स्टार्टअप इंडिया के सपने अब साकार कर रहीं महिलाएं

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स्टार्टअप क्रांति में आधी आबादी का हस्तक्षेप तेजी से बढ़ रहा है। दिल्ली का महिला स्टार्टअप क्लब तो दस करोड़ महिलाओं को प्रशिक्षित करना चाहता है। बैंकों ने भी खासतौर से महिलाओं को स्टार्टअप-लोन देने के लिए कई योजनाएं चलाई हैं। स्टार्ट अप कोष जुटाने में महिलाओं को ही ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अभिनेत्री जैकलिन फर्नांडिज भले ही जूस स्टार्टअप में भारत की पहली बिजनेस वुमन बन गई हों, यह भी सच है कि स्टार्टअप के लिए कोष जुटाने में महिलाओं को ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इस पर रिसर्च रिपोर्ट भी आ चुकी हैं। 

यह तो तय है कि स्टार्टअप से देश की अर्थव्यवस्था संभालने का काम किसी एक-अकेल के वश का नहीं, इसीलिए आधी आबादी भी इसमें बड़ी संख्या में पहल कर रही है। रिस्क उठाकर अपने उद्यमों में सफलता के परचम लहरा रही है। ऐसी भी महिलाएं हैं जो पहली-पहली बार घरेलू स्तर पर ही 'स्टार्टअप इंडिया' का सपना साकार करने में जुटी हैं। उनका भी उद्देश्य देश में स्टार्टअप्स और नये विचारों के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है, जिससे देश का आर्थिक विकास हो एवं बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न हों। स्टार्टअप एक इकाई है, जो भारत में पांच साल से अधिक से पंजीकृत नहीं है और जिसका सालाना कारोबार किसी भी वित्तीय वर्ष में 25 करोड़ रुपये से अधिक नहीं है। यह प्रौद्योगिकी या बौद्धिक सम्पदा से प्रेरित नये उत्पादों या सेवाओं के नवाचार, विकास, प्रविस्तारण या व्यवसायीकरण की दिशा में काम करती है। स्टार्टअप सिर्फ और सिर्फ बेरोजगार यूथ के लिए ही नहीं, कोई भी स्वतंत्रचेता उद्यमी इसमें अपना आर्थिक भविष्य आजमा सकता है।

ऐसी ही तो हैं इंदिरापुरम (गाजियाबाद) शक्तिखंड की पचहत्तर वर्षीय वरिष्ठ कृष्णा कुमारी। वह बैंगन, गाजर, कटहल यानी हर तरह के अचार बना लेती हैं। पति की मौत के बाद से वह अपना पूरा समय इसी उद्यम में दे रही हैं। इसी की कमाई से उनका घर चल रहा है। इसी तरह अठावन साल की यूट्यूबर मंजू श्रीवास्तव अभयखंड में 'मंजूस गार्डन' नाम से यूट्यूब चैनल चला रही हैं। उनके पास देश-विदेशों से कॉल्स आ रहे हैं। वह फोन के माध्यम से भी गार्डन की जानकारियां लोगों से साझा कर रही हैं। वैशाली की साठ वर्षीय निशी गुप्ता घर ही में 'गहना स्टोर' चला रही हैं। पैसठ साल की अन्नपूर्णा मसाले बना रही हैं। सोसायटी की महिलाओं से उन्हें खूब ऑर्डर मिल रहे हैं। वह इक्यावन प्रकार के साबुत मसाले पीसकर पॉश कॉलोनियों में सप्लाई कर रही हैं।

वैसे तो हमारे देश के आइआइटियंस ने कई सीइओ और सीएमडी क्लब पैदा किए हैं लेकिन स्टार्ट-अप के ज़माने में आइआइटी दिल्ली के साथ मिलकर 'वी फ़ाउंडेशन' ने एक नई ज़िम्मेदारी ली है 'महिला स्टार्टअप क्लब' बनाने की। क्लब के पांच बेहतरीन स्टार्टअप को केन्द्र सरकार पांच-पांच लाख रुपये का ग्रांट भी दे रही है। आईआईटी दिल्ली के इस ट्रेनिंग प्रोग्राम को तीन भागों में बनाया गया है और इसे नाम दिया गया है 'सत्यम शिवम् सुंदरम'। इसमें स्टार्टअप को बिजनेस के तरीके से लेकर मार्केटिंग, सेल्स और फंडिंग के तौर तरीके न सिर्फ बताए जाते हैं बल्कि उनको वह हर सहायता दी जाती है, जो उन्हें मार्केट में प्रतिस्पर्धी बना सकें। वी फाउंडेशन के चेयरमैन सरनदीप सिंह बताते हैं कि आईआईटी दिल्ली हर साल तीस-तीस महिलाओं के दो बैच को एडमीशन दे रहा है। अगले चार साल में फाउंडेशन दस करोड़ महिलाओं को प्रशिक्षित कर लेना चाहता है।

अभिनेत्री जैकलिन फर्नांडिज भले ही जूस स्टार्टअप में भारत की पहली बिजनेस वुमन बन गई हों, यह भी सच है कि स्टार्टअप के लिए कोष जुटाने में महिलाओं को ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इस पर रिसर्च रिपोर्ट भी आ चुकी हैं। रिसर्चर्स का कहना है कि अधिकतर पुरुष निवेशकों में उन कंपनियों में निवेश करने का रुख देखा गया है, जो किसी और पुरुष द्वारा संचालित हैं। महिलाओं के स्टार्टअप में एक अलग तरह की बाधा रहती है। शोधार्थियों का कहना है कि जोखिम के आधार पर नए कारोबार में पैसा लगाने वाले निवेशक लगभग नब्बे फीसदी पुरुष होते हैं। इसलिए महिला उद्यमियों के लिए उनके पास स्पेस कम रहता है। उनके स्टार्टअप को पुरुषों के स्टार्टअप की तुलना में कम वित्तपोषण मिलता है। इससे खास तौर से तकनीकी स्टार्टअप में ज्यादातर महिलालाएं हाथ लगाने से खुद ही बचती हैं।

फिर भी महिलाएं काफी तादाद में अपनी उच्च प्रोफ़ाइल नौकरियों को छोड़कर अपने घरों की चार दीवारों में से कुछ कदम उठाने और भारत में उद्यमिता के पूल में शामिल होने को तैयार हैं। दुनिया भर बिज़नेस वुमन में लगातार इजाफा हो रहा है। अन्नपूर्णा योजना के स्टार्टअप में स्टेट बैंक ऑफ मैसूर कार्यशील पूंजी यानी पचास हजार तक ऋण दे रहा है। महिला उद्यमियों के लिए श्री शक्ति पैकेज के योजना के तहत दो लाख से अधिक के ऋण पर छूट भी मिल रही है। भारतीय महिला बैंक ने स्टार्टअप बिजनेस के लिए ही ज्यादातर लोन दे रहा है। इसमें अधिकतम 20 करोड़ तक ऋण राशि मिल जाती है। इसी तरह महिला स्टार्टअप्स के लिए देना शक्ति योजना, उद्योगिनी योजना, सेंट कल्याणी योजना, महिला उद्योग निधि योजना, महिला मुद्रा योजना योजना, ओरिएंट महिला विकास योजना योजना आदि के माध्यम से हमारे देश में महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

गौरतलब है कि लेबनान की हिंद होबिका आज कामयाब बिज़नेस वूमन हैं। उनकी स्टार्टअप, रेसिपी वेबसाइट 'शाहिया' चार साल पहले तब सुर्खियों में आई थी, जब उसे जापानी साइट कुकपैड ने 1.35 करोड़ डॉलर में खरीद लिया था। शाहिया वेबसाइट पर 15 हज़ार रेसिपी हैं और ये अरबी में रेसिपी की 'सबसे बड़ी डिजिटल लाइब्रेरी' है। माया ब्रैंडिंग एजेंसी टीएजी ब्रैंड्स की सीईओ हैं। उन्होंने 15 साल पहले अपना काम शुरू किया था। तब उनकी चुनौती का उनके महिला होने से कोई संबंध नहीं था। उस वक्त सबसे बड़ी चुनौती था मूलभूत ढांचे का अभाव। जब माया ने खाड़ी देशों में अपना कारोबार फैलाना शुरू किया, तब उन्हें इन देशों में महिलाओं की सांस्कृतिक मान्यताओं का पूरा ध्यान रखा। वे मज़ाक में कहती हैं कि पूरी शरीर ढकने वाला बुर्का पहनने के चलते कुछ सप्ताह के लिए वे अपना फैशन सेंस ही खो बैठीं थीं।

आज भी उन्हें नियमों का उल्लंघन किए बिना उनके आसपास काम करना होता है। उद्यमी राना चमाटेली ब्रिटेन से शुरुआत कर अपना काम पश्चिमी देशों में फैलाना चाहती हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कर्मचारियों की नियुक्ति है। उन्होंने युवाओं को विज्ञान के क्षेत्र में आकर्षित करने के लिए वर्ष 2009 में 'द लिटिल इंजीनियर' नाम से वर्कशाप शुरू किया, जो अब कतर-लीबिया तक फैलता जा रहा है। महिलाओं के स्टार्टअप्स पर वह कहती हैं कि अगर कोई महिला उद्योग-धंधे के बारे में कोई फ़ैसला करती है तो पहली प्रतिक्रिया मिलती है कि उसका फला काम करना ठीक नहीं रहेगा। ये कोई नई बात नहीं, ऐसा हमेशा से होता आया है। ये समाज की संस्कृति में है। आज स्टार्टअप से इस संस्कृति और सोच को बदलने की ज़रूरत है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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