'यूरोएबल', सिर्फ एक कॉल सेंटर ही नहीं...

- यूरेका फॉब्स का एक सफल प्रयास है यूरोएबल कॉल सेंटर। - विकलांग युवाओं को ट्रेनिंग देकर उनके हुनर को निखारा जाता है और नौकरी के लिए सक्षम बनाया जाता है। - सन 2012 में यूरोएबल को हेलन केलर पुरस्कार से नवाजा गया।

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एक पढ़े-लिखे योग्य इंसान को भी आज की तारीख में आसानी से नौकरी नहीं मिल पा रही है। लाखों पढ़े-लिखे युवा बेराजगारों की लाइन में खड़े हैं ऐसे में शरीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए नौकरी पाना कितना मुश्किल होगा समझा जा सकता है। लेकिन एक जगह है जहां शरीरिक रूप से अक्षम लोग नौकरी भी पा सकते हैं और अपनी योज्यता के बल पर तरक्की भी कर सकते हैं।

यूरोएबल एक ऐसा कॉल सेंटर है जहां काम करने वाले कर्मचारी शरीरिक रूप से अक्षम हैं। यह कॉल सेंटर यूरेका फॉब्स का है और यह भारत का पहला स्टेट ऑफ द आर्ट कॉल सेंटर है जोकि शरीरिक रूप से अक्षम लोगों द्वारा चलाया जाता है। यह कॉल सेंटर एक प्रयास है शरीरिक रूप से अक्षम लोगों की मदद करने का और उन्हें एक मंच देने का जहां वे अपने हुनर को दिखा सकें और एक सम्मान भरी जिंदगी जी सकें। उन्हें पैसों के लिए किसी पर निर्भर न रहना पड़े और अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए वे खुद कमा सकें।

यूरोएबल अपने इस प्रयास से समाज में जो सक्षम और अक्षम का एक गैप सा बन गया है उसे भरने का प्रयास कर रहा है। यूरोएबल महाराष्ट्र के चैंबूर इलाके में है। यह मुंबई के बहुत पास का इलाका है। यूरोएबल का कार्यालय काफी बड़ा है। जहां लगभग 90 सिस्टम लगाए गए हैं। यूरोएबल प्रोजेक्ट को विनाथ हेगड़े चला रही हैं। इन्होंने ही पूरे कॉल सेंटर की डिज़ाइनिंग और उसे डेवलप भी किया है। वे ही यहां की सभी नियुक्तियां और कर्मचारियों की ट्रेनिंग भी कराती हैं।

जो भी कर्मचारी जब इस कॉल सेंटर को ज्वाइन करता है तो उसे इसके लिए कठोर मेहनत करनी होती है। यहां किसी प्रकार की रियायत नहीं बरती जाती क्योंकि सेंटर नहीं चाहता कि उनके यहां काम करने वाले कर्मचारी खुद को किसी भी रूप में कमतर महसूस करें। यहां का माहौल काम के लिहाज से बहुत अनुकूल है।

कर्मचारियों की नियुक्ति के समय एक लिखित परीक्षा होती है। उसके बाद समुह चर्चा होती है और उसके बाद इंटरव्यू लिया जाता है। कई कर्मचारी शुरुआत में कम बोलने वाले होते हैं। ज्यादातर कर्मचारी गरीब परिवारों के हैं। इनमें से कईयों में आत्मविश्वास की कमी होती है। लेकिन एक बार जब वे लोग यहां नौकरी करने लगते हैं तो यहां के माहौल और वर्क कल्चर के साथ घुलमिल जाते हैं। यहां आकर यह लोग केवल पैसा ही नहीं कमाते बल्कि धीरे-धीरे इनके अंदर आत्मविश्वास भी आने लगता है।

मर्ज़िन श्रॉफ
मर्ज़िन श्रॉफ

मर्ज़िन श्रॉफ जोकि यूरेका फॉब्स में डायरेक्टर सेल्स और सीनियर वीपी मार्किटिंग हैं वे बताते हैं कि सामान्य तौर पर शरीरिक रूप से अक्षम लोगों को बचपन से ही कई काम करने को नहीं दिए जाते जिस कारण उन्हें कई बार खुद पर भरोसा नहीं होता कि वे यह काम कर भी सकते हैं या नहीं। लेकिन यहां उन्हें हर काम कराया जाता है। कॉल सेंटर में अभी 96 कर्मचारी हैं और इन कर्मचारियों को लगातार प्रोत्साहित किया जाता है। वहीं इनकी मौनीटरिंग भी होती है। सबसे पहले नए कर्मचारियों की एक ट्रेनिंग होती है जिसमें उन्हें अंग्रेजी बोलना। प्रोडक्ट ट्रेनिंग और किस प्रकार उन्हें कस्टमर से बात करनी है यह सिखाया जाता है। ट्रेनिंग कार्यक्रम लगभग तीन महीने चलता है। यहां पर समय-समय पर कर्मचारियों को परफॉरमेंस के आधार पर सम्मानित कर पुरस्कार भी दिया जाता है।

क्वालिटी मैनेजर कर्मचारियों की परफॉरमेंस पर निगाह रखता है। और यदि किसी कर्मचारी की प्रोडक्टिविटी 90 प्रतिशत से नीचे आती है तो उसे एक रिफ्रेशर प्रोग्राम में भेजा जाता है। जो कर्मचारी अच्छी परफॉरमेंस देते हैं उसका प्रमोशन किया जाता है। यहां शुरुआती सेलेरी के तौर पर 8,500 रुपए दिए जाते हैं। इसके अलावा कर्मचारियों को बोनस, ग्रेचुटी, पीएफ आदि सुविधाएं भी दी जाती हैं।

यहां इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि किसी भी कर्मचारी को यहां कोई दिक्कत न हो। यहां हर चीज को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि काम करना सुविधाजनक रहे और किसी को आने जाने में कोई दिक्कत न हो। हर वर्क स्टेशन लगभग 125 कॉल लेता है। यहां विभिन्न राज्यों से कॉल आती हैं जैसे - गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं महाराष्ट्र आदि।

सन 2012 में नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एमप्लॉयमेंट फॉर डिसेबल पीपल ने यूरोएबल को हेलन केलर पुरस्कार से नवाजा।

एक छोटे से प्रयास से शुरु हुआ यह सफर आज कामयाबी के शिखर पर है। भारत में आज भी विकलांग लोगों को नौकरी पाने में और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है ऐसे में यूरोएबल का यह प्रयास अपने आप में मिसाल है। उम्मीद है भविष्य में ज्यादा से ज्यादा संगठन इस प्रकार के प्रयास करेंगे।

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