दौर में अलग 'फिंगर प्रिंट' वाला है-

गीले छैनों1में बजबजाते कीड़े
डूमर2 के पके फल को खोलने पर जैसे
फिर भी रोज़ की तरह
बीन रही हूँ कि छूटे नहीं आदत
कि टूटे नहीं नियम बीनने का
वहाँ बीनने होंगे महू3 और सपने भी
खेतों में रुगबुग-रुगबुग फूल उठे सरसों
और विहँसने लगे गेंदा झपझप-झपझप
संकेत से बुलाने लगे
लालभाजी के सफ़ेद फूल
तोड़ भी नहीं पाऊँगी भाजी
कि लेने मुझे आ जायेंगे ससुर या जेठ
डरती हूँ लेकिन मैं जाने से
साथ ससुर या जेठ के
उठ गया घूँघट कहीं रस्ते में
तो लगा देगी पंचायत मर्यादा भंग का आक्षेप
और भोगना पड़ेगा दण्ड बिरादरी से निष्कासन का
लिटिया4,जा कह दे मेरे प्रियतम से
कि न भेजे मुझे लेने ससुर या जेठ को
ख़ुद आये और ले जाये
जैसे ले गये थे ब्याहकर
ले जाये साथ अपने
कि रास्ते में बरगद की छाँव में झूल सकें
झूला गाते हुए बिरहा5
लिटिया,साथ तू भी चलना
कि बरगद की सबसे ऊँची फुनगी से
तोड़कर दे सके तू मीठे फल
कि मिलकर खायेंगे
और उत्सव मनायेंगे
चल,अभी तो चलें घर
चावल के आटे से बनायें पेज6
और करें इंतज़ार प्रियतम का
रुगबुग-रुगबुग फूलने लगे सरसों
और गेंदा भी विहँस उठे झपझप
(1 गोबर के कंडे 2 गूलर 3 महुआ 4 लीटी नाम का पक्षी 5 गोंड जनजाति की एक गायनशैली 6 एक पेय)

लक्ष्मीनारायण पयोधि के कविता संग्रह 'अंत में बची कविता' की चर्चा में आलोचक डा. धनंजय वर्मा लिखते हैं - 'कविता मनुष्य को सृजित करने के क्रम में बुनियादी रूप से बदलना चाहती है। यह महज संयोग नहीं है कि इस संग्रह की कविताओं में ऋषि, मंत्र, आरण्यक आदि शब्द आते हैं। कोई भी शब्द अपने आप में संपूर्ण नहीं होता है। उसके पीछे एक चेतना विद्यमान होती है। पयोधि की कविताओं में चेतना का विस्फोट है-

छुटपन से लीपती रही घर-आँगन
सिखाया माँ ने कि घोल में कितना हो अनुपात
गोबर, छुई1 और पानी का
कि होता जीवन में जैसे
दुख, सुख और आँसुओं का मिश्रण
अनुपात हो सही-सही
कि घोल से खिल उठे घर की दीवारें
फ़र्श और आँगन
कि उकेरे जा सकें चीन्हा2
बना सकें प्रकृति को घर का हिस्सा
छुटपन से चुनती रही बाड़ी में भाजियाँ
कि जैसे आँखों में नये उगे सपने
हर सपने का अलग स्वाद,जैसे हर भाजी का
गा रही मामा की बेटी...
चल रहा बिरहा3 का आलाप...
"करौंदे4 की बाड़ी में चुभ गया काँटा
और गाँव भर में बजने लगे बाजे
तू आजा, डिण्डोरी5 के हाट मनमीत,
ख़रीदेंगे मनपसंद नया लुगड़ा6
और सिलवायेंगे सुंदर पोलका7"
कैसे जाये हाट मनमीत
गाँठ में नहीं कौड़ी एक
रात का बासी खाया,पेज8 का तूम्बा9 खाली
प्यार तो बेशुमार, मगर दिल में नहीं उमंग ज़रा
होंठों पर आये हँसी कैसे
गा रही मामा की बेटी10--
"करौंदे की बाड़ी में चुभ गया काँटा
और गाँव भर में बज रहे बाजे"
चल रहा बिरहा का आलाप....

(1 सफ़ेद मिट्टी 2 भित्ति चित्र 3 गोंड जनजाति की एक पारंपरिक गायन शैली 4 एक गाछ 5 मध्यप्रदेश का एक नगर 6 साड़ी 7 ब्लाउज 8 अनाज से तैयार पेय 9 सूखी लौकी का पात्र,जिसमें पेय पदार्थ रखे जाते हैं 10 द्रविड़ संस्कृति में मामा की बेटी से विवाह का चलन है)

'शब्द को कामधेनु' बना कर उसके थनों से इच्छित अर्थ-ध्वनियाँ दुह लेने की कामना भी संयोग मात्र नहीं, बल्कि यह एक साधक की सृजन-सामर्थ्य है।' डा. कुसुमलता केडिया लिखती हैं - 'लक्ष्मीनारायण पयोधि का काव्य इस वीभत्स के साधना-समय में मंत्र-सृष्टा का नादवीर्य है। उनकी प्रतिभा उम्र की सीमाओं से परे है। शब्द को सिद्ध कर उसे मंत्र बनाना या शब्द से जीवन रचकर उसके नादवीर्य से दिक्काल को गुँजा देने की कामना करना कविता में बहुत सहज घटना नहीं है।'

लक्ष्मीनारायण पयोधि का जन्म एक अत्यंत निर्धन तेलुगूभाषी कृषक परिवार में हुआ। माता-पिता आज भी तेलुगू के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं बोल सकते हैं।

निखर गया रूप-यौवन भरपूर
राँजी करोला झाड़ी लद गयी फलों से
रस-गंध पर मुग्ध पंछी कितने ही
मँडराने लगे गाछ के आसपास
आश्रय की तलाश में
या चोंच मारने के अवसर की आस में
राँजी करोला
तेरे फलने से फैल गया
जंगल में उल्लास
जैसे मधुमास
हवा में घुल गया नया आनंद
पत्तों के बज उठे फिर जलतरंग
नदियों का बढ़ गया उछाह
पहाड़ों के मुख पर खिली हरी-हरी मुस्कान
गोंड युवा गा उठे डँडार1 और झाँझ पाटा2--
"ओ प्रिये, राँजी करोला3 जैसी तू
सुघड़ सलोनी और रसीली
पैरों में बाँधकर घुँघरू
आ, और नाच मेरे साथ
कि आधा बरार4 जीत लेंगे हम"
तू आ, कि आया राँजी करोला का मौसम
राँजी करोला,तू फलते रहना हमेशा
कि मुग्ध पंछी मँडरायें हमेशा तेरे आसपास
कि चाँदनी रात में नाचें मिल डँडार
कि छलकने लगे आँखों से प्यार
कि कंठों से बहता रहे झाँझ पाटा
कि जंगल का बना रहे उल्लास
कि बचा रहे युवकों में
आधा बरार जीत लेने का उत्साह
ओ राँजी करोला

(1गोंड जनजाति में प्रचलित नृत्य-गान शैली 2 ढोल-मंजीरों के साथ गाया जाने वाला गीत 3 एक जंगली झाड़ी, जिसका फल चिकना और सुंदर होता है 4 पुराने मध्य भारत प्रांत के लिये प्रचलित नाम-सी पी एण्ड बरार।)

अविभाजित मध्यप्रदेश के बस्तर अंचल के सीमावर्ती ग्राम भोपालपटनम् में पले-बढ़े पयोधि ने वहाँ के गोंडी परवेश में रहते हुए जनजातीय संस्कृति और भाषाओं को क़रीब से देखा। वहीं से उस संस्कृति की विशेषताओं के प्रति आकर्षण और जिज्ञासा-भाव विकसित हुए, जो बाद में उनके साहित्य और जनजातीय संस्कृति एवं भाषा सम्बन्धी शोध की आधारभूमि बने। पयोधि के प्रथम प्रकाशित काव्य-पुस्तक 'सोमारू' (1992) की संपूर्ण काव्यवस्तु जनजातीय जीवन-संस्कृति पर केन्द्रित है और इसी विशेषता के कारण उसे तब हिन्दी कविता में नये प्रयोग के रूप में रेखांकित किया गया था। उसका मराठी और अंगरेज़ी में अनुवाद भी हुआ। पयोधि की एक ताजा कविता है 'जगनी पुंगार' -

खेत में खिले पीले जगनी पुँगार1

तेरे होंठों पर जैसे हँसी के फूल

बेर का झाड़ झूम रहा फूलों के पास

और काँटों में उलझ गया मेरा नाज़ुक-सा दिल

बैरी जैसा बर्ताव है बेर का जमोला2

काँटे उसके निष्ठुर करते आघात

तुम खिलखिलाना ज़रूर

मगर रखना ज़रा काँटों से फ़ासला

तुम्हारी खिलखिलाहट से देखो तो

हवा कितनी हतप्रभ,या कि मंत्रमुग्ध

तुम्हारी हँसी की सुगंध से

महक रहा जंगल ओ जमोला

गलबाँहे डाल इठलाती हवा के साथ

जाना तुम्हारी हँसी का नदी की ओर

भाता होगा जगनी पुँगार को

मेरा तो रोज़ ही जलता दिल

तुम धँस जाती जब कभी जल में

फैल जाती लहरों के वर्तुल में रोशनी

धूप मलने लगती तुम्हारी देह

और पानी का रंग हो जाता सुनहला

मत जाना नदी की ओर मेरी जमोला

सूरज देखता तुम्हें बादलों की ओट से

और पेड़ सब लाज से फेर लेते मुँह

खेत में खिल गये जगनी पुँगार

तुम आओ और खिलखिलाओ

कि गूँजे फिर दिशाओं में बिरहा3 की धुन

बेर के झाड़ में उलझा मेरा दिल

मिला सके सुर हँसी की रागिनी पर

तुम खिलना-खिलखिलाना

मगर रखना ज़रा फ़ासला बैरी काँटों से

ओ मेरी जमोला

(1 जगनी नामक पौधे का फूल 2 गोण्ड स्त्री का नाम 3 एक पारंपरिक गोण्डी धुन।)

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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