आॅनलाइन व्यापारियों के लाॅजिस्टिक्स संबंधित कामों को तकनीक के द्वारा आसान बनाता शिपडेस्क

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भारत में आॅनलाइन खुदरा व्यापार के साथ-साथ ई-काॅमर्स लाॅजिस्टिक्स का क्षेत्र भी लगातार तरक्की की राह पर है। वर्ष 2018 तक भारत में आॅनलाइन खुदरा बाजार के 18 बिलियन अमरीकी डाॅलर से भी अधिक का उद्योग होने का अनुमान लगाया जा रहा है और उम्मीद है कि वर्ष 2019 में ई-काॅमर्स लाजिस्टिक्स दो बिलियन अमरीकी डाॅलर के आंकड़े को पार कर जाएगा।

अगर हम लाॅजिस्टिक्स के क्षेत्र पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि कई कंपनिया संपूर्ण प्रक्रिया को आसान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए तकनीक के साथ-साथ नए तरीकों के साथ भी प्रयोग करने से नहीं हिचक रही हैं और लगातार प्र्रयोग कर रही हैं। लाॅजिस्टिक्स हमेशा से ही ई-काॅमर्स का एक महत्वपूर्ण उपखंड रहा है और यह अक्षमताओं से भरा रहा है लेकिन शिपडेस्क (Shipdesk) का दावा है कि यह तकनीक के माध्यम से लाॅजिस्टिक्स की दक्षता से संबंधित है।

वर्ष 2014 के दिसंबर महीने में लिप्जो जोसफ और श्री कृष्ण बीवी द्वारा प्रारंभ किया गया शिपडेस्क एक लाॅजिस्टिक्स से संबंधित बाजार है जो आॅनलाइन व्यापारियों को एक क्लाउड आधारित शिपिंग समाधान उपलब्ध करवाता है। यह वास्तविक समय (रियल टाइम) के आधार पर मांग और सेवाओं की आवश्यकताओं की पूर्ती करने के लिये प्रौद्योगिकी का उपयोग करती है।

यह बताते हुए कि ये अपने उपभोक्ताओं को सबसे सस्ती शिपिंग दरें पेश करते हैं लिप्जो कहते हैं, ‘‘जैसे ही कोई आॅनलाइन व्यापारी शिपडेस्क के साथ हाथ मिलाता है उस आॅनलाइन व्यापारी के आॅनलाइन आॅर्डरों से संबंधित समस्त जानकारी उनके क्लाउड पर उपलब्ध करवा दी जाती है और वे तुरंत शिपिंग के लिये अपनी टीम भेज देते हैं। यह शिपिंग की प्रक्रिया को सरल करते हुए व्यापारियों के लाभ को बढ़ाने में मदद करता है।’’ इनका प्रयोग में आसान एक प्लग-इन आॅर्डर, ट्रेकिंग और डाटा की संपूर्णता के लिये बाजारों और ई-काॅमर्स मंचों के साथ एकीकरण करता है। इनके इस समाधान के माध्यम से कंपनियों को शिपिंग में लगने वालेेे समय और पैसे को बचाने में बहुत मदद मिलती है और वे अपनी डाक की त्रुटियों में कमी लाते हुए उपभोकताओं को बेहतर तरीके से सूचित रखते हैं जिससे उनकी साख तो बढ़ती ही है और एक बेहतर फीडबैक प्र्राप्त होता है।

यह मंच अपने साथ 150 उपयोगकर्ताओं के जुड़े होने का दावा करता है और प्रतिमाह करीब 150 नए व्यापारियों के इनके साथ जुड़ने से इस संख्या में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। इनके उपभोक्ताओं में जिंगोहब, फ्रीकार्ट, बद्लीडाॅटइन जैसे बाजारों के अलावा विभिन्न आॅनलाइन चैनलों के माध्यम से अपने उत्पाद आॅनलाइन बेचने वाली डेलीकैचर, निवीसफैशन, कमलास्बुटीक, ज़ारास्बुटीक सहित कई आॅनलाइन विक्रेता शामिल हैं। इनकी कंपनी मासिक स्तर पर 40 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रही है।

इनके इस उद्यम में अबतक एक करोड़ रुपये का निवेश लग चुका है। इस रकम का अधिकतर भाग सेल्स, मार्केटिंग और प्रौद्योगिकी जैसे संसाधनों को तैयार करने में खर्च किया गया है। फिलहाल इनका सारा ध्यान आॅनलाइन रिसेलरों पर है और जल्द ही ये एसएमई सेगमेंट की तरफ भी अपने कदम बढ़ाने की तैयारियों में हैं।

इनका यह मंच मुख्यतः शिपमेंट पर मार्जिन और सदस्यता आधारित राजस्व के दो राजस्व माॅडलों पर संचालित होता है। लिप्जो कहते हैं, ‘‘हमें अभी संचालन प्रारंभ करे हुए एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ है और हमारा वार्षिक राजस्व एक करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुुका है।’’

चुनौतियां और विकास की संभावनाएं

क्षमता, मांग में निरंतरता की कमी और अक्षमता लाॅजिस्टिक्स उद्योग के सामने आने वाली कुछ प्रमुख चुनौतियों में से एक हैं। हालांकि मैनुअल हस्तक्षेप को कम करते हुए अनुकूलन को बढ़ाकर कई समस्याओं का आसानी से समाधान किया जा सकता है। लिप्जो कहते हैं, ‘‘हम इन क्षेत्रों में निरंतर निवेश कर रहे हैं और जैसे-जैसे हम विकास कर रहे हैं समाधान के प्रति विश्वसनीयता में इजाफा हो रहा है।’’

विकास की बाबत उनका कहना है कि भारत में 10 लाख से भी अधिक आॅनलाइन विक्रेता हैं और उनकी नजरों से देखें तो प्रत्येक शिपडेस्क के लिये एक संभावित बाजार है। इस समाधान को देश की सीमाओं से बाहर विस्तारित करते हुए दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों तक भी अपनी पहुंच बनाई जा सकती है। इसके अलावा एसएमई सेगमेंट का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी बिल्कुल अनछुआ है जिसमें असंगठित लाॅजिस्टिक्स एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस पूरे बाजार का उपयोग विकास के नजरिये से किया जा सकता है।

बाजार और प्रतिस्पर्धा

इस क्षेत्र में होने वाले सौदों पर नजर रखने वाले एक शहर आधारित बुटीक निवेश बैंक, सिंघी एडवाईजर्स द्वारा हाल ही में जारी की गई लाॅजिस्टिक्स रिपोर्टस के अनुसार यह व्यापार संगठित खिलाडि़यों की सिर्फ 6 प्रतिशत संख्या होने के बावजूद बीते पांच वर्षों से 16 प्रतिशत से भी अधिक की सीएजीआर की दर से वृद्धि कर रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर वर्ष 2013 में लाॅजिस्टिक्स उद्योग 4 ट्रिलियन डाॅलर से भी अधिक का था जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कुल 10 फीसदी था।

इस क्षेत्र मेें फेडएक्स, ब्लूडार्ट, डेल्हीवरी, ईकाॅम एक्सप्रेस इत्यादि जैसी लाॅजिस्टिक्स कंपनियों के अलावा ईकार्ट इत्यादि जैसी बाजार आधारित लाॅजिस्टिक्स कंपनियां और कई स्थानीय कोरियर कंपनियां सक्रिय हैं।

प्रतिस्पर्धा की बाबत लिप्जो का कहना है कि चूंकि यह एक उभरता हुआ बाजार है इसलिये इसमें हर तरह की प्रतियोगिता की संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र की वृद्धि सबको इस बात की आजादी देती है कि प्रत्येक खिलाड़ी अपने लिये कोर क्षेत्रों का चयन कर ले और फिर उनमें बेहतरी पाने के प्रयास करे। उनके पास सामने आने वाली इन चुनौतियों से निबटने के लिये एक कार्ययोजना पहले से ही तैयार है और कोई भी नई प्रतिस्पर्धा इस क्षेत्र को और अधिक स्थिरता प्रदान करने में ही मदद करेगी।

इन्होंने हाल ही में अपनी एक मोबाइल एप्लीकेशन भी बाजार में उतारी है और विश्लेषण इनके उत्पाद की रूपरेखा का भविष्य तय करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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