गंदा पानी बेचने के धंधे से हुई 78 करोड़ की कमाई

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पहले कभी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा कि ऐसा वक्त आएगा, जब शौचालय का पानी करोड़ों की कमाई का जरिया बन जाएगा। वैकल्पिक इंधन की खोज ने आखिर वह दिन दिखा ही दिया। नागपुर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने गंदा पानी बेचकर 78 करोड़ रुपये कमाए हैं। उसी पानी से नागपुर सिटी में 50 एसी बसें चल रही हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
योजना के मुताबिक गंदे पानी से मिथेल निकालकर उसमें से 'सीओ-2' अलग कर सीएनजी बनाई जा रही है। इससे बसें चलाई जा रही हैं। आगे इससे 50 हजार बस-ट्रक चलाने की योजना है। 

देश में वैकल्पिक ईंधन को लेकर कई प्रकार के प्रयोग किए जा रहे हैं। इसी में करोड़ों की कमाई का धंधा भी बनने लगा है। सस्ती उड़ान सेवा देने वाली कंपनी स्पाइसजेट ने अभी गत 27 अगस्त को देहरादून से देश की पहली जैव जेट ईंधन से चलने वाली परीक्षण उड़ान का परिचालन किया है। इसमें आंशिक रूप से जैव जेट ईंधन का इस्तेमाल किया गया। इस ईंधन में 75 प्रतिशत एविएशन टर्बाइन फ्यूल और 25 प्रतिशत जैव जेट ईंधन का मिश्रण था। जट्रोफा फसल से बने इस ईंधन का विकास सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून ने किया है। इसी साल मार्च में केंद्र सरकार ने एक और बड़े काम की कारस्तानी का खुलासा किया था कि नालों के गंदे पानी से करोड़ों रुपए कमाने की योजना बनाई जा रही है।

केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने एक कार्यक्रम में इस योजना का खुलासा करते हुए बताया था कि 'गंगा नदी के किनारे 24 पॉवर प्रोजेक्ट हैं, जिनमें से 12 काम कर रहे हैं। ये पॉवर प्रोजेक्ट नदी या बांधों से साफ पानी ले रहे हैं। अब सरकार ने इन पॉवर प्रोजेक्ट से कहा है कि वह गंगा किनारे के सीवेज वाटर को शुद्ध करके उन्हें देगी और उसी पानी से बिजली बनाई जाएगी। इस तरह नदियों और बांधों का अच्छा पानी बचाया जा सकेगा। रेलगाड़ियां भी साफ पानी से नहीं धोई जाएंगी। इसके लिए भी गंदा पानी साफ कर सरकार रेलवे को बेचेगी। नालों का यही पानी इंडस्ट्री को भी बेचा जाएगा। इसके बाद भी उपलब्धता बनी रहती है तो इसे सिंचाई के काम में लाया जाएगा।

उस दिन गडकरी ने बताया था कि नागपुर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में इस योजना को अंजाम तक पहुंचाया जा चुका है। म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने महाराष्ट्र सरकार को 18 करोड़ रुपए में सीवेज का पानी बेचना शुरू किया था। अब टॉयलेट के पानी को लेकर करार हुआ है, जिसमें 78 करोड़ रुपए की रॉयल्टी नागपुर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को मिलेगी। योजना के मुताबिक गंदे पानी से मिथेल निकालकर उसमें से 'सीओ-2' अलग कर सीएनजी बनाई जा रही है। इससे बसें चलाई जा रही हैं। आगे इससे 50 हजार बस-ट्रक चलाने की योजना है। गडकरी की बताई वह योजना अब रंग लाने लगी है। नागपुर की सरकारी एजेंसी ने टॉयलेट का गंदा पानी बेचकर 78 करोड़ रुपये कमाए हैं। उसी पानी से नागपुर सिटी में 50 एसी बसें चलाई जा रही हैं।

दरअसल, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय के अधीन काम करने वाली तेल एवं गैस कंपनियों के साथ केंद्र सरकार ने करार किया है कि गंगा के तटवर्ती छब्बीस शहरों में पानी की गंदगी से निकलने वाली मीथेन गैस से बायो सीएनजी तैयार की जाएगी, जिससे इन शहरों में सिटी बसें चलें। इस काम से 50 लाख युवाओं को रोजगार मिलेगा। इससे गंगा की सफाई भी होगी। देश में कोयले की कोई कमी नहीं है। इससे मीथेन निकालकर मुंबई, पुणे और गुवाहाटी में सिटी बस चलाने की तैयारी चल रही है। बासठ रुपये प्रति लीटर डीजल की कीमत के बराबर काम करने वाली मीथेन की कीमत 16 रुपये पड़ती है।

हाल ही में राजस्थान केंद्र सरकार द्वारा मई 2018 में प्रस्तुत की गई जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति को लागू करने वाला पहला राज्य बन गया है। राजस्थान अब तेल बीजों के उत्पादन में वृद्धि करने पर ध्यान केंद्रित करेगा तथा वैकल्पिक ईंधन और ऊर्जा संसाधनों के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उदयपुर में एक उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करेगा। जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति किसानों को उनके अधिशेष अत्पादन का आर्थिक लाभ प्रदान करने और देश की तेल आयात निर्भरता को कम करने में सहायक होगी। भारतीय रेलवे की वित्तीय सहायता से राजस्थान में 8 टन प्रतिदिन की क्षमता का एक बायोडीजल संयंत्र पहले ही स्थापित किया जा चुका है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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