बड़ी कंपनियों से लोहा लेकर शुरू की ट्रैक्टर की फैक्ट्री,  बेचे 200 ट्रैक्टर्स

 

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लुधियाना से करीब 15 किलोमीटर दूर साहनेवाल गांव के दर्शन सिंह के स्टार्टअप के लिए किसी ने वेंचर फंडिंग नहीं की। उन्होंने अपने दम पर 50 करोड़ रुपये जुटाकर 3,00,000 स्क्वैयर फीट एरिया में ट्रैक्टर फैक्ट्री की शुरुआत की।

दर्शन सिंह और उनका जोश ट्रैक्टर
दर्शन सिंह और उनका जोश ट्रैक्टर
दर्शन ने जब बिजनेस शुरू करने का फैसला किया था तो उन्हें पैसे देने वाला कोई नहीं था। वे अपने जुनून के पीछे भागने की सलाह देने के साथ ही कहते हैं, 'एक गाने से काम नहीं चलेगा, पूरी पिक्चर देखनी जरूरी होती है।'

लुधियाना से करीब 15 किलोमीटर एक छोटा सा गांव है, साहनेवाल। इस गांव की खासियत ये है कि यहां बॉलिवुड के 'ही-मैन' धर्मेंद्र का जन्म हुआ था। हम सुबह से ही उद्यमियों की कहानियों को जानने के लिए पांच लोगों से मिल चुके थे। ये हमारा दिन का आखिरी पड़ाव था। लेकिन इस स्टोरी ने मेरी दिन भर की सारी थकान को दूर कर दिया। मैं अपनी कार की खिड़की से जब बाहर झांक रही थी तो मुझे गांव के घर दिख रहे थे। रास्ते में ढाबों पर लोग पराठे, नान और कुल्चे का आनंद ले रहे थे। दूसरी तरफ से ट्रैक्टर पर सवार होकर खेतों से घर की ओर जा रहे थे। हम जोश ट्रैक्टर के संस्थापक दर्शन सिंह पनेसर से मिलने जा रहे थे।

लुधियाना में हमें किसी ने दर्शन सिंह के बारे में बताया था कि कैसे उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद अपनी ट्रैक्टर बनाने की कंपनी शुरू की। दर्शन महिंद्रा, आयशर, एस्कॉर्ट्स और सोनालिका जैसी ट्रैक्टर कंपनियों के खिलाफ थे। हम जब साहनेवाल पहुंचे तो शाम के 8.30 बज चुके थे। गांव से दूर खेतों के बीच में दर्शन ने अपनी फैक्ट्री स्थापित कर रखी है। वे अपने चैंबर में बैठे थे और बाहर एक नया ट्रैक्टर खड़ा था। काफी लंबे समय से टेक्नॉलजी की दुनिया में रहते हुए मुझे स्मार्टफोन में इस्तेमाल किए जाने वाले ऐप्स पर काम करना पड़ा था और वो मेरे लिए प्रॉडक्ट हुआ करता था। लेकिन काफी दिनों बाद मैं किसी असली प्रॉडक्ट (ट्रैक्टर) को देख रही थी।

हम दर्शन सिंह के चैंबर में पहुंचे तो उन्होंने संशय की निगाहों से हमें देखा। उन्हें हैरत हो रही थी कि सिर्फ उनकी कहानी जानने के लिए कोई बेंगलुरु से आया है। हमने उनसे बात शुरू की तो उन्होंने अपने पंजाबी अंदाज में हमें सब बताना शुरू किया। उन्होंने कहा, 'मैं भी एक स्टार्टअप चलाता हूं।' वैसे तो दर्शन की बात मुझे सही लगी। उन्हें किसी ने वेंचर फंडिंग नहीं की। उन्होंने अपने दम पर 50 करोड़ रुपये जुटाकर ट्रैक्टर फैक्ट्री शुरू की। उनकी फैक्ट्री 3,00,000 स्क्वैयर फीट एरिया में है। लेकिन जब आप ट्रैक्टरों के उत्पादन की बात करेंगे तो वे सिर्फ 200 ट्रैक्टर बना पाते हैं। वहीं महिंद्रा जैसी बड़ी कंपनियां साल में 150,000 से ज्यादा ट्रैक्टरों का उत्पादन करती हैं।

लेकिन दर्शन दावा करते हुए कहते हैं, 'अगर वे हमसे मुकाबला करेंगे तो हार जाएंगे। उनके पास पैसों और ब्रैंड की शक्ति है, लेकिन मेरे पास इच्छाशक्ति है।' दर्शन अपने आइडिया के बारे में बताते हुए कहते हैं कि मार्केट में बाकी कंपनियों के मुकाबले वे काफी फायदे में हैं। वे कहते हैं, 'इन कंपनियों को मार्केट में काफी वक्त हो चुका है और ये अपने कर्मचारियों को काफी बड़ी रकम भुगतान करते हैं। पुराने कर्मचारी नई तकनीक को नहीं अपनाना चाहते। उनके ट्रैक्टर अभी भी 20 साल पुरानी तकनीक पर बन रहे हैं क्योंकि वे बदलाव नहीं चाहते हैं।'

वे कहते हैं, 'मैं लचीलेपन में यकीन रखता हूं।' दर्शन ने बीच में ही हमें ये भी बताया कि वे एक म्यूजिक कंपनी भी चलाते हैं जहां उन्होंने स्थानीय कलाकारों को अवसर प्रदान किए। आपको लग सकता है कि म्यूजक कंपनी का ट्रैक्टर कंपनी से क्या संबंध। लेकिन वे कहते हैं, 'दो चीजें ऐसी हैं जिनका वक्त कभी नहीं जाएगा, एक दारू और दूसरा संगीत। बंदा खुश हो तब भी दारू पीता है और गाने सुनता है और गम में हो तब भी।'

दर्शन अपने बिजनेस की चुनौतियों के बारे में बताते हुए कहते हैं, 'ट्रैक्टर बेचना आसान नहीं है। आप किसी किसान के पास सीधे जाकर उसे ट्रैक्टर खरीदने के लिए नहीं मना सकते। आपको किसानों के साथ एक संबंध स्थापित करना होता है।' दर्शन सिंह अपनी म्यूजिक कंपनी के जरिए एक तीर से दो निशाने लगा रहे हैं। म्यूजिक के जरिए वे लोगों तक पहुंचते हैं और उन्हें संभावित खरीदार के रूप में बदलते हैं। हालांकि उनकी कंपनी द्वारा प्रोड्यूस किए गए गानों में एक बंदिश भी होती है- 'जोश' शब्द के इस्तेमाल की। यानी गानों में जोश शब्द होना चाहिए और वीडियो में उनके ट्रैक्टर भी दिखने चाहिए। एक तरह से देखा जाए तो यह उनके विज्ञापन की तरह काम करता है।

इसीलिए वे कहते हैं, 'टीवी पर विज्ञापन देना काफी महंगा है। लेकिन खुद के बनाए वीडियो को लोकल टीवी चैनलों पर फ्री में देकर मैं उनसे अपने ऐड चलवाता हूं।' यूट्यूब पर उनके म्यूजिक वीडियो पर 4 करोड़ से भी ज्यादा व्यूज हैं। इसके अलावा जब भी उनके गायक स्टेज पर लाइव परफॉर्म करते हैं तो भी वे 'जोश' ट्रैक्टर का प्रचार करते हैं। इस तरह से दर्शन की कंपनी का विज्ञापन भी हो जाता है और ब्रैंड भी बन जाता है। वे बताते हैं कि भारत में सिर्फ 13-14 ट्रैक्टर कंपनियां हैं इसलिए इस श्रेणी में ब्रैंड स्थापित करना काफी मुश्किल है।

जोश-ए-हिम्मत

इसके इलावा वे जैविक खाद का भी उत्पादन करते हैं जिसकी कीमत काफी कम (50-500 रुपये प्रति बोरी) होती है। वे कहते हैं, 'अगर किसानों को ये पसंद आता है तो उनके साथ अच्छे संबंध हो जाता है और फिर वे अधिक मात्रा में खाद खरीदते हैं। फिर हम उन्हें ट्रैक्टर खरीदने के लिए भी प्रेरित करते हैं जिसकी कीमत 5.5 लाख रुपये होती है।'

कॉमर्स की पढ़ाई कर चुके दर्शन सिंह ने 2016 में जोश ट्रैक्टर्स की स्थापना की थी। हालांकि इस काम में उनके किसी भी भाई ने उनका सपोर्ट नहीं किया। उनके भाइयों ने उन्हें कहा था, 'तेरे में जोश आया हुआ है, तू बर्बाद हो जाएगा।' दर्शन का परिवार नट, बोल्ट्स और जंजीरों की मैन्युफैक्चरिंग करने का काम करता था। बाद में वह बिजनेस चार लोगों में बंट गया। इसके बाद दर्शन ने 50 करोड़ रुपये लगाकर ट्रैक्टर की फैक्ट्री खोली। इसके लिए उन्हें अपनी कुछ प्रॉपर्टी भी बेचनी पड़ी।

बीते साल दर्शन की कंपनी ने 200 ट्रैक्टर बेचे। ये ट्रैक्टर देश के अलग-अलग हिस्सों में बिके और कुछ ट्रैक्टर तो नेपाल तक गए। वे कहते हैं, 'मैं अगले साल तक 20 ट्रैक्टर रोज बनाने की योजना बना रहा हूं। हम एक मजबूत डीलर सिस्टम भी विकसित करने पर काम कर रहे हैं ताकि लोकल लेवल पर हमारे ट्रैक्टर अधिक से अधिक बिक सकें।' उनकी कंपनी ने 60 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया। वे कहते हैं, 'हम प्लांट में कुछ बदलाव कर रहे हैं ताकि इसे और आधुनिक बनाया जा सके। हम चाहते हैं कि हमें कुछ इक्विटी फंडिंग मिल जाए जिससे हम अपना व्यापार बढ़ा सकें।'

जोश कंपनी के ट्रैक्टर्स 14 से 65 हॉर्स पावर की अलग-अलग रेंज और रंगों में आते हैं। दर्शन के मुताबिक ट्रैक्टर में जीपीएस सहित कई सारी तकनीक का भी इस्तेमाल होता है जिससे किसान पता लगा सकते हैं कि कितना खेत जोता गया और इंजन कितना गर्म हो गया इत्यादि। ये सारी जानकारियां किसान अपने ऐप पर भी पा सकते हैं। इसके साथ ही ट्रैक्टर में पावर स्टीयरिंग का इस्तेमाल होता है।

दर्शन ने जब बिजनेस शुरू करने का फैसला किया था तो उन्हें पैसे देने वाला कोई नहीं था। वे अपने जुनून के पीछे भागने की सलाह देने के साथ ही कहते हैं, 'एक गाने से काम नहीं चलेगा, पूरी पिक्चर देखनी जरूरी होती है। इसलिए सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं अपनाना चाहिए।' धर्मेंद्र की फिल्म का एक गाना है, 'मेरा करम, मेरा धरम' जो कि दर्शन पर सही फिट बैठता है।

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