मौसम में बढ़ रही गर्माहट की वजह से घट रही है भारत की ऊर्जा उत्पादन क्षमता

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एक अध्ययन में पॉल्सन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एडं एप्लायड साइंस के शोधकर्ताओं ने बताया कि चीन और अमेरिका के बाद भारत, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में तीसरे पायदान पर है।

सांकेतिक तस्वीर, साभार: Shutterstock
सांकेतिक तस्वीर, साभार: Shutterstock
साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित शोध में बीते चार दशकों की प्रवृत्तियों का अध्ययन किया गया है, जिसमें यह बात साफ-साफ बताई गई है कि पिछले 40 सालों में ऊर्जा क्षमता में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है। 

ग्लोबल वॉर्मिंग का असर अब साफ-साफ देखने को मिलने लगा है। मौसम ने भी चेतावनी देनी शुरू कर दी है कि यदि सतर्कता नहीं बरती गई तो कुछ सालों में ही चीज़ें हाथ से निकल जायेंगी। हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि दुनिया भर के मौसम में आ रही तब्दीलियों की वजह से हवा अब पहले से अधिक गर्म हो रही है, जिसका असर भारत की हवा से ऊर्जा उत्पादन क्षमता पर भी पड़ रहा है।

साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक शोधकर्ताओं की मानें तो चीन और अमेरिका के बाद भारत, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में तीसरे पायदान पर है। ये शोधकर्ता पॉल्सन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एडं एप्लायड साइंस से संबंध रखते हैं। विंड पावर पर भारत अरबों की राशि खर्च रहा है और उसने अगले पांच साल में इसकी क्षमता को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। ज्यादातर पवन चक्कियां भारत के दक्षिणी और पश्चिमी इलाकों में बनायी जाती हैं। भारत के दक्षिणी और पश्चिमी इलाकों में ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून की हवा से ऊर्जा उत्पादन बेहतर होता है। मौसम की व्यवस्था के तहत तब उप महाद्वीप में बारिश होती है और हवा भी चलती है।

प्रकाशित जर्नल में यह भी कहा गया है कि हिंद महासागर के गर्म होने से मानसून में कमजोरी आ रही है, जिसकी वजह से हवा से बिजली बनाने के काम बड़ी मात्रा में प्रभावित हो रहा है। इस शोध में बीते चार दशकों की प्रवृत्तियों का अध्ययन किया गया है, जिसमें यह बात साफ-साफ बताई गई है कि बीते 40 सालों में ऊर्जा क्षमता में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है। साथ ही राजस्थान सहित पश्चिम भारत और महाराष्ट्र में अधिक निवेश किया जा रहा है।

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