दृष्टिहीन लोगों के जीवन को आसान बना सकता है राजकोट बच्चों का यह आइडिया

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सार्वजनिक आधारभूत संरचना शायद ही कभी दृष्टिहीन लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हों। कई देशों में सड़क क्रॉसिंग पर ऐसे फुटपाथों की व्यवस्था की गई है जिसे महसूस किया जा सकता है। इसके अलावा वहां आवाज सहायता जैसे सहायक बुनियादी ढांचे हैं।

 अब राजकोट के बच्चों ने दृष्टिहीन लोगों की मदद के लिए बड़ा कदम उठाया है। यहां के द गैलेक्सी स्कूल के पांच छात्रों, ने महसूस किया कि यह उनके शहर में एक बड़ा मुद्दा था। 

भारत में दृष्टिहीन लोगों की संख्या बेंगलुरू शहर की आबादी के बराबर बताई जाती है। आंकड़ों के मुताबिक 2017 तक, भारत में दुनिया के दृष्टिहीन लोगों की आबादी का एक-तिहाई हिस्सा है। लगभग 12 मिलियन दृष्टिहीन लोग भारत में हैं। ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं लेकिन दृष्टिहीन लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर सरकारें बेहद उसादीन लगती हैं। सार्वजनिक आधारभूत संरचना शायद ही कभी दृष्टिहीन लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हों। कई देशों में सड़क क्रॉसिंग पर ऐसे फुटपाथों की व्यवस्था की गई है जिसे महसूस किया जा सकता है। इसके अलावा वहां आवाज सहायता जैसे सहायक बुनियादी ढांचे हैं। लेकिन राजकोट जैसे भारतीय शहरों में सार्वजनिक संकेतों पर कोई ब्रेल (दृष्टिहीन लोगों के लिए लिखित भाषा का रूप) नहीं है। उनके लिए सपोर्ट केवल बस स्टॉप पर किए गए ऑडियो अनाउंसमेंट तक ही सीमित है।

हालांकि अब राजकोट के बच्चों ने दृष्टिहीन लोगों की मदद के लिए बड़ा कदम उठाया है। यहां के द गैलेक्सी स्कूल के पांच छात्रों, ने महसूस किया कि यह उनके शहर में एक बड़ा मुद्दा था। उन्होंने सोचा कि क्यों न इस मुद्दे पर खुद से ही कुछ किया जाए। इन बच्चों ने अपनी मेहनत से एक उदाहरण पेश किया है। वे कहते हैं, "वे (दृष्टिहीन-विकलांग) हमेशा दूसरों से सहारे यात्रा करते हैं और शहर में घूमने के लिए भी उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना होता है।"

गुजरात के राजकोट में दृष्टिहीन लोगों के स्कूल श्री वी डी पारेख अंध महिला विकास ग्रुह के शिक्षकों से बात करते हुए, बच्चों को पता चला कि बुनियादी ढांचे की कमी के चलते अंधे लोगों के लिए स्वतंत्र होना सबसे कठिन बात है। इस समस्या के चलते अकेले दृष्टिहीन लोग ही नहीं बल्कि उनके साथ रहने वाले परिवार के लोगों को भी परेशान होना पड़ता है।

बच्चे कैसे किसी समस्या पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं?

दरअसल बच्चों ने इस समस्या से निपटने के लिए डिजाइन फॉर चेंज द्वारा विकसित 'Feel-Imagine-Do-Share' के 4-स्टेप फार्मूले को अपनाया। डिजाइन फॉर चेंज इंडिया एक गैर-लाभकारी संगठन है जो बच्चों को उनके समुदायों में समस्याओं को हल करने के लिए मदद देता है। बच्चों ने एक ऐसे क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया जहां समस्याएं ज्यादा थीं। 15 वर्षीय बच्चों के इस ग्रुप ने महसूस किया कि रिलायंस मॉल जैसी सार्वजनिक और कॉमर्शियल इमारतों की लिफ्टों में न तो ब्रेल नंबरिंग है और न ही आवाज सहायता है सिस्टम। बच्चों द्वारा राजकोट में लिए इंटरव्यू में 84.9% लोगों ने बताया कि उनके आवासीय अपार्टमेंट में भी इस तरह की सहायता नहीं है।

जिसके बाद बच्चों ने आवासीय अपार्टमेंट्स को चुना। इसके पीछे उनका बेहद ही मजबूत तर्क था। बच्चों का मानना है कि "घर वह पहला स्थान होता है जहां एक व्यक्ति, चाहे वह दृष्टिहीन हो या नहीं, आसानी से और स्वतंत्र रूप से ट्रैवल करने में सक्षम होना चाहिए।" कथान पंड्या, दर्शन सोनवानी, श्रेयाश भंडेरी, खुशी चन्नेला, ध्रुवांग अकाबरी जैसे होनहार छात्रों ने सकिना भर्मल के मार्गदर्शन में, समस्या से निपटने के विभिन्न तरीकों के बारे में सोचा। बच्चे ग्ल्यू ड्रॉप्स, मिट्टी, मूंगे या सोल्डरिंग ड्रॉप्स का उपयोग करके लिफ्टों में ब्रेल नंबरिंग वाले बटन बना सकते थे। हालांकि काफी परीक्षण और गलतियों के बाद, छात्रों ने अपना चयन किया। उन्होंने चुना कि वे प्लेटों पर नाखून और हथौड़ा का उपयोग करके ब्रेल नंबरिंग बनाएंगे, और राजकोट में आवासीय अपार्टमेंट में इन्हें स्थापित करेंगे।

राजकोट में स्थित एक इंजीनियरिंग कंपनी सिल्वर पंप की मदद से, उन्होंने धातु प्लेटों का निर्माण किया और नाखून और हथौड़ा का उपयोग करके इन प्लेटों पर ब्रेल नंबरिंग को उभारा। इसके बाद छात्रों ने श्री वी डी पारेख अंध महिला विकास ग्रुह में कुछ अन्य छात्रों और शिक्षकों के साथ परीक्षण किया कि क्या ये नंबर आसानी से पढ़े जा सकते हैं। इसके बाद छात्रों ने सफाइर और तुलसी सुगान बिल्डिंग की लिफ्टों में ये प्लेटें लगा दीं। इसी स्कूल की कुछ दृष्टहीन छात्राओं ने भी अब लिफ्ट का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। वे कहती हैं, "अगर बुनियादी ढांचा अच्छी तरह से बनाया जाए तो शायद, जब हम बड़े हो जाएंगे, तो हम शहर में घूमने और आसानी से घूमने में सक्षम होंगे।"

छात्र ब्लाइंड पीपुल्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के साथ अपना आइडिया साझा करने के लिए आगे बढ़े हैं। ब्लाइंड पीपुल्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया को लगता है कि यह अधिक जागरूकता और परिवर्तन की दिशा में एक अच्छा कदम है। वे कहते हैं "हमने साथ ही बिल्डरों और आर्किटेक्ट्स से बात करने का फैसला किया क्योंकि वे बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण स्टाकहोल्डर हैं।" वे आर्किटेक्ट शाली और किशोर त्रिवेदी व रियल एस्टेट समूह आरके एसोसिएट्स के एक साथी गौरव सोनवानी के साथ मिले, वह कहते हैं, "हमें कभी भी यह एहसास नहीं हुआ कि बिल्डिंग इमारतों की लिफ्टों को ब्रेल जोड़कर हम एक बड़ा अंतर ला देंगे। लेकिन अब हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इससे फर्क पड़ता है और दृष्टिहीनों की मदद के लिए व अधिक बुनियादी ढांचा जोड़ने के लिए हमारी पूरी कोशिश होगी।"

बच्चों ने इस तरह के परिवर्तनों को लागू करने में राजकोट नगर निगम से सहायता मांगी। निगम भी बच्चों द्वारा उठाए गए इस मुद्दे से सहमत है। निगम का भी मानना है कि दृष्टिहीन लोगों के लिए आधारभूत संरचना अच्छी तरह से विकसित नहीं है। छात्र अब "एलीवेटर में ब्रेल या आवाज सहायता को अनिवार्य बनाने" और इस वर्ष के अंत में अपने काम को फिर से शुरू करने की योजना बनाने के लिए सरकारी सहायता हासिल करना चाहते हैं। फिलहाल बच्चों की तत्काल योजना राजकोट के अधिक क्षेत्रों में विशेष रूप से सार्वजनिक स्थानों जैसे मॉल और कार्यालयों में ब्रेल प्लेट स्थापित करना है। इसके अलावा वे इन प्लेटों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के लिए सिल्वर पंप के साथ बातचीत कर रहे हैं, और ओटिस लिफ्ट कंपनी के समर्थन की उम्मीद करते हैं।

बच्चों के इस प्रोजेक्ट को 'आई कैन अवॉर्ड्स 2017' में सम्मान मिला। 'आई कैन अवॉर्ड्स' एनजीओ डिजाइन फॉर चेंज द्वारा आयोजित एक पुरस्कार समारोह है। बच्चों के इस प्रोजेक्ट को 'लंबा और स्थायी प्रभाव' की श्रेणी में चुना गया था। 2009 से, वार्षिक 'आई कैन अवॉर्ड्स' ने पूरे भारत में स्कूली बच्चों से 14,000 कहानियों को इकट्ठा किया है। इन कहानियों में बच्चों ने अपने समुदाय में परिवर्तन संबंधी विचारे भेजे हैं। इन छात्रों द्वारा किए गए प्राथमिक शोध के मुताबिक, दिल्ली मेट्रो भारत में एकमात्र ऐसी जगह है, जहां ब्रेल नंबरिंग और स्पर्श फुटपाथ जैसी कई बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। कर्नाटक का मैसूर दृष्टिहीन लोगों के लिए यात्रा आसान बनाने के लिए स्पर्श लेआउट मानचित्र जैसी चीजें उपलब्ध कराने वाला भारत का पहला शहर है। भारत में दृष्टिहीन लोगों की विशाल आबादी की जरूरतों के बारे में अभी भी बहुत सी जागरूकता फैलानी बाकी है। 

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