ज़रूरी नहीं कि मोदी लहर बरकरार रहे, राजनीतिक समीकरण बदल भी सकते हैं : आशुतोष 

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद पूर्व पत्रकार/संपादक और आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष का विश्लेषण ... मोदी की लोकप्रियता चरम पर है, राहुल कांग्रेस के लिए भार साबित हो रहे हैं, देश में लोकतंत्र को बचाने के लिए एक मजबूत विपक्ष की ज़रुरत है, पंजाब और गोवा में हार के बावजूद आम आदमी पार्टी की ताकत ख़त्म नहीं हुई है   

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पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद मैं चाहता था कि कुछ लिखूं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। चुनाव नतीजों के बाद मैंने इंतजार किया सही तस्वीर उभरने का। पिछले एक सप्ताह के दौरान काफी चर्चाएं हुई। बहुत सारे अनुमान और विश्लेषण हुए। इस दौरान तीन ऐसे बिंदु थे जिन पर निरीक्षण और निष्पक्ष जांच की जरूरत है।

1. क्या मोदी की जबरदस्त लहर चल रही है और 2019 के लोकसभा चुनाव में इसे रोक पाना नामुकिन है ?

2. कांग्रेस अपने अस्तित्व के संकट से क्या गुजर रही है ? राहुल कांग्रेस के लिये बहादुर शाह जफर साबित हो रहे हैं ?

3. राष्ट्रीय विकल्प के बारे में‘आप’ के बारे में जो बात की जा रही है, इसमें कितना दम है ?

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि हाल में हुए यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को शानदार जीत हासिल हुई है। चुनाव से पहले मैंने जिन राजनीतिक पंडितों से बात की उन सभी का कहना था कि उत्तर प्रदेश में मुकाबला त्रिकोणीय है और कोई भी पार्टी किन्ही दो पार्टियों को मात दे सकती है। हालांकि कुछ ऐसे भी लोग थे जिनका मानना था कि बीजेपी ने दूसरी पार्टियों के मुकाबले बढ़त बनाई हुई है। बावजूद कोई भी ये कहने को तैयार नहीं था कि बीजेपी इन चुनाव में इतना शानदार प्रदर्शन करेगी। वहीं किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि बीएसपी इतना बुरा प्रदर्शन करते हुए 18 सीटों के साथ तीसरा स्थान हासिल करेगी। मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने 80 प्रतिशत सीटों पर अपनी धाक जमाई जो किसी जादू से कम नहीं है। बीजेपी ने उत्तराखंड में शानदार वापसी की है। लेकिन जिस तरीके से बीजेपी यूपी की सत्ता में लौटी है वो महत्वपूर्ण है। इस जीत में मोदी को लेकर जो आशंकाएं थी या उनके काम को लेकर जो बातें की जा रही थीं वो सब बेकार साबित हुईं। यही वजह है कि अब कहा जा रहा है कि 2019 के चुनाव में मोदी बड़े अंतर के साथ सत्ता में वापसी करेंगे।

अगर मैं ये कहूं कि फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगा, तो शायद मैं दूसरे लोगों से अलग सोच रखने वाला इंसान कहलाऊंगा। जबकि लोकसभा चुनाव होने में अभी दो साल से थोड़ा ज्यादा वक्त है। राजनीति में सप्ताह भर का वक्त भी काफी होता है। ऐसे में कौन जानता है कि भविष्य में क्या होगा। इतिहास इस बात का गवाह है। 1971 में पाकिस्तान के बंटवारे और बंग्लादेश के गठन के बाद इंदिरा गांधी को दुर्गा के रूप में सम्मानित किया गया। तब कहा गया कि इंदिरा ही इंडिया है और इंडिया ही इंदिरा है, लेकिन 1972 के अंतिम महीनों में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरने लगा और 1975 तक जनता उनसे काफी नाराज हो गई। जिसके बाद उन्होने आपातकाल की घोषणा कर दी। उनके लिये हालात इतने खराब हो गये कि1977 के आम चुनाव में वो अपनी सीट भी नहीं बचा सकीं। ये पहली बार था जब केंद्र की सत्ता में कोई गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी। ये एक नामुकिन सी बात थी। इसी तरह 1984 में राजीव गांधी ने 405 सीटें जीती थी। संसद में इतनी सीटें उनकी मां और उनके नाना कभी नहीं जीत पाये थे, लेकिन 1987 में बेफोर्स ने उनको इतना बदनाम कर दिया कि 1989 के चुनाव में वीपी सिंह का रास्ता साफ हो गया। इसी तरह 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार लोगों में अपने को काफी लोकप्रिय मान रही थी । उनका विश्वास था फील गुड फैक्टर काम करेगा। यही वजह रही कि उन्होंने छह महीने पहले ही चुनाव की घोषणा कर दी ताकि उनको आसान जीत हासिल हो सके लेकिन ये कदम पार्टी के लिये काफी नुकसानदेह साबित हुआ।

2009 में जब लगातार दूसरी बार बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा उस वक्त पार्टी के अंदर सत्ता की खींचतान काफी ज्यादा थी तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि 2014 के चुनाव में बीजेपी का कोई भविष्य है। तब लोग पार्टी को 2019 के चुनाव की तैयारी करने के बारे में राय देते थे। आज ये बात हर कोई जानता है कि हालात कैसे बदले। कांग्रेस किस तरह धूल में मिल गई। इसलिये मेरा कहना है कि मोदी के पास काफी अच्छे मौके हैं, लेकिन उनको तब तक इसी गति से चलना होगा। अगर वो ऐसा करने में सफल होते हैं तो उनके सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं है वर्ना इतिहास कुछ अलग लिखा जाएगा।

एक अलग नजरिये से देखा जाये तो मोदी के करिश्मे के बावजूद बीजेपी और एनडीए को यूपी और उत्तराखंड में जीत हासिल हुई है। इन दो राज्यों में बीजेपी सत्ता में नहीं थी वहीं जो बीजेपी पंजाब और गोवा की सत्ता में थी वहां उसे हार का मुंह देखना पड़ा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी उभर कर सामने आई। पंजाब में अकाली-बीजेपी का गठबंधन कांग्रेस को बड़ी जीत हासिल करने से नहीं रोक पाया और गोवा की जनता ने बीजेपी को खारिज कर दिया। इसके बावजूद तिकड़म लगाकर उसने वहां पर सरकार बना ली है। इसी तरह मणिपुर में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। ये दर्शाता है कि जहां पर बीजेपी या उसके सहयोगी सत्ता में थे वो जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे और लोगों ने उनको खारिज कर दिया। इसलिये अगर मोदी अपनी लोकप्रियता को आसानी से लेते हैं तो ये उनके लिये ये हानिकारक साबित होगा। खासतौर से उनको आर्थिक मोर्च पर काफी कुछ साबित करना होगा तभी वो दोबारा प्रधानमंत्री बन सकते हैं।

लेकिन कांग्रेस इस वक्त असली संकट का सामना कर रही है। राहुल पार्टी के लिये भार साबित हो रहे हैं। पार्टी में उनके नेतृत्व के खिलाफ बातें हो रही हैं। बावजूद इसके पार्टी ने पंजाब में बेहतर प्रदर्शन किया है। गोवा और मणिपुर में उनको कोई क्रेडिट नहीं दिया जा सकता। पार्टी के अंदरखाने बात चल रही है कि उनको बदला जाये या फिर वो अपने काम के तरीके में बदलाव करें। राहुल की सबसे बड़ी समस्या ये है कि वो उस नेता के खिलाफ खड़े हैं जो अपनी लोकप्रियता के चरम पर है। जो अपने विरोधियों को हराने के किसी भी तकनीक के इस्तेमाल से गुरेज़ नहीं करता है फिर चाहे सत्ता हासिल करने के लिये वो तरीक़े नैतिक हो या अनैतिक। अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में जिस तरह कांग्रेस की हार हुई वो इस बात का उदाहरण है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अप्रासंगिक हो गई है। हालिया उदाहरण के तौर पर गोवा और मणिपुर ऐसे राज्य हैं जहां पर सरकार बनाने के लिये कांग्रेस कुछ नहीं कर सकीं। राहुल की शैली काफी रक्षात्मक है। सोनिया गांधी की तरह राहुल के पास पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों को कमांड देने की काबलियत नहीं है। वहीं उन पर ये भी आरोप लगते हैं कि वो अनाड़ी लोगों के बीच रहते हैं और उनके विचार काफी बेतुके होते हैं। इसलिये वो पार्टी के लिये तभी कारगर साबित हो सकते हैं जब वो अपने आप को बदलें, लेकिन इसमें लंबा वक्त लग सकता है।

ये बात सही है कि कांग्रेस के विपरीत पंजाब के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ को लेकर काफी प्रचार किया गया और काफी उम्मीदें जगाई गई। मीडिया ने काफी पहले भविष्यवाणी की थी कि ‘आप’ तीन चौथाई बहुमत लेकर आ रही है। इसके अलावा गोवा में भी काफी अच्छा करने की उम्मीद जगाई गई थी। लेकिन पंजाब में पार्टी अपनी सहयोगी के साथ मिलकर केवल 22 सीटें ही हासिल कर सकीं। वहीं गोवा में पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल सकीं। अब एमसीडी चुनाव में ‘आप’ बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ खड़ी है। इन चुनाव में आलोचक मान रहे हैं कि पार्टी का हाल ठीक वैसा ही होगा जैसा 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हुआ था। जब 409 सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हो गई थी। बावजूद ‘आप’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में जोरदार वापसी की और 2015 में अभूतपूर्व जनादेश हासिल किया। अक्सर ये बात भूला दी जाती है कि ‘आप’एक नई पार्टी है जिसका जन्म चार साल पहले हुआ और इतने छोटे से समय में ‘आप’ ने दिल्ली में दो बार सरकार बनाई और एक दूसरे राज्य में प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में है। हालांकि ये कोई औसत उपलब्धि नहीं है, क्योंकि दूसरी राजनीतिक पार्टियों को यहां तक पहुंचने में सालों लग जाते हैं जहां पर ‘आप’ पार्टी खड़ी है। यूपी में बीजेपी को 1980 में 3 प्रतिशत और 1985 में केवल 4 प्रतिशत वोट ही मिले।

ये तय है कि ‘आप’ दौड़ से बाहर नहीं है और आलोचक एक बार फिर निराश होंगे। लेकिन एक बात ये भी सही है कि देश को मजबूत विपक्ष की जरूरत है। वो इसलिये क्योंकि वो सरकार के काम काज पर नजर रख सके ताकि वो निरंकुश ना बन सके। लोकतंत्र को बनाये रखने के लिये स्वस्थ बहस होनी चाहिए और विचार-विमर्श में संकुचित नहीं होना चाहिए। अपनी असहमति को सम्मान के साथ रखना चाहिए और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए ताकि वो अपने को सकुशल और सुरक्षित महसूस कर सकें। विविधता में एकता बनाये रखने के लिए सहिष्णुता काफी महत्वपूर्ण है। जहां पर इतिहास और परंपरा को समावेशी बनाने की जरूरत है। आज लोग आरएसएस और बीजेपी को खास तव्वजो दे रहे हैं। वो विचारधारा जो दशकों से निष्क्रिय थी और अब उसने अपनी ताकत दिखाई है, लेकिन लोकतंत्र में समीकरण बदलने में वक्त नहीं लगता जैसा की वाजपेयी सरकार के साथ हुआ था, जिसे पुनर्जीवित होने में दस साल लग गये।

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