एक ऐसा गाँव, जहां अधिकतर किसान हैं करोड़पति

महाराष्ट्र के गांव की युवाओं ने बदल दी तस्वीर

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महाराष्ट्र में किसानों की बात आते ही सूखा और किसानों की आत्महत्या की तस्वीर जेहन में उभर आती है। लेकिन महाराष्ट्र का एक गांव ऐसा भी है जहां न तो पानी का संकट है और न ही किसानों की गरीबी। बल्कि इस गांव में 50 से ज्यादा किसान ऐसे हैं जो करोड़पति भी हैं।

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर हिवरे बाजार ऐसा गांव है, जहां कदम रखते ही आपको ऐसा लगेगा कि आप किसी गांव मे नहीं बल्कि स्वप्नलोक में अपने सपनों के भारत का दर्शन कर रहे हों।

जब समूचा महाराष्ट्र पानी की कमी से जूझ रहा है, सूखे की चपेट में है, तब इस हिवरे बाजार में पानी का कोई संकट नहीं है। सालों तक लगातार श्रमदान, ग्रामीणों में कमाल की एकता, नो पॉलिटिक्स, सरकारी पैसे का सही इस्तेमाल और पानी के जबर्दस्त मैनेजमेंट ने हिरवे बाजार को ग्राम विकास की असाधारण मिसाल बना दिया है।

महाराष्ट्र में किसानों की बात आते ही सूखा और किसानों की आत्महत्या की तस्वीर जेहन में उभर आती है। लेकिन महाराष्ट्र का एक गांव ऐसा भी है जहां न तो पानी का संकट है और न ही किसानों की गरीबी। बल्कि इस गांव में 50 से ज्यादा किसान ऐसे हैं, जो करोड़पति भी हैं। जब समूचा महाराष्ट्र पानी की कमी से जूझ रहा है, सूखे की चपेट में है, तब इस हिवरे बाजार में पानी का कोई संकट नहीं है। सालों तक लगातार श्रमदान, ग्रामीणों में कमाल की एकता, नो पॉलिटिक्स, सरकारी पैसे का सही इस्तेमाल और पानी के जबर्दस्त मैनेजमेंट ने हिरवे बाजार को ग्राम विकास की असाधारण मिसाल बना दिया है।

हिवरे बाजार गांव की तस्वीर
हिवरे बाजार गांव की तस्वीर

अहमदनगर जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर हिवरे बाजार ऐसा गांव है जहां कदम रखते ही आपको ऐसा लगेगा कि आप किसी गांव मे नहीं बल्कि स्वप्नलोक में अपने सपनों के भारत का दर्शन कर रहे हों। चारों ओर हरियाली, साफ सुथरी सड़कें। पक्के मकान। एक ऐसा गांव जिसे देश को हिलाने वाली मंदी छू भी नहीं पाई। यहां नौकरी की तलाश में कोई भी व्यक्ति शहर नहीं जाता। यहां खुद का संसद है। यह ख्वाब नहीं हकीकत है। यह एक आदर्श गांव है।

977 हेक्टेयर में फैला है ये गांव। हर तरफ हरियाली। पानी से लबालब भरे तलाब। खेतों में लहहाती फसलें। हंसते मुस्कुराते चेहरें। हिवरे बाजार की ये आज की तस्वीर है। मगर 20 साल पहले इस गांव की तस्वीर कुछ और ही थी। पहले न तो हरियाली थी और न ही खेतों में फसलें। 90 के दशक मे जमीन बंजर थी। चेहरे उदास थे। किसानों को शराब की लत लग चुकी थी और गांव में रहने को कोई तैयार नहीं था।

पोपट राव पवार
पोपट राव पवार

1989 में गांव के कुछ पढ़े लिखे युवकों ने गांव की दशा और दिशा बदलने की ठानी। उन्होंने कहा कि सिर्फ एक साल के लिए गांव के सारे फैसले उन्हें करने दीजिए। शुरू में तो विरोध हुआ, लेकिन आखिर उनकी बात मान ली गई। 1 साल के भीतर ही गांव की हालत मे सुधार आना शुरू हो गया। युवाओं की मेहनत को देखते हुए अगले 5 साल के लिए गांव को युवकों के हवाले सौंप दिया गया। उसी साल एक युवा पोपट राव पवार को बिना किसी विरोध के गांव का सरपंच चुन लिया गया। अपने बदहाल गांव को आदर्श गांव बनाने के लिए पूरे गांव वाले जी जान से जुट गए। इसके बाद गांव के विकास की पटकथा लिखी जाने लगी।

पोपट राव पवार पुणे से एम. कॉम की पढ़ाई करने के बाद गांव लौटे थे। 1989-90 में मुश्किल से 12 प्रतिशत भूमि पर खेती की जा रही थी। गांव के कुओं में मॉनसून के दौरान ही पानी होता था। इसके अलावा पानी का कोई साधन नहीं था। दौरान कई परिवार दूसरी जगह बसने के लिए जाने लगे। यहां तक कि सरकारी अधिकारी भी गांव छोड़ कर चले गए।

1990 में गांव की कायापलट करने का काम शुरू हुआ था। सरकारी अधिकारियों की मदद से पूरे गांव ने श्रमदान करके जल संरक्षण पर काम शुरू किया। बारिश के पानी का संरक्षण किया गया और इसका सही इस्तेमाल किया गया। 3 साल में ही इसका असर दिखाई देने लगा। गांव में जलस्तर ऊपर आने लगा। कुएं में पानी दिखने लगा।

इस गांव में 1989 में आदर्श ग्राम योजना के तहत पहला काम पानी पर ही किया गया। सरपंच पोपट राव पवार बताते हैं कि पानी को लेकर स्थिति बदलने से गांव में अपने आप कैश क्रॉप आ गया, डेयरी बढ़ गई, हॉरिटिकल्चल आ गया। इसका नतीजा यह हुआ कि प्रति व्यक्ति आय 850 से 30 हजार पहुंच गई।

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस गांव में पैसों का नहीं बल्कि पानी का ऑडिट होता है। पानी बचाने के जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है। ढाई रुपए में हर घर में रोज 500 लीटर पानी पहुंचाया जाता है। आज गांव में 350 कुएं और 16 बोरवेल है। आज, गांव के 216 परिवारों में से एक चौथाई करोड़पति हैं। हिवरे बाजार के सरपंच, पोपट राव पवार कहते हैं 50 से अधिक परिवारों की वार्षिक आय 10 लाख रुपए से अधिक है। 

इस गांव की प्रति व्यक्ति आय देश के शीर्ष 10 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के औसत आय (890 रुपये प्रति माह) की दोगुनी है। पिछले 15 वर्षों में औसत आय 20 गुनी हो गई है।

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