विलक्षण स्मरण शक्ति वाले श्लोक को पिता ने नहीं अपनाया, तो मां ने पाला सिंगल मदर बन कर

चाढ़े चार साल की उम्र में चलना सीखने वाले श्लोक को याद रहती हैं पांच-पांच साल पुरानी बारीक बातें भी।

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यूं तो हर बच्चा अपनी-अपनी खूबियों के साथ जन्म लेता है। कोई अच्छा गाता है, तो कोई अच्छा बजाता है, कोई अच्छे चित्र बनाता है, तो कोई अच्छा डांस करता है और लेकिन श्लोक की जिन्दगी इन तमाम खूबियों से महरूम थी, लेकिन ईश्वर ने दिया उसे एक खास उपहार...

श्लोक के जन्म के बाद उसके मां-पिता को दो साल लग गये ये बात समझने में की श्लोक बाकी के बच्चों से थोड़ा भिन्न है, लेकिन वे ये नहीं जानते थे कि श्लोक की स्मरण शक्ति भी बाकी के बच्चों से भिन्न हैं।

श्लोक की मां ऊषा शुक्ला के अनुसार श्लोक साढ़े चार साल की उम्र में चलना सीख पाया था। पहले चलता और गिर जाता था। फिर शुरू हुआ इलाज का वह दौर जिसमें दर्द कम होने के बजाय बढ़ गया। सबसे पहले श्लोक को इन्दिरा नगर लखनऊ में डॉ. अतुल अग्रवाल को दिखाया गया, जिन्होंने उसके (श्लोक) कभी न ठीक होने की घोषणा कर दी। यहां तक ये भी कहा कि यदि कहें तो दवा लिखूं वैसे कोई फायदा नहीं। 

श्लोक का जन्म 10 सितंबर 2000 में हुआ था। मां ऊषा शुक्ला बताती हैं, कि डा. अतुल अग्रवाल का ये कहना की श्लोक कभी ठीक नहीं होगा, इस बात ने दिल को पूरी तरह से तोड़ दिया। उसके बाद ख्याति प्राप्त डॉ. मजहर हुसैन के पास गये लेकिन कोई फायदा नहीं। एलोपैथ के तमाम कटु अनुभवों के बाद होम्योपैथी की तरफ रुख किया। लेकिन होम्योपैथी की मीठी गोलियां भी उनकी जिन्दगी की कड़वाहट कम न कर सकीं।

श्लोक धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था और उसके पिता का दबाव भी बढ़ रहा था। दबाव था श्लोक को उसकी नानी के पास या कहीं और छोड़ने का। जहां श्लोक के पिता अपने ही बच्चे को स्वीकार नहीं कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ श्लोक की मां ऊषा शुक्ला अपने बेटे से खुद को दूर नहीं कर सकती थीं। एक दिन फैसला हो गया और श्लोक के पिता को मां ऊषा शुक्ला ने मुक्त कर दिया। ऊषा आज सिंगल मदर के रूप में अपने बेटे की 'परवरिश' के सहयोग से परवरिश कर रही हैं। 

अब श्लोक में काफी सुधार है। वो अपने सारे काम खुद कर सकता है। संगीत में उसकी गहरी रुचि है। ऊषा शुक्ला के अनुसार श्लोक की स्मरण शक्ति विलक्षण है।

हैरत होती है कि अॉटिज्म से पीड़ित श्लोक जब पांच साल बाद एक अस्पताल में पुन: जाता है, तो उसे डाक्टर समेत सभी पूर्व घटित घटनाक्रम याद रहते हैं। रास्ते तो वह आगे-आगे बताता है। बहुत ही साफगोई के साथ ऊषा शुक्ला कहती हैं, कि मेरे बेटे श्लोक की प्रतियोगिता सामान्य बच्चों के साथ नहीं हो सकती है किन्तु इतना निश्चित है कि सुधार की गति को देखते हुए आने वाले समय में श्लोक आत्मनिर्भर बनेगा। रही बात समाज की तो उसके नजरिये में थोड़ी तब्दीली आने लगी है। लेकिन अभी भी बड़े स्तर पर भेदभाव व्याप्त है जिसकी चोट हमको भी झेलनी पड़ती है। ये सब संघर्ष का हिस्सा है। मुझे इस बात का गर्व है, कि मैं श्लोक की मां हूं। मेरे मन में कोई ग्लानि, शिकायत, कुण्ठा नहीं है। 

सरकार से निवेदन है कि अॉटिस्टिक बच्चों को सक्षम बनाने के लिए कुछ विशेष कार्यक्रम संचालित करे। इनके अन्दर की प्रतिभा को चिन्हित और विकसित करें ताकि इनकी दिव्यता का इस्तेमाल समाज और मानवता के हित में हो सके।

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लेखक / पत्रकार

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