आप कितनी मोटी चमड़ी के हैं ?

... इसलिए भी कि इस दौर में, जहाँ संवेदनशीलता कमज़ोरी मानी जाती है, उसका मूल्य कम आंका जाता है, एक मज़बूत नेतृत्व करनेवाला बनने के लिए मोटी चमड़ी का होना ज़रूरी माना जाता है, तब भी मुझे लगता है संवेदनशील होना ही सबसे बड़ी शक्ति है।

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आपके जीवन में कौनसी बड़ी महत्वाकांक्षाएँ हैं? आप बहुत लंबे समय से कुछ सोच रहे हैं? कई लोग आराम करने के लिए लंबी छुट्टी चाहते हैं? आर्थिक स्थिति को मज़बूत करने के लिए फंडिंग की ज़रूरत है? आदि.. आदि..कई लोगों के मन में इन सब बातों को लेकर कुछ न कुछ ज़रूर चलता रहता है, लेकिन मेरे मन में कुछ अलग ही चलता रहता है, मेरी एक ही कोशिश एक ही तीव्र लालसा है कि मैं ‘मोटी चमड़ी’ की हो जाऊँ।

इस कोशिश में सफल होना आसान नहीं है। जिस तरह आपने अनुवांशिक रूप से मोटापा पाया है और आपको दुबला, छरहरा और आकर्षक होना है, तो अपको ऐसा होने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी और अपने पेट को कष्ट देना पड़ेगा। बिल्कुल उसी तरह आपको मोटी चमड़ी का होना है, तो भी खूब मेहनत करनी पड़ेगी।

उसी तरह, जिंदगी में कुछ पाने के लिए आवश्यकता पड़ने पर मोटी चमड़ी का होना भी पड़ता है। हमारे अभिभावक, शिक्षक, हमारी जिंदगी को बनाते हुए जिस तरह की भूमिकाएँ निभाते हैं, मुझे लगता है, उसमें मोटी चमडी का बनाने के का काम उपेक्षित रहता है।

आपको याद होगा, जब कभी आपको कोई काम करने के लिए कहा गया हो और आप ने वह नहीं किया हो तो फिर आपको उनके क्रोध का सामना करना पड़ा होगा, सज़ा भी मिली होगी। कई बार ऐसा भी कहा गया होगा, आप सिर्फ मेरी बात सुनो, मेरी बातों को अनसुना मत करो, इधर ध्यान दो, ... इस तरह की बातें आपको अपने गुरुजनों और अभिभावकों से सुननी पड़ी होंगी।

निश्चित रूप से ऐसा भी हुआ होगा कि जो कुछ कहा गया है, उसपर अमल किया जाए या फिर क्षमायाचना करनी पड़ी होगी। ...मुझे माफ करो, मुझसे ग़लती हो गयी...ऐसा सैकड़ों बार आपने कहा होगा या फिर न सुनने के लिए दरवाज़े के बाहर भी खड़े कर दिये गये हों, ताकि हम उनकी बात न मानने पर अपने को दोषी मान लें।

शुरू शुरू में मैंने भी बड़ों की बातें सुनने की आदत डाल ली थी। मुझे लगता है कि हमारी सुनते रहने की आदत अपने आस पास के लोगों को कमज़ोर कर देती है। हमें भी उनकी हाँ में हाँ मिलाने की आदत सी हो जाती है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उनकी बुलंद आवाज़ों के बीच अपने ‘आप’ की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती।

मुझे याद आता है, स्टार्टप के शुरूआती दिनों में एक सज्जन के दुर्व्यवहार से मैं रो पड़ी थी। उस व्यक्ति का असभ्य व्यवहार ने मेरे दिल को चोट पहुँचाई थी। उसकी बात सुनकर मैं बाहर निकल आयी। आँसुओँ को रोकना मुश्किल हो गया था। उस व्यक्ति की बातें काफी अपमानजनक और तुच्छ थीं। मैं नहीं सोच पा रही थी कि मैं क्या करूँ और उसी समय मेरे पिता का फोन आया। मैंने उन्हें बताने की कोशिश की कि सबकुछ ठीक है, लेकिन मेरी आवाज़ से वे समझ गये कि मैं किसी मुश्किल में हूँ।

क्या हुआ?... उन्होंने पूछा। मुझे आदत नहीं थी कि मैं अपनी समस्याएँ या शिकायतें अपने माता पिता से कहूँ, लेकिन मैंने उस समय जो कुछ वहाँ हुआ था, सब का सब पिताजी को बता दिया। उन्होंने उस समय जो कुछ कहा, अब भी याद है, ...तुम जब रास्ते पर खड़े हो तो रास्ता किस तरह पार किया जाता है, तुम्हे मालूम होना चाहिए, अपनी ओर आने वाले ट्राफिक में से किस तरह आगे निकल जाना है, इसकी जानकारी तुमको होनी चाहिए।...

कई साल बीत गये, अब मैं रास्ता पार करने का तरीका सीख गयी हूँ, निश्चित रूप से पूर्व की तुलना में अच्छी तरह से, लेकिन कभी-कभी बीच बीच में पीड़ादायक ट्राफिक, अर्थात तकलीफ पहुँचाने वाले लोगों का सामना करना पड़ता है।

जिनको भी मोटी चमड़ी का बनना है, मैं उन्हें एक सुझाव देती हूँ, आप मोटी चमड़ी के या निर्दयी नहीं हैं, तो इसके लिए सबसे पहले अपने आपका आभार मानिये। इसलिए भी कि इस दौर में, जहाँ संवेदनशीलता कमज़ोरी मानी जाती है, उसका मूल्य कम आंका जाता है, एक मज़बूत नेता बनने के लिए मोटी चमड़ी का होना ज़रूरी माना जाता है, तब भी मुझे लगता है संवेदनशील होना ही सबसे बड़ी शक्ति है।

जिसे खूब रोना आता है, वही खूब हँस भी सकता है।

इसीलिए मैं कहती हूँ कि अपनी संवेदनशीलता से खूब प्रेम करो। इसके बारे में दूसरों को भी बताओ समझाओ, उन्हें एहसास दिलाओ। मोटी चमड़ी का बनने के लिए निरंतर अभ्यास करना पड़ता है। आपने आस पास के जीवन में बहुत सारे निर्दयी लोग हैं, उनकी ओर ध्यान मत दो। उन्हें प्रेम करो, इससे हम अधिक सशक्त होंगे।

ध्यान रखिये, हर अपमान, हर इन्कार हमें और मज़बूत करता है और सशक्त होने का दूसरा सही और सही तरीका यही है। अपने इस तरह से मज़बूत होने का जश्न मनाइए।