चाय बेचते 'लल्ला', भीख मांगते 'कन्हैया'

उत्तर प्रदेश में बाल श्रम की दुरूह और दारुण स्थिति पर केंद्रित प्रणय विक्रम सिंह राठौड़ की रिपोर्ट... 

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आंकड़े बताते है कि उत्तर प्रदेश के कालीन उद्योग में जितने मजदूर काम करते हैं उनमें तकरीबन 40 प्रतिशत बाल श्रमिक हैं। आईये एक नज़र डालते हैं देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले प्रदेश की उस क्रूर हकीकत पर, जिसे हम 'बाल मजदूरी' और 'बाल मजबूरी' दोनों का नाम देते हैं...

जिन हाथों में कलम होनी चाहिए थी, उन हाथों को लाचारी ने चाय की केतली और हथौड़े की सौगात दी है। दावा है कि बाल मजदूरों की स्थिति देख कर आपके मन में बरबस 'प्यासा' फिल्म का यह नग़मा 'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है...' जरूर कौंध उठेगा।

कई दशक पहले हिंदुस्तान की फिजा में एक मशहूर और मकबूल गीत गूंजा था, 'नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है...' अब इसे बाल मन का अबोधपन कहें या गीतकार के इंकलाबी तसव्वुर का कमाल जो, बच्चे भी जोश से लबरेज हो कर जवाब देते हैं कि 'मुट्ठी में है तकदीर हमारी, हमने किस्मत को बस में किया है...' बजाहिर हकीकत से हम सब वाकिफ हैं लेकिन अगर हालात की और यथार्थवादी पड़ताल करनी हो तो आप नजाकत और नफासत के शहर लखनऊ की हर गली और चौराहे पर मौजूद होटलों व गैराजों पर देख सकते हैं मजबूरी की बेहया ताकत को, जिसने सूबे के मुस्तकबिल के हाथ में थमा दी है जूठी प्लेट, पेंचकस और रिंच। जिन हाथों में कलम होनी चाहिए थी, उन हाथों को लाचारी ने चाय की केतली और हथौड़े की सौगात दी है। दावा है कि बाल मजदूरों की स्थिति देख कर आपके मन में बरबस 'प्यासा' फिल्म का यह नग़मा 'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है...' जरूर कौंध उठेगा।

समझ में नहीं आता विधाता इतना क्रूर कैसे हो सकता है। कोई भी सभ्य समाज ऐसा नहीं हो सकता, जहां बच्चे स्कूल न जायें, खेल के मैदानों में न नजर आयें, लेकिन हकीकत यही है कि देश के लाखों बच्चे ऐसा जीवन जीने को अभिशप्त हैं। उपभोक्तावाद के अंधड़ ने बाल मन के ख्वाबों की पतंग को भटका दिया है। तभी तो सरकारी अफसरों की कोठियों से लेकर रिहाइशी इलाकों के विला तक में साब से लेकर 'बेबी-बाबा' को पानी पिलाने का काम करते यही बाल मजदूर दिखायी पड़ते हैं।

"यूपी में कालीन व्यवसाय, काष्ठशिल्प, बुनकारी, हस्त शिल्प, होटल और खान-पान से जुड़े अन्य व्यावसायों में बहुतायत संख्या में बाल श्रमिक जुड़े हुए हैं। आंकड़े बताते है कि उत्तर प्रदेश के कालीन उद्योग में जितने मजदूर काम करते हैं, उनमें तकरीबन 40 प्रतिशत बाल श्रमिक होते हैं। वस्त्र और हथकरघा खिलौना उद्योग में भी, भारी संख्या में बच्चे खप रहे हैं। तम्बाकू क्षेत्र में 21 प्रतिशत, भवन निर्माण क्षेत्र में 17 प्रतिशत, कपड़ा उद्योग में 11 प्रतिशत बाल श्रमिक काम करते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार लखनऊ में जरदोजी के काम में लगे कामगारों में लगभग 19 फीसदी बच्चे होते हैं। सिले-सिलाये कपड़ों की औद्योगिक इकाईयों में भी बड़ी संख्या में बच्चों से काम लिया जाता है।"

ऐसा नहीं है कि मुल्क में इन बाल मजदूरों के लिए कोई कानून नहीं है, आर्टिकल 24 में बाल मजदूरी को एक दंडनीय अपराध माना गया है लेकिन जब कानून के मुहाफिजों के आंगन में नन्हें हाथों से पोछा लगवाया जायेगा, तो किसको याद आयेगी 'धारा' और कौन करेगा 'कार्यवाही'। अब इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है, कि अयोध्या की तंग गलियों में 'राम लला' को चाय बेचते विदेशी देख लेते हैं, वृंदावन की कुंज गलियों में भीख मांगते 'कन्हैया' की तस्वीर लगभग पर्यटकों के कैमरे में कैद होती है और तो और प्रधामनंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र काशी तो बाल मजदूरी के मामले में प्रदेश में नम्बर तीन के पायदान पर है, लेकिन यह सब कुछ सूबे के जिम्मेदार अफसरों को नहीं दिखायी पड़ता है। उसकी वजह यह है कि बच्चों को वोट देने का अधिकार नहीं है और लोकतंत्र में जिसके पास वोट नहीं है उसकी पूछ नहीं।

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ध्यातव्य है कि जनगणना 2011 के मुताबिक उ.प्र. में 21.76 लाख बाल श्रमिक हैं, लेकिन प्रदेश सरकार और श्रम विभाग को बाल श्रमिक दिखाई नहीं देते हैं। गौरतलब है कि प्रदेश में बाल श्रमिकों को चिह्नित करने का अभियान वर्ष 1997-98 से चल रहा है। राजधानी लखनऊ में वर्ष 2012 में 20, 2013 में 57 और 2014 में केवल 09 बाल श्रमिक ही श्रम विभाग चिन्हित कर पाया। दिल्ली से सटे प्रदेश के औद्योगिक जिले गाजियाबाद में तो तीन वर्षों में श्रम विभाग मात्र 80 बाल श्रमिक ही चिन्हित कर सका। बाल मजदूरी का यह दाग प्रदेश में सबसे ज्यादा बरेली में है। बरेली के बाद गाजियाबाद का नंबर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी बाल मजदूरी के दाग से अछूता नहीं है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में नियमित बाल मजदूरों की संख्या 20713 है। इन बाल मजदूरों के अलावा बनारस में तीन माह से कम समय से मजदूरी करने वाले बच्चों की संख्या 4394 तो छह माह से मजदूरी में जुटे मासूमों की संख्या 15126 है।

बाल मजदूरी का दाग बनारस के चेहरे पर जगह-जगह जमा पड़े कूड़ों के ढेर से भी ज्यादा बदबूदार है। हर जिले में सैंकड़ों बाल मजदूर सबकी नजरों के सामने काम करते दिखते हैं, पर ताज्जुब है कि सरकार और सरकारी नुमाइंदों को ये बाल मजदूर नजर नहीं आते हैं। घरेलू काम के अलावा कुछ विशेष प्रकृति के व्यवसाय हैं जिनमें बाल मजदूरों की बड़ी खपत होती है।

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यूपी में कालीन व्यवसाय, काष्ठशिल्प, बुनकारी, हस्त शिल्प, होटल और खान-पान से जुड़े अन्य व्यावसायों में बहुतायत संख्या में बाल श्रमिक जुड़े हुए हैं। आंकड़े बताते है कि उत्तर प्रदेश के कालीन उद्योग में जितने मजदूर काम करते हैं उनमें तकरीबन 40 प्रतिशत बाल श्रमिक होते हैं। वस्त्र और हथकरघा खिलौना उद्योग में भी, भारी संख्या में बच्चे खप रहे हैं। तम्बाकू क्षेत्र में 21 प्रतिशत, भवन निर्माण क्षेत्र में 17 प्रतिशत, कपड़ा उद्योग में 11 प्रतिशत बाल श्रमिक काम करते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार लखनऊ में जरदोजी के काम में लगे कामगारों में लगभग 19 फीसदी बच्चे होते हैं। सिले-सिलाये कपड़ों की औद्योगिक इकाईयों में भी बड़ी संख्या में बच्चों से काम लिया जाता है।

सेवायोजक बच्चों को काम पर रखने के लिए तरह-तरह के तर्क देते हैं। कालीन बुनकर कहते हैं, कि बच्चों की उंगलियां मुलायम होती हैं इसलिए उनकी लगायी गांठें उम्दा किस्म की होती हैं। बीड़ी निर्माताओं का कहना है, कि पत्तियों में तम्बाकू भरकर लपेटने में बच्चों की उंगलियां दक्ष होती हैं। ईंट भट्ठे वाले मानते हैं कि कच्ची ईटों को उलट-पलटकर सुखाने के काम के लिए बच्चे बेहतर साबित होते हैं क्योंकि उनकी नर्म उंगलियों से दबाव नहीं पड़ता और ईटों में गढ्ढे नहीं पड़ते। वे हल्के होने के कारण ईटों को बगैर नुकसान पहुंचाये उन पर चल सकते हैं।

वयस्कों को जो दिहाड़ी देनी पड़ती है, उसके 18 से 20 प्रतिशत खर्च में ही बाल मजदूर मिल जाते हैं, जो 12 घंटे तक हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। बाल मजदूरी के दुष्चक्र में फंस कर बच्चे सिर्फ अपना बचपन ही नहीं खो रहे, और भी बहुत कुछ लुटाने को मजबूर हो रहे हैं। धमकियां, मारपीट, मजदूरी के भुगतान में बेईमानी तो आम बातें हैं। दुर्घटनाओं के शिकार होकर वे अपंग भी बन रहे हैं। उन्हें समुचित इलाज नहीं मिलता। वे यौन शोषण के शिकार भी होते हैं। यहां यह जान लेना जरूरी है कि किसी भी उत्पाद के लागत मूल्य में मजदूरी के खर्चे का एक बड़ा अंश होता है। खासकर हस्तशिल्प और छोटी-छोटी उपभोक्ता वस्तुओं में तो यह 30 से 40 प्रतिशत तक दर्शाया जाता है। तमाम कागजी खानापूरियों और बही-खातों में मजदूरी पर होने वाला खर्च किसी भी रूप में सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं दिखाया जा सकता। यानि कागज पर जो धनराशि लागत व्यय में दिखा दी जाती है, उसका अधिकांश हिस्सा बाल मजदूरी कराने से काले धन के रूप में बच जाता है। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि बाल मजदूरी कराने से देश में हर माह 18,000 करोड़ यानि सालाना तौर पर लगभग दो लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा काला धन पैदा होता है। निश्चित तौर पर इसका एक भाग स्थानीय नेताओं और पार्टियों के चुनावों तथा दूसरे मदों में खर्च होता है। इसी में सरकारी अफसरों को दी जाने वाली रिश्वत भी शामिल है। 

यद्यपि कुछ प्रयासों ने बाल श्रम के घोर अंधेरों के दरम्यान भी उम्मीद की शमा जलायी है, जैसे- 1990 के दशक में भदोही के कालीन उद्योग के अच्छे दिनों में वहां छोटी-बड़ी तकरीबन 50 हजार इकाईयां चलती थीं, जिसमें लगभग तीन लाख बच्चे काम करते थे। कालीन निर्माता और निर्यातक दोनों ही उत्पादन की लागत कम करने के लिए बच्चों का श्रम खरीदते थे, जो कि अत्यन्त सस्ता पड़ता था। ऐसे में बाल मजदूरों से तौबा करने की बात भला किसी को क्यों रास आती? सत्यार्थी ने एक ओर तो बाल श्रमिकों को मुक्त करवाने के लिए छापे डालने शुरू किए, दूसरी ओर उपभोक्ताओं में जागरूकता पैदा करने की मुहिम चलायी। उन्होंने 'रगमार्क' लोगों प्रभावी किया। कालीन पर यह निशान लगा होने का मतलब था, कि उसे बाल श्रमिकों से नहीं बुनवाया गया है। यह तरीका कारगर रहा। 'रगमार्क' के लोकप्रिय होने से बुनकरों और निर्यातकों को अपना रवैया बदलना पड़ा।

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ऐसा ही कुछ मुरादाबाद के पीतल उद्योग के साथ भी हुआ। बच्चों के शोषण के बदनुमा दाग के चलते उनके निर्यात किए गए उत्पाद उपभोक्ताओं द्वारा खारिज किए जाने लगे। नतीजा यह है, कि आज पीतल नगरी की हरेक इकाई ने अपने परिसर में 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों का प्रवेश वर्जित कर रखा है। इस स्थिति तक पहुंचने में एक्टिविस्टों और सरकारी एजेंसियों की चौकसी ने भी बड़ी भूमिका निभायी। लेकिन इस सबका मतलब यह कतई नहीं लगाया जा सकता, कि हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां हर बच्चा उन्मुक्त बचपन जी सकेगा।

कानून, सरकारी एजेंसियां, एक्टिविस्ट और एनजीओ संगठित क्षेत्र में तो प्रभावकारी हो रहे हैं, लेकिन असंगठित क्षेत्र का क्या, जहां लाखों बच्चे अपना बचपन कौड़ी के भाव बेंच रहे हैं? रेस्तराओं में, हलवाईयों के यहां, सड़क किनारे ढाबों में, गाड़ियों की मरम्मत की छोटी-मोटी दुकानों में, बाजारों में, घरों में हर जगह अल्पायु बच्चे काम करते देखे जा सकते हैं। इन्हें देखकर हममे से कितनों की संवेदनाएं जागती हैं? हमारा संवेदित न होना, हमारे समाज में बाल श्रम की व्यापक स्वीकारता को दर्शाता है और यह सबसे खतरनाक बात है।

एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के बच्चे मानव तस्करों के निशाने पर हैं। ये मानव तस्कर बड़ी संख्या में बच्चों को महाराष्ट्र और राजस्थान भेज रहे हैं, जहां उनसे घर, फैक्ट्रियों और व्यावसायिक ठिकानों पर मजदूरी कराई जाती है। सूबे के श्रम विभाग ने भी एक सर्वे के आधार पर बाल श्रमिकों की संख्या 22 लाख बताई है। इस तरह के बाल श्रमिकों के ठिकानों का पता लगाने के लिए अब आईआईटी कानपुर के ह्यूमैनिटी सेल की मदद ली जा रही है। इस बीच कई राज्यों के खुफिया विभागों ने बाल श्रमिकों को मुक्त कराकर वापस उत्तर प्रदेश भेजा है, लेकिन जितने बच्चे लौटे थे उससे ज्यादा फिर सप्लाई किए जा चुके हैं।

तस्करी का यह जाल पूर्वांचल में ज्यादा खतरनाक बन चुका है। एक सर्वे के मुताबिक प्रदेश में बाल श्रमिकों की सबसे ज्यादा संख्या इलाहाबाद में है। यहां पर एक लाख से ज्यादा बच्चे काम में लगे हैं। इसके बाद बरेली और जौनपुर का नंबर आता है। कई जगहों से तो बच्चों और बच्चियों के दैहिक शोषण की भी खबरें आई हैं। मिर्जापुर और भदोही के कालीन उद्योग, फिरोजाबाद के कांच उद्योग और मुरादाबाद के पीतल उद्योग में हजारों की संख्या में बाल मजदूर काम करते हैं।

प्रदेश के प्रमुख नगरों में बाल मजदूर
(भारत सरकार के महा रजिस्ट्रार के आंकड़ों पर आधारित)

लखनऊ में 12221, इलाहाबाद में 19252, गाजीपुर में 18698, मुरादाबाद में 17145, आगरा में 160067, सीतापुर में 15715, हरदोई में 13789, जौनपुर में 13576, बहराइच में 12449, मेरठ में 11219, कानपुर में 10906, अलीगढ़ में 10644, शाहजहांपुर में 10391, फिरोजाबाद में 8151, बदायूं में14942, गोरखपुर में 10725, बलिया में 10552, रायबेरली में 8705, फैजाबाद में 5899, सुलतानपुर में 8041, रामपुर में 10047, मथुरा में 6995, मैनपुरी में 4635 और भदोही में 2735 बाल मजदूर हैं।

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