ऑटिज्म के इलाज में काफी मददगार है आंखों का टेस्ट

0

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा उपकरण खोजा है जिसकी मदद से ऑटिज्म का इलाज आसानी से किया जा सकेगा। आंखों का टेस्ट करने वाला यह यंत्र मस्तिष्क के उस हिस्से की जानकारी का संकेत दे सकता है जहां इस तरह के विकार पनपते हों।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अॉटिज्म से निजात पाना एक चुनौतीपूर्ण काम है। केवल निजात ही नहीं बल्कि इसके इलाज को ठीक ठंग से करना भी किसी चुनौती से कम नहीं।

रोचेस्टर मेडिकल सेंटर डेल मोंटे न्यूरोसाइंस संस्थान में हुई रिसर्च में एक ऐसे उपकरण की खोज की गई है जो चिकित्कों को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार यानी कि एएसडी जैसी बीमारियों से निजात पाने में सहायक होता है। आंखों का टेस्ट करने वाला यह यंत्र मस्तिष्क के उस हिस्से की जानकारी का संकेत दे सकता है जहां इस तरह के विकार पनपते हो। संस्थान के निदेशक और इस अध्ययन के सह-लेखक फॉक्स् के मुताबिक, 'हम लंबी रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पहुंचे है कि आंखों की प्रतिक्रियाएं हमारे दिमाग में एक खिड़की की तरह काम करती हैं। जो कि आत्मकेंद्रित या आत्मविमोह जैसे कई न्यूरोलॉजिकल और विकास विकारों में अहम भूमिका निभाता है।'

एएसडी के लक्षणों की अगर बात की जाए तो इसकी एक लम्बी सूची हो सकती है। यह अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग तरह का हो सकता है। साथ ही भिन्न व्यक्तियों में इसके लक्षण भी भिन्न हो सकते हैं। इस विकार से निजात पाना एक चुनौतीपूर्ण काम है। केवल निजात ही नहीं बल्कि इसके इलाज को भी ठीक ठंग से करना भी किसी चुनौती भरे काम से कम नहीं है। इस विकार की पहचान करना साथ इस स्थिति में किस तरह की देखभाल करनी चाहिए जैसी दिशा में एक विशेष कदम है।

क्या है इस रिसर्च का आधार?

नेत्र-तंत्र, जिसे मस्तिष्क का एक क्जस भाग नियंत्रण में रखता है उसकी क्रिया-प्रक्रियाओं पर न्यूरोसाइंस शोधकर्ताओं का ध्यान दशकों से केंद्रित है। दरअसल होता ये है कि जब एक स्वस्थ इंसान की आंखों को तेज गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है तो उसके चारों ओर की दुनिया के साथ नेविगेट करने और समझने के लिए मस्तिष्क आवश्यक निर्देश भेजता रहता है। इस पूरे प्रॉसेस को सैकटेड कहा जाता है।

क्या होता है ऑटिज़्म?

ऑटिज्म एक तरह का न्यूरोलॉजिकल डिस्ऑर्डर है, जो एक इंसान की बातचीत करने और दूसरे लोगों से सम्यक व्यवहार करने की क्षमता को सीमित कर देता है। इसे ऑटिस्टिक स्पैक्ट्रम डिस्ऑर्डर कहा जाता है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में इसके लक्षण अलग-अलग देखने को मिलते हैं। आमतौर पर देखा गया है कि ऐसे कुछ बच्चे या व्यक्ति बहुत जीनियस होते हैं। चूंकि ऑटिस्टिक व्यक्तियों में समानुभूति की कमी होती है, इसलिए वे दूसरों तक अपनी भावनाएं नहीं पहुंचा पाते या दूसरों के हाव-भाव व संकेतों को समझ नहीं पाते।

कैसे मदद करेगी ये रिसर्च?

इस रिसर्च में कुछ स्वस्थ व्यक्तियों और कुछ एएसडी के साथ जी रहे व्यक्तियों की आंखों की गति को ट्रैक किया। भाग लेने वाले सभी लोगों को लक्ष्य के तौर पर एक दृश्य ट्रैक करने के लिए कहा गया जो कि एक स्क्रीन पर विभिन्न जगहों पर दिखाई दे रहा था। इस प्रयोग को ऐसे तरीके से डिज़ाइन किया गया था कि लक्ष्य को ओवरशूटकर ने के लिए प्रतिभागी को ध्यान केंद्रित करना पड़ रहा था। शोधकर्ताओं ने पाया कि स्वस्थ व्यक्तियों के मस्तिष्क ने आंखों के हावभाव से इसे सही ढंग से समायोजित कर लिया क्योंकि लक्ष्य को देखने की प्रक्रिया दोहराई जा रही थी। लेकिन एएसडी के साथ जी रहे व्यक्तियों की आंखें लक्ष्य को याद नहीं कर पा रही थीं। उनके मस्तिष्क में आंखों की गति के साथ चीजों को देख पाने के लिए जिम्मेदार सेरिबैलम कमजोर था।

यूआरएमसी विभाग न्यूरोसाइंस में एक एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक का कहना है कि यदि ये घटनाएं एएसडी वाले बच्चों में एक सिलसिलेवार खोज के रूप में सामने आती हैं, तो इससे संभावना होती है कि सैकैड अनुकूलन उपायों में एक ऐसी विधि के रूप में उपयोगी हो सकती है जो इस विकार का जल्दी पता लगाने में सहायक होगी। उम्मीद है कि इससे ऑटिज़्म से लड़ने में काफी मदद मिलेगी।

पढ़ें: बारिश के मौसम में क्यों बढ़ जाता है जोड़ो का दर्द?

यदि आपके पास है कोई दिलचस्प कहानी या फिर कोई ऐसी कहानी जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो आप हमें लिख भेजें editor_hindi@yourstory.com पर। साथ ही सकारात्मक, दिलचस्प और प्रेरणात्मक कहानियों के लिए हमसे फेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ें...

IIMC दिल्ली से पत्रकारिता की एबीसीडी सीखी। नेटवर्क-18 और इंडिया टुडे के लिए दो साल तक काम किया। घूमने का जुनून है। इस जुनून को chalatmusaafir.in पर देखा जा सकता है। देश के कोने-कोने में जाकर वहां की विरासत और खासियत को सामने लाने का सपना है।

Related Stories

Stories by प्रज्ञा श्रीवास्तव