अपने पिता को एक हस्ताक्षर पाने के लिए लाचार-परेशान देख ये बेटी खुद ही बन गई कलक्टर

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उस बच्ची की दिमाग में चढ़ गया कि बड़ा होकर उसे कलक्टर बनना है और सबकी मुश्किलें हल करनी है। उस वक्त सरकार द्वारा किसानों के लिए घोषणा की गई थी तब रोहिणी भाजीभाकरे नौ साल की थी और उसने अपने पिता को लाभ प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते देखा था।

रोहिणी कहती हैं कि उनके पिता 65 वर्ष से स्वयंसेवक हैं। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं कलक्टर बनना चाहती हूं तो उन्होंने बोला कि मेरी सलाह है कि तुम जब एक कलक्टर बन जाओ तो यह सुनिश्चित करना कि तुम हमेशा लोगों को पहले रखो।

 स्वच्छता और स्वास्थ्य दो ऐसी समस्याएं हैं जिनसे वो पहले निपटना चाहती हैं। वो कहती है डेंगू के खतरे से स्पष्ट है कि हमें स्वच्छता पर अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता है।

बहुत साल पहले की बात है, महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में एक किसान सरकारी दफ्तर के नीचे से लेकर ऊपर तक अपने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाने के लिए भाग रहा था तब उस किसान की बेटी रोहिणी भाजीभाकरे ने उनसे पूछा कि 'आप क्या कर रहे हैं, आपको क्यों इतना परेशान होना पड़ रहा है। आम जन की परेशानी खत्म हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कौन जिम्मेदार है?' तब उसके पिता ने जवाब दिया, जिला कलक्टर। उस बच्ची की दिमाग में चढ़ गया कि बड़ा होकर उसे कलक्टर बनना है और सबकी मुश्किलें हल करनी है। उस वक्त सरकार द्वारा किसानों के लिए घोषणा की गई थी तब रोहिणी भाजीभाकरे नौ साल की थी और उसने अपने पिता को लाभ प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते देखा था।

इस घटना के 23 साल बाद आइएएस अधिकारी रोहिणी तमिलनाडु के सलेम जिले की पहली महिला कलक्टर बन गई। अपनी प्रशासनिक क्षमताओं के साथ-साथ मूलतः मराठी रोहिणी भाजीभाकरे ने अपनी बोल चाल की भाषा को भी निखारा है और मदुरई जिले में तमिल भी बोल लेती हैं। जिला सलेम को 170 पुरुष कलक्टर के बाद पहली महिला कलकटर मिली है। रोहिणी इस उपलब्धि पर गर्व महसूस करती हैं साथ ही पुरानी बातों को याद कर बताती हैं कि 'मेरे पिताजी की कठिनाई को देखते हुए मैं एक सरकारी नौकर बनने और सार्वजनिक सेवा पर ध्यान देने के लिए प्रेरित हुई।'

साभार: द हिंदू
साभार: द हिंदू

हर तरफ हो रही रोहिणी की प्रशंसा-

32 साल की रोहिणी भाजीभाकरे को वी संपत के स्थान पर नियुक्त किया गया। उनका स्थानांतरण सामाजिक योजनाओं के निदेशक के पद पर किया गया। इस पद पर नियुक्त होने से पहले रोहिणी मदुराई के जिला ग्रामीण विकास एजेंसी के अपर कलेक्टर (विकास) और परियोजना अधिकारी के पद पर तैनात थी। बाद में उन्होंने आईपीएस अधिकारी विजेंद्र बिदारी से विवाह किया। उनके काम की लोगों ने खूब तारीफ की। रोहिणी कहती हैं कि 'मैंने सरकारी स्कूल में अध्ययन किया और मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई एक सरकारी कॉलेज से हुई, वो ये भी कहती हैं कि उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में कोई निजी कोचिंग की मदद नहीं ली। इस अनुभव ने मुझे ये विश्वास दिलाया है कि हमारे सरकारी स्कूलों में अच्छे शिक्षक हैं लेकिन बुनियादी सुविधाओं के मामले में कमी है।'

कलक्टर रोहिणी कुछ कहने के पहले थोडे सेकंड रुकती है और अपने विचारों को पुन: एकत्रित करते हुए कहती हैं हमें राज्य सरकार से सभी आवश्यक समर्थन प्राप्त हैं। जिले की पहली महिला कलेक्टर होने के साथ-साथ कई सारी जिम्मेदारियां भी आती हैं। मैं इसे महिलाओं के सशक्तिकरण के संकेत के रूप में देखती हूं और विश्वास करती हूं कि लोग मुझसे संबंधित हो सकते हैं। रोहिणी कहती हैं कि उनके पिता 65 वर्ष से स्वयंसेवक हैं। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं कलक्टर बनना चाहती हूं तो उन्होंने बोला कि मेरी सलाह है कि तुम जब एक कलक्टर बन जाओ तो यह सुनिश्चित करना कि तुम हमेशा लोगों को पहले रखो।

स्वास्थ्य और शिक्षा पर है पूरा ध्यान

वो सलेम के लोगो और स्कूल में भी संबोधित करती रहती हैं। स्वच्छता और स्वास्थ्य दो ऐसी समस्याएं हैं जिनसे वो पहले निपटना चाहती हैं। वो कहती है डेंगू के खतरे से स्पष्ट है कि हमें स्वच्छता पर अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता है। यह मेरी पहली प्राथमिकता होगी । वो बताती है कि तमिलनाडु सरकार के द्वारा झीलों की उपजाऊ मिट्टी जो कि एक प्रमुख परियोजना है उसका भी निरीक्षण किया जाएगा। मौजूदा राजनीतिक माहौल ने उन योजनाओं को पूरा करना मुश्किल बना दिया है जो उनके मन में है। 

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