निवेश के साइड इफेक्ट !

क्यों बिगड़ते हैं निवेश के बाद हालात ?कब जरूरी है निवेश ?निवेश के दौरान क्या करें, क्या ना करें

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आए दिन कोई ना कोई कंपनी किसी दूसरी कंपनी में निवेश करती रहती हैं। इसमें कोई गलत बात भी नहीं है क्योंकि ज्यादातर कंपनियों को निवेश की जरूरत होती है ताकि वो अपना काम और बेहतर तरीके से कर सकें। किसी कंपनी का किसी दूसरी कंपनी में निवेश करना एक तरह के विवाह के समान होता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं की असली चुनौती हनीमून के बाद आती है ठीक यहां भी निवेश के बाद नई समस्याएं पैदा होती है और तभी किसी कंपनी के संबंधों की असली कहानी शुरू होती है।

आज हम आपको निवेश से जुड़े उन तथ्यों के बारे में बतायेंगे जिनकी जानकारी निवेश चाहने वाले उद्यमियों के लिये जरूरी है। हालांकि कुछ लोग ऐसी कहानियों के बारे में पहले से भी जानते हों। बावजूद कई बार निवेश के बाद दुखद स्थिति पैदा हो जाती है जिसके कई कारण होते हैं और चीजें सही दिशा में नहीं जाती।

टैक्समंत्रा के संस्थापक आलोक पठानिया ने एक लंबा सफर तय किया है। उन्होने साल 2010 में केपीएमजी को छोड़कर खुद का उद्यम शुरू करने का फैसला लिया। तब उनको निवेश की पेशकश की गई थी लेकिन मुश्किल शर्तों के साथ 10 से 15 लाख रुपये का ही निवेश का ऑफर हुआ। आलोक के मुताबिक “वहां पर कई तरह की शर्तें रखी गई और संभावित निवेशक के साथ कई दौर की बातचीत हुई। इसके बाद मैंने देखा कि इतने पैसों के लिए मुझे कई बाधांओं का सामना करना पड़ेगा। जिसके बाद मैंने अपना इरादा बदल दिया।” उनके मुताबिक केपीएमजी और Ernst and Young के कारण उनको चीजों को बारीकी से समझने में आसानी हुई जो समझौते की टर्म शीट में मौजूद थी। आज आलोक कई उद्यमियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। पिछले साल उनकी कंपनी ने 15 हजार रुपये का रिटर्न दाखिल किया था। वो कई बार देखते हैं कि उद्यमी समझौते की शर्तों का बारीकी से अध्ययन नहीं करते।

आलोक ने हाल ही में देखा कि एक कंपनी में उसके संस्थापक को कंपनी छोड़ने को कहा गया। एक दिन जब वो अपने ऑफिस आया तो उसकी ई-मेल आईडी को ब्लॉक कर दिया गया था और उसे 24 घंटे के भीतर कंपनी छोड़ने का नोटिस थमा दिया गया था। उस संस्थापक ने पिछले छह महिनों के दौरान कोई सैलरी भी नहीं ली थी और उसने ये रकम अपने उद्यम को बढ़ाने में ही लगा दी थी। दरअसल उस संस्थापक, निवेशक और सह-संस्थापक के बीच मतभेद की मुख्य वजह ये थी कि ये लोग कंपनी को बेचना चाहते थे क्योंकि निवेशक को ऐसा करने से फायदा हो रहा था। जबकि ये संस्थापक ऐसा नहीं करना चाहता था वो अपनी कंपनी को और आगे बढ़ाना चाहता था उसके बाद उसका इरादा दूसरे विकल्प ढूंढने का था। वो नहीं जानता था कि एक दिन उसे ही इस तरह कंपनी से बाहर कर दिया जाएगा। इसलिए जरूरी है कि कभी भी कोई समझौता करते वक्त टर्म शीट को सावधानी से पढ़ना चाहिए। आपको निवेशक से जितने ज्यादा प्रश्न हों पूछने चाहिए जैसा कि वो आपसे भी पूछता है। ज्यादातर उद्यमी ये देखते हैं कि कोई उनकी कंपनी में कितना पैसा लगाने को इच्छुक है, लेकिन इस प्रक्रिया में ज्यादातर बातें छुपी रह जाती हैं।

अमन नारंग जो सह-संस्थापक हैं erstwhile के। इससे पहले उन्होने Giftology को अपने लंबे तजुर्बे के बाद खड़ा किया और उसमें निवेश का भी इंतजाम किया लेकिन इतना सब होने के बावजूद उनको ये बंद करना पड़ा। अमन के मुताबिक निवेश एक धीमे जहर के समान है। ये आप ही तय करते हो कि आपसे कौन पैसा ले जाएगा। अमन को भी एक एनआरआई मिला जिसने 50 मिलियन डॉलर उनके उद्यम में डाले, लेकिन उसको भारत के बाहर कारोबार कैसे करना है इसकी समझ नहीं थी, जिसके बाद वो बैठ गया। अमन के मुताबिक हमारे यहां निवेशक पश्चिमी देशों के बाजार से तुलना करते हैं। जबकि भारत का बाजार अभी बिखरा हुआ है। इसके अलावा यहां की अप्रोच पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है और ये बात निवेशक को बिल्कुल भी समझ में नहीं आती। अमन सलाह देते हैं कि कोई प्रतिबद्धता करने से पहले दस बार सोचना चाहिए उनके मुताबिक जब तक निवेश की बहुत ज्यादा जरूरत ना हो तब तक इससे बचा जाना चाहिए। कंपनी में निवेश की जगह पहले खुद को कोशिश करनी चाहिए।

बी के बिरला जो सह-संस्थापक हैं ZopNow के। उनके विचार से जब तक निवेश की बहुत ज्यादा जरूरत ना हो तब तक इसके लिए कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। निवेशक और उद्यमी में कई तरह की शर्तें लागू होती हैं। जैसे कभी कंपनी को बेचने या बंद करने के हालात आए तो निवेशक को सबसे पहले उसका पैसा मिलेगा इसके साथ-साथ ऐसा करने से अगर फायदा हुआ तो निवेश का 50 से 100 प्रतिशत तक का हिस्सा भी उसकी जेब में जाएगा। इसके बाद बचा हुआ पैसा शेयरहोल्डर में बंटेगा। दूसरी शर्त के मुताबिक अगर कोई दूसरी बार कम वैल्यूएशन पर बाजार से पैसा उठाता है तो निवेशक को मुफ्त में कंपनी के शेयर मिलेंगे क्योंकि नए वैल्यूएशन के हिसाब से उनके निवेश की कीमत भी कम हो जाती है। उदाहरण के लिए कोई निवेशक किसी कंपनी में 20 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से 100 रुपये निवेश करता है जिसके बाद कंपनी फिर से 10 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से बाजार से पैसा उठाती है तो निवेशक की लागत प्रति शेयर 10 रुपये हो जाती है और उसे 5 शेयर मुफ्त में भी मिलते हैं। इन शेयर का पैसा संस्थापक को चुकाना होता है। एक दूसरी शर्त के मुताबिक महत्वपूर्ण विषयों में फैसला लेते वक्त निवेशक की भी राय पूछी जाएगी। इतना ही नहीं कंपनी में दोबारा निवेश के लिए निवेशक की मंजूरी भी जरूरी होती है। लेकिन इसमें असली पेंच तब फंसता है जब कंपनी की वैल्यूएशन को लेकर संस्थापक और निवेशक की एक राय नहीं बन पाती या निवेशक कंपनी से बाहर निकलना चाहता है। इस कारण कई डील बर्बाद हो जाती हैं। इसके अलावा कई बार निवेशक के पास बहुमत लायक शेयर नहीं होते हैं तो वो दूसरे शेयरहोल्डर पर अपने शेयर बेचने का दबाव डालते हैं। कई बार तो ये दबाव संस्थापकों पर भी डाला जाता है। एक अन्य शर्त के मुताबिक संस्थापक अपने शेयर बेच तो सकते हैं लेकिन कंपनी नहीं छोड़ सकते जबकि निवेशक के पास कंपनी छोड़ने की आजादी होती है। ये हालात उस वक्त खतरनाक होते हैं जब निवेशक के पार बहुमत लायक शेयर होते हैं। कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है कि निवेशक अपने शेयर किसी बड़ी कॉरपोरेट कंपनी को बेच संस्थापक को अकेला छोड़ देते हैं।

शांति मोहन फिलहाल संस्थापक हैं LetsVenture की। उन्होने सह संस्थापक के तौर पर बेंगलौर में 1988 में Ionic Microsystems की स्थापना की थी जहां से वो साल 2003 में बाहर आ गई। एक दौर था जब उन्होने ग्लोबल टेक्नॉलिजी और वेस्ट ब्रिज कैपिटल से निवेश भी हासिल किया था। उस दौरान वो भी पैसा जुटाने के लिए उन सारी प्रक्रियाओं से गुजरी और आज अपने उद्यम में फिर से पैसा जुटाने की तैयारी में हैं। उनके मुताबिक अगर कोई संस्थापक बुरा सौदा करता है तो उसके लिए निवेशक जिम्मेदार नहीं हो सकता। कोई भी निवेशक जबरदस्ती उस डील साइन नहीं करा सकता जिसे उद्यमी नहीं माने। निवेशक को कोसने से पहले उद्यमी अपने लिए गए फैसलों और मजबूरी को भूल जाते हैं। शांति का कहना है कि जिस तरह अपने उद्यम में हर अच्छी चीज के लिए आप जिम्मेदार होते हैं ठीक उसी तरह हर बुरी चीज की भी जिम्मेदारी आपको उठानी चाहिए। वो कई ऐसे लोगों को जानती हैं जिन्होने कंपनी में निवेश के बाद बाद महंगी कारें तक खरीदी और बाद में कंपनी को बंद करना पड़ा। इसलिए हर चीज के लिए निवेशक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। शांति उद्यमियों को सलाह देती हैं कि जब भी निवेश का फैसला लें तो सोच समझ कर लें। हालांकि शांति ऐसे उद्यमी को भी जानती हैं जब उसके उद्यम में पैसा लगाने के बाद छह महिने के अंदर निवेशक आय के बारे में दबाव बनाने लगा। इससे निवेशक का बुरा असर कंपनी पर पड़ने लगा।

यहां पर कुछ जरूरी जानकारियां दी गई है जब किसी उद्यम में निवेश से ध्यान रखनी चाहिए।

1. बिना कारण निवेश तो नहीं कर रहे ? क्या निवेश की वाकई में जरूरत है ?

2. आप जिससे निवेश हासिल कर रह हैं क्या वो आपके लिए सही है ? क्योंकि कई बार दो अलग अलग लोग अच्छा काम करते हैं लेकिन मिलकर ऐसा संभव नहीं हो पता।

3. क्या डील करने से पहले फाइन प्रिंट को पढ़ा गया है? क्या आप डील से जुड़ी हर बात अच्छी तरह समझ गए हैं ?

4. आप निवेशक को पार्टनर की भूमिका में देखते हैं या इससे बढ़कर ? क्या आपने कभी कभी कोशिश की कि ये पार्टनरशिप बेहतर काम करे ?

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