लखनऊ से ‘इनमोबी’ तक, ऐड टेक वर्ल्ड के महारथी 'मोहित'

बचपन से ही इंजीनियर बनने का सपना देखने वाले मोहित ने इंजीनिरिंग के दूसरे वर्ष में वैकल्पिक विषय के रूप में सी++ को चुना ...अमरीका में वर्जिन मोबाइल में नौकरी के दौरान दोस्तों के साथ मिलकर कंपनी बनाने की ठानी ...एमखोज के नाम से कंपनी शुरू की और एप्प के बढ़ते चलन को भांपते हुए विज्ञापन की दुनिया में रखा कदम...भारत को एक बढ़ते हुए बाजार में देखा और मुंबई और बैंगलोर में आकर डाली ‘इनमोबी’ की नींव

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मोहित सक्सेना, सहसंस्थापक, इनमोबी
मोहित सक्सेना, सहसंस्थापक, इनमोबी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पले बढ़े मोहित ने 80 के दशक में अपने बचपन के दिन क्रिकेट और कंचे खेलते हुए बिताए। मोहित को पतंग उड़ाने के बहुत शौक था और उसने इसमें खासी महारत हासिल करते हुए कुछ प्रतियोगिताओं में भाग लेकर उन्हें जीता भी था। मोहित के पिता उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य विभाग के कार्यरत थे और वे नौकरी के सिलसिले में अधिकतर यात्रा पर ही रहते थे। उन्होंने अपना अधिकतर समय अपनी माँ के सानिध्य में गुजारा और इसी वजह से उनके जीवन में उनकी माँ का बहुत प्रभाव है। मोहित बचपन से ही इंजीनियर बनना चाहते थे लेकिन उन्हें किस क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करनी चाहिये इसको लेकर वे कुछ निश्चित नहीं थे।

मोहित सक्सेना, बैठी हुई पंक्ति में बाएं से चौथे
मोहित सक्सेना, बैठी हुई पंक्ति में बाएं से चौथे

अपने बचपन की इंजीनियरिंग के जुनून से जुड़ी यादों को ताजा करते हुए उन्हें एक पुराना किस्सा याद आता है जब उन्होंने साइकिल काम कैसे करती है यह देखने के लिये उसके अंजर-पंजर खोलकर अलग कर दिये लेकिन जब उन्हें वापस जोड़ने की बारी आए तो उन्होंने अपने हाथ खड़े कर दिये। उन्होंने उस खुली हुई साइकिल को एक चादर में लपेटा और एक मिस्त्री के पास लेजाकर दोबारा ठीक करवाया। सौभाग्य से उनकी माँ को उनकी इस हरकत के बारे में कुछ भी पता नहीं चला।

जेईई की परीक्षा क्लियर करने के बाद उन्हें रुड़की और बीएचयू की प्रतिष्ठित आईआईटी के लिये चुन लिया गया। हालांकि वे ‘अभिजात्य’ मानी वाली शाखाओं मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रोनिक्स और संचार या कंप्यूटर विज्ञान को नहीं चुन पाए। हिम्मत न हारते हुए उन्होंने उसी वर्ष आईआईटी रुड़की में धातु और सामग्री विज्ञान इंजीनियरिंग( Metallurgical and Material Sciences engineering) को चुनते हुए उसमें दाखिला ले लिया। हालांकि आईआईटी में उनका पहला वर्ष खासा शांत रहा लेकिन चीजें एक दिलचस्प मोड़ लेने ही वाली थीं।

उनके अधिकतर मित्र और संगी साथी कंप्यूटर विज्ञान और आईटी के वर्ग के थे और उनमें शामिल होने के लिये मोहित ने दूसरे वर्ष में वैकल्पिक विषय के रूप में सी++ को चुन लिया। वे इसमें पूरी तरह से रम गये ओर इसमें एक अतिरिक्त लाभ यह भी था कि कंप्यूटर लैब एक नवनिर्मित इमारत में स्थित थी जिसमें एयर कंडीशनिंग की सुविधा भी थी। इस वजह से वह जगह सोने के लिये भी एक अच्छी जगह के रूप में इस्तेमाल होती थी। कुल मिलाकर देखा जाए तो उनका यह निर्णय उनके जीवन को बदलने वाला निर्णय रहा।

इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद मोहित को टाटा स्टील में नौकरी मिल गई। हालांकि मोहित ने व्यावसायिक विभाग में काम करने के स्थान पर कंप्यूटर विभाग में काम करने को तरजीह दी। वहां पर चीजों को और अधिक कुशलतापूर्वक चलने में मदद करने के लिये उन्हें स्वचलित करने वाली एक परियोजना पर काम चल रहा था और श्रमिक संगठनों को डर था कि इस स्वचालन के लागू होते ही उनकी नौकरियों पर खतरा मंडराने लगेगा। नौ महीने के अपने छोटे से कार्यकाल के दौरान वहां चलने वाले संघर्ष के माहौल ने मोहित को बहुत कुछ सिखाया। इसके बाद मोहित ने एटीएण्डटी पैकबैल लैब्स में नौकरी कर ली और 1998 में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर वह अपनी पहली अमरीका यात्रा पर निकल पड़े।

एटीएण्डटी के बाद मोहित अमरीका में नया-नया प्रवेश करने वाली कंपनी वर्जिन मोबाइल में शामिल हो गए। एकटीएण्डटी के विपरीत वहां का माहौल बिल्कुल एक स्टार्टअप वाला था और हल करने के लिये समस्याओं का अंबार लगा रहता था। वर्जिन मोबाइल अमरीका की प्रारंभिक टीम बहुत छोटी थी और मोहित संचालन में लगी टीम को संभाल रहे थे। बस यही पर उन्होंने सिस्टम स्केलिंग में अपने हाथ डाले और उन्हें एक ऐसा अनुभव प्राप्त हुआ जो बाद में ‘इनमोबी’ में उनके बहुत काम आया।

वह वर्ष 2007 का समय था जब मोहित की मुलाकात नवीन तिवारी, अमित गुप्ता और अभय सिंघल से हुई। उन्होंने एक साथ आते हुए मोबाइल फोन के उभरते हुए बाजार में एक उद्यम शुरू करने का फैसला किया। इन्होंने ‘एमखोज’ के नाम से एक कंपनी की नींव डाली और जब इन्होंने एप्लीकेशन के बाजार को बढ़ते हुए देखा तो इन्होंने विज्ञापन के काम को अपना मुख्य आधार बना लिया।

इसके बाद इन्होंने भारतीय बाजार को लक्षित करने के लिये मुंबई का रुख किया। मोहित बताते हैं, ‘‘जब आप इसके बारे में सोचने बैठते हैं तो दूसरे लोगों तक अपनी इस बात को पहुंचाना बहुत मुश्किल होता है।’’ अमरीका से मुंबई आने और यहां पर एक कार्यालय स्थापित करने में मोहित ने सिर्फ 15 दिन का समय लिया। जल्द ही यह टीम बैंगलोर आ गई जहां पर तकनीकी स्टार्टअप्स के लिये बेहतर माहौल और समर्थन प्रणाली मौजूद थी।

मोहित ने ‘इनमोबी’ के लिये पहला एड सर्वर कोडित किया और तब से ये प्रौद्योगिकी के शीर्ष पर बने हुए हैं। वे जटिल संरचनाओं के बड़े पैमाने पर बनने वाले ब्लू-प्रिंट या रूपरेखा को तैयार करने में माहिर हैं। हालांकि वे खुद को सामान्य कहलाना पसंद करते हैं लेकिन जल्द ही वे इस बात को भी साफ कर देते हैं कि यह शब्द हर किसी के लिये काम नहीं करता है। ‘‘प्रारंभिक दिनों में वह बुनियादे बातें ही हैं जो काम आती हैं।’’

जब ‘इनमोबी’ में प्रौद्योगिकी से जुड़े पदों पर नियुक्तियों की बात आती है तो मोहित कहते हैं कि वे प्रत्येक चयनित सदस्य से स्वयं मिलते हैं और यह 8 से 9 चरणों तक चलने वाली एक बेहद कठिन प्रक्रिया है। वे चुटकी लेते हुए कहते हैं, ‘‘मेरे ख्याल से अगर मैं इस कंपनी का सहसंस्थापक नहीं होता तो मेरे लिये भी साक्षातकार का दौर पार करना ही नामुमकिन होता।’’

वर्तमान में साफ्टवेयर इंजीनियरों के मैनेजर बनने की बढ़ती हुई घटनाओं के पर रोशनी डालते हुए मोहित कहते हैं, ‘‘एमबीए करना कभी भी मेरी प्राथमिकताओं में नहीं रहा और मैं हमेशा से ही कुछ तकनीकी काम करते हुए प्रणालियों को विकसित करना चाहता था। जब भी मुझे एमबीए की आवश्यकता महसूस होगी मैं अपनी जरूरत पूरी करने के लिये उनको नौकरी पर रखने में सक्षम हूँ। मेरे पास ऐसे लोग हैं जो पिछले 12 वर्षों से कोडिंग कर रहे हैं और अभी भी थके नहीं हैं। मेरी नजरों में एक अच्छा साॅफ्ट वेयर इंजीनियर किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं है। मैं अपने जीवन में कोडिंग को सबसे अधिक प्यार करने वाले इंजीनियर को अपना सबकुछ खुशी-खुशी देना पसंद करूंगा।’’

‘इनमोबी’ के अलावा मोहित कैंसर सेवाओं के साथ भी जुड़े हुए हैं। यह सब वर्ष 2012 में उस समय शुरू हुआ जब उन्हें अपनी माँ के चैथे स्तर के स्तन कैंसर से पीडि़त होने का पता चला। वे कहीते हैं, ‘‘हमने खुद को पढ़े-लिखे मूर्खों की तरह महसूस किया। इसके बारे में जानकारी होने के बावजूद मैं अपने परिजनों को नियमित परीक्षणों के लिये नहीं ले जा पाया।’’ सौभाग्य से समय पर हुए हस्तक्षेप की वजह से वे इस बीमारी से उबरने में सफल रहीं लेकिन वह समय पूरे परिवार के लिये बहुत तनावपूर्ण रहा। अब वे नियमित रूप से लोगों की मदद करते हैं। इसके अलावा ‘इनमोबी’ एसवीजी कैंसर अस्पताल के लिये अपने स्तर से धन भी जुटाता है।

भविष्य के बारे में बात करते हुए मोहित कहते हैं कि ‘इनमोबी’ को दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनी बनाना चाहते हैं और इस लक्ष्य को पाने के लिये वे कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

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Worked with Media barons like TEHELKA, TIMES NOW & NDTV. Presently working as freelance writer, translator, voice over artist. Writing is my passion.

Stories by Nishant Goel